श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२४ ) न च परोद्देशप्रवृत्तकृतिव्याप्यर्हत्वंशेषत्वमिति तत् प्रति- संबंधी शेषीत्यवगम्यते । तथासति कृतेरशेषत्वेन तां प्रति तत्साध्यस्य शेषित्वाभावात् । न च परोद्देशप्रवृत्त्यर्हतायाशेषत्वेन परः शेषी, उद्देश्यत्वस्यैव निरूप्यमाणत्वात् प्रधानस्यापि भृत्योद्देश- प्रवृत्त्यर्हत्वदर्शनाच्च । प्रधानस्तु भृत्यपोषणेऽपि स्वोद्देशेन प्रवर्त्तत इति चेन्न, भृत्योऽपि हि प्रधानपोषणे स्वोद्देशेनैव प्रवर्त्तते; कार्य- स्वरूपस्यैवानिरूपणात् “कार्यप्रतिसंबंधी शेषः, तत्प्रतिसम्बन्धी शेषी” इत्यप्यसंगतम् । दूसरे फल के उद्देश्य से प्रारंभ किये गये प्रयास के अनुगत विषय को शेष तथा उसके संपर्कित विषय को शेषी नहीं कहा जा सकता । क्योंकि—कृति (प्रयत्न) ही जब शेष नहीं हो सकता, तो उससे संपर्कित साध्य विषय ही, शेषी कैसे हो सकता है । परोद्देश्य प्रवृत्ति योग्य को शेष तथा पर को शेषी कहें, ऐसा भी असंभव है, क्योकि-पर वस्तु की उद्देश्यत्ता ही निरूपित हो सकती है । प्रधान की भृत्य के प्रति प्रवृत्त कराने की क्षमता देखी जाती है [प्रधान स्वयं भृत्य के शासन में प्रवृत्त होता नहीं देखा जाता] यदि कहो कि—प्रधान भृत्य का पोषण, अपने उद्देश्य से ही करता है, सो ऐसा नही, भृत्य भी तो प्रधान की सेवा अपने उद्देश्य से करता है । इस प्रकार कार्य के स्वरूप का निरूपण ही जब दुरूह है, तो कार्य प्रतिसंबंधी शेष और उसके प्रतिसंबंधी शेषी का ऐसा निर्देश भी असंगत है । नापि कृतिप्रयोजनत्वं कृत्युद्देश्यत्वम्, पुरुषस्य कृत्यारम्भ प्रयोजनमेव हि कृतिप्रयोजनम् । स चेच्छाविषयः । तस्मादिष्ट- त्वातिरेकिकृत्युद्देश्यत्वानिरूपणात् कृतिसाध्यताकृति प्रधानत्वरूपं कार्यं दुर्निरूपमेव । कृति (प्रयत्न) के प्रयोजन को ही कृत्युद्देश्य नहीं कह सकते । मनुष्य के कार्यारम्भ का प्रयोजन ही वस्तुतः कृति का प्रयोजन होता है, ankurnagpal108@gmail.com