श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१४ ) अभिमत अद्वैत ज्ञान से जब वस्तु की यथार्थ भेदस्थिति और मिथ्यात्व का आभास होता है तो (मेरी समझ से) बंधन की वृद्धि ही होती है।" एक वस्तु कभी अन्य वस्तु नहीं हो सकती, इसलिए (जीव की ब्रह्म भावोक्ति) मिथ्या है" इस शास्त्र वाक्य से उक्त बात पुष्ट होती है। “उत्तम पुरुष (परमात्मा) अन्य है”—“आत्मा और प्रेरिता को भिन्न मानकर' इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा से विलक्षण, अन्तर्यामी परब्रह्म के ज्ञान को ही परम पुरुषार्थ मोक्ष का साधन बतलाया गया है। अपि च भवदभिमतस्यापि निवर्त्तकज्ञानस्य मिथ्यारूपत्वा- त्तस्य निवर्त्तकान्तरं मृग्यम्। निवर्त्तकज्ञानमिदं स्वविरोधि सर्वं भेदजातं निवर्त्त्य क्षणिकत्वात्स्वयमेव नश्यतीति चेन्न, तत् स्वरूप तदुत्पत्तिविनाशानां काल्पनिकत्वेन विनाशतत् कल्पनाकल्परूपा- विद्याया निवर्त्तकांतरमन्वेषणीयम्। तद्विनाशो ब्रह्मस्वरूपमेवेति चेत्, तथा सति निवर्त्तक ज्ञानोत्पत्तिरेव न स्यात्, तद्विनाशे तिष्ठति तदुत्पत्त्यसंभवात्। एक बात और भी है कि-आपका अभिमत अज्ञान निवर्त्तक (अद्वैत) ज्ञान ही जब मिथ्या है (बुद्धि विज्ञान असत्य होता है) तो उस मिथ्या निवर्त्तक ज्ञान की निवृत्ति के लिए किसी अन्य निवर्त्तक ज्ञान की खोज करनी पड़ेगी। यदि यह निवर्त्तक ज्ञान अपने विरोधी भेद का क्षण भर में निराकरण करके स्वयं विनष्ट हो जाता है, तब तो इस ज्ञान के स्वरूप, उत्पत्ति और विनाश सब कुछ काल्पनिक सिद्ध होंगे, इसलिए उसके निवारण के लिए अविद्या निवारक अन्य साधन की खोज ही श्रेयस्कर है। अविद्या विनाश को ही यदि ब्रह्म स्वरूप कहा जाय तो निवर्त्तक ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती। उसके विनाश में उसी की उत्पत्ति संभव नहीं है। अपि च चिन्मात्रब्रह्मव्यतिरिक्तकृत्स्ननिषेधविषयज्ञानस्यै कोऽयं ज्ञाता ? अध्यासरूप इतिचेत्, न, तस्य निषेध्यतया निवर्त्तक ankurnagpal108@gmail.com