भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

ज्ञान कर्मत्वात् तत्कर्त्तृत्वानुपपत्तेः । ब्रह्मस्वरूपमिति चेत्, ब्रह्मणो निवर्त्तकज्ञानंप्रति ज्ञातृत्वं कि स्वरूपम्; उताध्यस्तम् । अध्यस्तं चेत्, अयमध्यासस्तन्मूलविद्यांतरं च निवर्त्तकज्ञान विषयतया तिष्ठत्येव । निवर्त्तकज्ञानान्तराभ्युपगमे तस्यापि त्रिरूपत्वात् ज्ञातृपेक्ष- याऽनवस्था स्यात् । ब्रह्मस्वरूपस्यैव ज्ञातृत्वेऽस्मदीयएव पक्षः परिगृहीतः स्यात् । निवर्त्तक ज्ञानस्वरूपंस्वस्य ज्ञाता च ब्रह्म व्यति- रिक्तत्वेन स्वनिवर्त्यान्तर्गतमिति वचनं "भूतलव्यतिरिक्तं कृत्स्नं देवदत्तेन छिन्नम्" इत्यस्यामेव छेदनक्रियायामस्य छेत्तुरस्याश्छेदन क्रियायाश्चच्छेद्यानुप्रवेशवचनवदुपहास्यम्। अध्यस्तो ज्ञाता स्वनाश- हेतुभूतनिवर्त्तकज्ञाने स्वयं कर्त्ता च न भवति । स्वनाशस्यापुरुषार्थ- त्वात् । तन्नाशस्य ब्रह्मस्वरूपत्वाभ्युपगमे भेददर्शनतन्मूलाविद्यादीनां कल्पनमेव न स्यात् । इत्यलमनेन दिष्टहतमुद्गराभिघातेन । एक बात और भी विचारणीय है कि- चिन्मात्र ब्रह्म से भिन्न समस्त पदार्थों के निवारक ज्ञान का ज्ञाता कौन है ? अध्यास तो ज्ञाता हो नहीं सकता, क्यों कि-वही तो प्रत्याख्यान का विषय है, वह तो निवर्त्तक ज्ञान का कर्म ही हो सकता है, उसमें स्वयं ज्ञातृत्व नहीं हो सकता । यदि ब्रह्मस्वरूप को ही ज्ञाता कहते हो तो अविद्या निवर्त्तक ज्ञान संबंधी ब्रह्म की जो ज्ञातृता है वह उसका अपना स्वरूप है अथवा अध्यस्त (अविद्याकल्पित) रूप है ? यदि अध्यस्तरूप है, तो अध्यास और अध्यास की मूलकारण एक और अविद्या होगी, जो कि-निवर्त्तक ज्ञान का विषय न होने से सदा बनी रहेगी। यदि उसके निवारण के लिए एक और निवारक ज्ञान की कल्पना करते हो तो, उस ज्ञान को भी ज्ञाता-ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों में अन्तर्भूत करना होगा, फिर उसका ज्ञाता कौन होगा ? फिर तो अनवस्था हो जायगी । यदि ब्रह्म के स्वरूप की ज्ञातृता स्वीकारते हो तो, हमारा ही पक्ष स्वीकारते हो । ब्रह्म को अविद्या निवर्त्तक ज्ञान स्वरूप और उसका ज्ञाता मान- कर, ब्रह्म से भिन्न स्वनिवर्त्त्य पदार्थ के अन्तर्गत मानें तो "देवदत्त ने