श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१३ ) वाक्यों से हर अवस्था वाले जडचेतन को परमात्मा का शरीर और उनसे परमात्मा की तदात्मकता बतलाई गई चेतन अचेतन के आत्मभूत परमात्मा के बोधक “सत्-ब्रह्म और आत्मा” शब्दों से कारणा- वस्थ कार्यावस्थ परमात्मा की एकता को पृथक तीन वस्तुओं के रूप में “यह सब कुछ सत् ही था”—यह सब कुछ आत्म्य है “—” यह सब ब्रह्म है” प्रतिपादन किया गया है । चिदचिद् वस्तुशरीरी परमात्मा का, परमात्मा शब्द से उल्लेख, विरुद्ध नहीं है । जैसे कि—मनुष्यपिण्ड शरीरी आत्मा के लिए “यह सुखी आत्मा है” ऐसा प्रयोग किया जाता है । अब इस प्रसंग को यही पूर्ण करते हैं, अधिक विस्तार नहीं करेंगे । यत्पुनरिदमुक्तम्-ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेनैवाविद्यानिवृत्तिर्युक्ता इति, तदयुक्तम्, बंधस्यपारमार्थिकत्वेन ज्ञाननिवर्त्यत्वाभावात् पुण्यापुण्यरूपकर्मनिमित्तदेवादिशरीरप्रवेश तत्प्रयुक्त सुखदुःखानुभव रूपस्य बंधस्य मिथ्यात्वं कथमिव शक्यते वक्तुम् । एवंरूपबंधनि- वृत्तिर्भक्तिरूपापन्नोपासनप्रीतपरमपुरुषप्रसादलभ्येति पूर्वमेवोक्तम्। भवदभिमतस्यैक्यज्ञानस्ययथावस्थितवस्तुविपरीतविषयस्य मिथ्या- रूपत्वेन बंधविवृद्धिरेव फलं भवति । “मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः “इति शास्त्रात् ।” उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः “——” पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा इति जीवात्मविजातीयस्य तदंतर्यामिणोब्रह्मणोज्ञानं परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनमित्यु- पदेशाच्च । जो यह कहा कि—“ब्रह्म आत्मा की एकता के ज्ञान से अविद्या की निवृत्ति होती है”, यह भी असंगत बात है, क्यों कि-बंधन जब पारमार्थिक है तो उसका छुटकारा, ज्ञान द्वारा संभव नहीं है । पाप पुण्य कर्मों के कारण देवादि शरीरों का प्रवेश, तदनुसार सुखदुःखादि की अनुभूति रूप से होने वाला बंधन मिथ्या है, ऐसा कहना समीचीन नहीं है । ऐसे बंधन की निवृत्ति तो भगवत् शरणागति रूप भक्ति उपासना से लब्ध परमात्मा की कृपा से ही संभव है, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। आपके ankurnagpal108@gmail.com