श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 281, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( २२१ )
अन्य प्रकारों से भी शब्दार्थ सम्बन्ध का अवधारण किया जा सकता है। “तुम्हारे पिता सुख पूर्वक हैं, ऐसा देवदत्त से कह देना” ऐसा हाथ से चेष्टा पूर्वक किसी व्यक्ति के बतलाने पर कोई व्यक्ति उस समाचार को बतलाने में “तुम्हारे पिता सुख से है” ऐसा प्रयोग करता है। मूक की तरह चेष्टा या हस्त संकेत मात्र से समझने वाला कोई अन्य व्यक्ति, जो कि उस वार्ता को देख रहा था, जानने की इच्छा से संदेशवाहक व्यक्ति के पीछे पीछे जाकर, संदेश में प्रयुक्त उन्हीं शब्दों को सुनकर अपनी धारणा बनाता है कि—यह शब्द उस आदिष्ट अर्थ बोध का कारण है। इसलिए-कार्य बोधक वाक्य से ही व्युत्पत्ति (शब्दार्थ सम्बन्ध ग्रहण) हो—ऐसा आग्रह निराधार है। इससे निश्चित होता है कि—वेदांत वाक्य, स्वतःसिद्ध परब्रह्म और उनकी उपासना तथा उस उपासना के अपरिमित फल के बोधक है; इसलिए वेदांतार्थ के निर्णय के लिए ब्रह्म विचार कर्त्तव्य है। कार्यार्थत्वेऽपि वेदस्य ब्रह्मविचारः कर्त्तव्य एव। कथम “आत्मा वा अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो, मंतव्यो निदिध्यासितव्यः”, सोऽन्वेष्टव्यः विजिज्ञासितव्यः”, विज्ञाय प्रज्ञांकुर्वीत”; दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः तस्मिन् यदंतः तदन्वेष्टव्यंतद्वाव विजिज्ञासितव्यम्”, “तत्रापि दहरं गगनं विशोकः तस्मिन्यदंतः तदुपासितव्यम्”— इत्यादिभिः प्रतिपन्नोपासनविषयकार्याधिकृतफलत्वेन “ब्रह्मविद आप्नोति परम्” इत्यादिभिः ब्रह्मप्राप्ति श्रूयत इति ब्रह्मस्वरूप तद्विशेषणानां दुःखसंभिन्नदेशविशेषरूप स्वर्गादिवत्, रात्रिसत्र- प्रतिष्ठादिवत्, अपगोरणशतयातनासाध्यसाधनभाववच्च, कार्योप- योगितयैव सिद्धेः। वेद की कार्यार्थता स्वीकारने पर भी ब्रह्म विचार ही कर्त्तव्य है। यदि पूछें कि कैसे ? तो सुनिये—“अरे आत्मा ही देखने सुनने, मनन करने और चिंतन करने योग्य है”, वही अन्वेषणीय और जिज्ञास्य है, “उसे जानकर धारणा बनाओ”, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है, उसके अन्दर