भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २०५ ) का संयमन करता है वही तेरा अन्तर्यामी अमृत आत्मा है।” तथा —“जो पृथिवी के अन्दर विचरण करता है, पृथिवी जिसका शरीर है, पृथिवी उसे नहीं जानती” यहाँ से प्रारंभ करके—“जो मृत्यु में विचरण करता है, मृत्यु जिसका शरीर है, मृत्यु जिसे नहीं जानता, वही समस्त भूतों के अंतरात्मा निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं।” यहाँ तक। इस प्रसंग में मृत्यु शब्द तमः शब्द वाच्य सूक्ष्मावस्थापन्न अचित् वस्तु का वाचक है; उक्त उपनिषद् में ही इसे तम शब्द वाच्य कहा गया है— “अव्यक्त अक्षर में लीन होता है, अक्षर तम में लीन होता है,” वह सभी का शासक अन्तर्यामी आत्मा है” इत्यादि। एवं सर्वावस्थावस्थितचिदचिद्वस्तुशरीरतया तत्प्रकारः परमपुरुष एव कार्यावस्थाकारणावस्थजगद्रूपेणावस्थित इति इममर्थं ज्ञापयितुं काश्चन श्रुतयः कार्यावस्थंकारणावस्थं च जगत् स एवेत्याहुः--“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्” इत्यारभ्य “सन्मूलाः सोम्य इमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः, ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो” इति। तथा “सोऽकामयत, बहुस्यां प्रजायेयेति, स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वा इदंसर्वमसृजत” इत्यारभ्य--“सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्” इत्याद्याः। इस प्रकार सभी अवस्थाओं में अवस्थित चिद् अचिद् सारे ही पदार्थ उसी परमपुरुष के शरीर होने से उसी के प्रकार हैं। कारणावस्थ और कार्यावस्थ समस्त चेतन अचेतन जगत में वह परमात्मा ही स्थित रहता है, इसलिए कुछ श्रुतियाँ जगत की कारणावस्था और कार्यावस्था को परमात्मा की ही अवस्था बतलाती है—“हे सौम्य ! यह सब सृष्टि के पूर्व एक अद्वितीय सत् ही था, उसने इच्छा की, अनेक रूपों में प्रकट हो जाऊँ, उसने तेज की सृष्टि की” यहाँ से प्रारंभ करके--“हे सौम्य ! सद्ब्रह्म ही समस्त जायमान पदार्थों का मूल कारण है, आश्रय और विलय स्थान है, यह सारा जगत आत्म्य है, सब कुछ सत् है, वही आत्मा है, हे श्वेतकेतु ! तुम भी वही आत्म्य हो।” तथा—“उसने कामना की ankurnagpal108@gmail.com