भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २२० ) सकेतयितृपुरुषाज्ञानाच्चतेष्वर्थेषु तेषांशब्दानां प्रयोगो बोधकत्वं निबंधन इति निश्चिन्वंति । पुनश्च व्युत्पन्नेतर शब्देषु, “अस्यशब्द- स्यायमर्थः” इति पूर्ववृद्धैः शिक्षिताः सर्वशब्दानामर्थमवगम्य पर- प्रत्यायनाय तत्तदर्थविबोधि वाक्यजातं प्रयुंजते । प्रकारान्तरेणापि शब्दार्थसंबंधावधारणं सुशकम् केनचित् पुरुषेण हस्तचेष्टादिना “पितास्ते सुखमास्ते” इति देवदत्ताय ज्ञापयेति प्रेषितः कश्चित् तज्ज्ञापने प्रवृत्तः “पितास्ते सुखमास्ते” इति शब्दं प्रयुङ्क्ते । पास्वं- स्थोऽन्यो व्युत्पित्सुर्मूकवच्चेष्टाविशेषज्ञस्तज्ज्ञापने प्रवृत्तमिमं ज्ञात्वाऽ- नुगतस्तज्ज्ञापनाय प्रयुक्तं इम शब्द श्रुत्वा “अयं शब्दस्तदर्थबुद्धि- हेतुः” इति निश्चिनोति-इति कार्यार्थं एव व्युत्पत्तिरिति निर्बन्धो निर्निबन्धनः । अतो वेदांताः परिनिष्पन्नं परंब्रह्म, तदुपासनं चाप- रिमितफलं बोधयंतीति तन्निर्णयफलो ब्रह्मविचारः कर्त्तव्यः । इस पर उत्तर पक्ष का कथन यह है कि-सामान्यतः शब्द और अर्थ सम्बन्धी ( वाच्य वाचक भाव ) अवधारण की प्रसिद्ध प्रणाली को छोड़कर समस्त शब्दों की अलौकिक अर्थावबोध की प्रणाली का प्रतिपादन प्रामाणिकों की दृष्टि में बहुमान्य नहीं हो सकता । अबोध बालक शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को वे अपने माता पिता आदि गुरुजनों से “मां, पिता, मामा आदि, चन्द्र, पशु, नर, मृग, पक्षी, सर्प आदि को अंगुली के निर्देश से इनको जानो और याद रक्खो” शिक्षा प्राप्त करते हैं; इस प्रकार उन-उन शब्दों का वही वही अर्थ अनेक बार बतलाने पर धीरे-धीरे उन उन शब्दों का उन्हीं अर्थों में प्रयोग करते देखकर तथा उन शब्दों को किसी अन्य अर्थ में प्रयुक्त होते न देखकर, संकेत करने वाले व्यक्ति के बिना भी वे बालक अपनी बुद्धि से उन शब्दों की उन्हीं अर्थों में प्रयोग बोधकता निश्चित कर लेते है । अव्युत्पन्न शब्दों में “इस शब्द का यह अर्थ है” अपने पूर्वजों से जानकर दूसरों को प्रबोधित करने के लिये और स्वतः भी भिन्न भिन्न अर्थ बोधक वाक्यों का प्रयोग करते हैं ।