श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०४ ) अर्थात् मेरी प्रकृति नामक भूतसूक्ष्म रूप जो जड़ वस्तु है, उसीमें मैं चेतनात्मक गर्भ संयोजन करता हूं, मेरे द्वारा सृष्ट चेतन, अचेतन के संसर्ग से देव से स्थावर तक जड़ चेतन समन्वित समस्त भूतों की सृष्टि होती है । एवं भोक्तृभोग्यरूपेणावस्थितयोः सर्वावस्थावस्थितयोः चिद- चितोः परमपुरुष शरीरतया तन्नियाम्यत्वेन तदपृथक् स्थिति परंपुरुषस्य चात्मत्वमाहुः काश्चन श्रुतयः— “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अंतरो यं पृथिवीं न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवो मंतरो यमयति “इत्यारभ्य” य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्माऽन्त- र्याम्यमृतः "इति । तथा- - “यः पृथिवीमन्तरे संचरन्यस्य पृथिवी शरीरं यं पृथिवो न वेद ‘इत्यारभ्य” योऽक्षरमंतरे संचरन्यस्याक्षरं शरीरं यमक्षरं न वेद, यो मृत्युमन्तरे संचरन्यस्य मृत्युः शरीरं य मृत्युं न वेद एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको नारायणः” अत्र मृत्यु शब्देन तमः शब्द वाच्यं सूक्ष्मावस्थं अचिद्- वस्त्वभिधीयते । अस्यामेवोपनिषदि- - “अव्यक्तमक्षरे लीयते, अक्षरं तमसिलीयते” इतिवचनात् । “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा” इति च । चेतन जीव भोक्ता और अचेतन वस्तु भोग्य है, इस प्रकार भोक्ता भोग्य रूप से अवस्थित सभी अवस्थाओं में सदा एक से स्थित चित् और अचित् परम पुरुष भगवान के ही शरीर हैं और उसी के द्वारा परिचा- लित हैं, इनमें पृथक् रूप से स्थित रहने का सामर्थ्य भी नहीं है, इसीलिए श्रुतियां परमपुरुष को आत्मा रूप से निर्देश करती हैं— “जो पृथिवी में रह कर भी पृथिवी से भिन्न है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी ही जिसका शरीर है, जो अन्तर्यामी रूप से उसका संयमन करता है ।” यहाँ से प्रारम्भ करके- - “जो आत्मा में स्थित भी उससे पृथक है, आत्मा जिसे नहीं जानता आत्मा ही जिसका शरीर है, जो अन्तर्यामी होकर आत्मा ankurnagpal108@gmail.com