श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१२ ) सर्वं “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इत्यादि वाक्यं प्रतिपादयति । चिदचिद वस्तुशरीरिणः परमात्मनः परमात्मशब्देनाभिधाने हि नास्ति विरोधः, यथा मनुष्यपिण्डशरीरकस्यात्मविशेषस्य “अयमात्मा सुखी” इत्यात्मशब्देनाभिधान इत्यलमतिविस्तरेण । चेतन, अचेतन और ईश्वर के स्वरूप और स्वभावगत भेद को बतलाने वाले वाक्यों में भी जो कार्यकारणभाव और कार्यकारण की अभिन्नता बतलाने वाले वाक्य हैं, उनमें परस्पर मतभेद प्रतीत होता है, परंतु जड़चेतन का सदा परमात्मा से शरीरात्म भाव; जड़चेतन की, कारणदशा में नामरूप विभाग रहित सूक्ष्मदशा; कार्यावस्था में नाम विभाग वाली स्थूलदशा को बतलाने वाली श्रुतियों से उक्त मतभेद का परिहार हो जाता है। ब्रह्मज्ञानवाद हो या औपाधिक ब्रह्म भेदवाद हो, अथवा कोई भी वाद हो, वे सारे ही वाद अयुक्ति मूलक श्रुति विरुद्ध हैं, उन सबका कुछ भी महत्व नहीं है। चेतन, अचेतन और ब्रह्म स्वभावतः भिन्न है, यह श्रुतिसिद्ध बात है। “ईश्वर आत्मा है, समस्त जडचेतन उसका शरीर है” इत्यादि धर्म-धर्मी बोधक श्रुतियों से उक्त बात समर्थित है। अन्य श्रुतियों में इनका जो कार्यकारण भाव और कार्यकारण अभेद बतलाया गया है वह अविरुद्ध ही सिद्ध होता है । जैसे आग्नेय आदि ६ यज्ञ, पृथक उत्पत्ति वाक्यों से पृथक ही विहित हैं, पुनः इन सबको दो वाक्यों द्वारा दो भागों में विभक्त कर दिया गया है, और अन्त में “दर्श और पूर्णमास नामक यज्ञ करो” इस अधिकार वाक्य द्वारा समस्त भाग को सकाम व्यक्ति के लिए कर्त्तव्य रूप से कहा गया है; उसी प्रकार विभिन्न स्वरूप, विभिन्न स्वभाव वाले जडचेतन ईश्वर को “प्रधान (जड) क्षर है, अमृत हर (जीव) अक्षर है, क्षर अक्षर का आत्मा एक ईश्वर देव है”—“प्रधान, क्षेत्रज्ञ और गुणों का वह ईश्वर है”—' उस विश्वपति और आत्मेश्वर—नारायण परमात्मा को “इत्यादि वाक्यों से बतलाकर “पृथ्वी जिसका शरीर— आत्मा जिसका शरीर-अव्यक्त जिसका शरीर अक्षर जिसका शरीर है, ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं “इत्यादि ankurnagpal108@gmail.com