श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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“गाय लाओ” इत्यादि वाक्यों में भी कार्यार्थक व्युत्पत्ति नहीं है। आपके अभिमत, कार्य का, कौन सा रूप, उक्तवाक्य में निहित है, यह समझ में नहीं आता। पुरुष की चेष्टा के अस्तित्व में ही जिसका अस्तित्व है तथा पुरुष की चेष्टा ही जिसका उद्देश्य है वही तो आपके कार्य का स्वरूप होगा। चेष्टा के उद्देश्य का तात्पर्य है, चेष्टा का कार्य या विषय। चेष्टा के कर्म का तात्पर्य है, चेष्टा द्वारा प्राप्त अभिलषित इष्ट। सुख या उपस्थित दुःख की निवृत्ति ही तो मनुष्य का अभिलषित इष्ट होता है। इष्ट सुख प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को यह आभास होता है कि—अपने स्वतः प्रयास के बिना, इष्टसिद्धि संभव नहीं है, इसलिए प्रयास की इच्छा से वह कार्य में प्रवृत्त होता है। इच्छित विषय के प्रयत्नाधीन हुए बिना प्रयत्न उद्देश्यता, कभी देखी नहीं जाती [अर्थात् बिना प्रयास के उद्देश्य की प्राप्ति किसी को होती नहीं]। ‘यह अभीष्ट विषय मेरे प्रयास के अधीन है’ ऐसा भान होने के बाद ही कार्य में प्रवृत्ति होती है, इसी को प्रयत्नाधीन सिद्धि कहते हैं। सुख ही जब मनुष्य का अनुकूल विषय है तो कृति के उद्देश्य (चेष्टा के विषय) को पुरुष के अनुकूल नहीं कहा जा सकता, और न दुःख की निवृत्ति ही पुरुषानुकूलता है। सुख मनुष्य का अनुकूल तथा दुःख प्रतिकूल होता है, यही सुख दुःख संबंधी विवेक है। प्रतिकूल होने के कारण ही दुःख की निवृत्ति इष्ट होती है, न कि अनुकूल होने से। अनुकूल और प्रतिकूल संबंध शून्य स्वरूपावस्थिति ही तो दुःख निवृत्ति कहलायेगी [अर्थात् दुःख निवृत्ति ही सुख नहीं है, दुःख निवृत्ति की अवस्था में न सुख रहता है न दुःख] सुख रहित क्रियाओं में अनुकूलता हो नहीं सकती, और न सुखार्थ साधन होने से ही उन्हें अनुकूल कहा जा सकता है, क्योंकि सारे साधन प्रायः दुःखात्मक ही होते हैं। सुखार्थक तो वे तभी हो सकते हैं, जब उन्हें अपनी इच्छा से सुख के साधन बनाया जाय [अर्थात् दुःख की निवृत्ति में जो स्थिति होती है, उसे शान्ति कहा जा सकता है, वह शान्ति सुख का साधन तो है, पर जभी है जब कि मनुष्य, साधन रूप उस शान्ति को, साध्य रूप चिर शांति बनाये रखने के लिए, अनवरत प्रयास करता रहे, अन्यथा वह शांति भी खलने लगेगी]। क्रिया के शेष को भी क्रिया का उद्देश्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आपका ही मत है कि—शेषिता अनिरूपणीय तत्त्व है।