श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२५ ) वह पुरुष की इच्छा का विषय होता है। इसलिए जब कि इष्टता (इच्छाविषता) से भिन्न कृत्युद्देश्यता नही हो सकती तो कृति साध्य (यत्ननिष्पाद्य) कृति प्रधान विषय को ही कार्य कहना कठिन है। नियोगस्याप साक्षादिषिविषयभूत सुखदुःखनिर्वृत्तिभ्यामन्यत्वा तत्साधतयैवेष्टत्वं कृतिसाध्यत्वं च। अत एव हि तस्य क्रियाति- रिक्ता, अन्यथा क्रियैव कार्यं स्यात्; स्वर्गकामपदसमभिव्याहारा- नुगुण्येन लिङादिवाच्यं कार्यं स्वर्गसाधनमेवेतिक्रणभंगिकर्मातिरेकि स्थिरं स्वर्गसाधनमपूर्वमेव कार्यमिति स्वर्गसाधनतोल्लेखेनैव हि अपूर्व व्युत्पत्तिः। अतः प्रथमनमन्यार्थतया प्रतिपन्नस्य कार्यस्यान- न्यार्थत्वनिर्वहणायापूर्वमेव पश्चात् स्वर्गसाधन भवतीत्युपहास्यम्। स्वर्गकामपदान्वितकार्याभिधायिपदेन प्रथमप्यनन्यार्थतानभिधानात् सुखदुःखनिर्वृत्ति तत्साधनेभ्यो अन्यस्यानन्यार्थस्याकृतिसाध्यता प्रतीत्यनुपपत्तेश्च। सुखदुःख निवृत्ति दोनों ही इच्छा के विषय हो सकते है (विधि- वाक्यगत) नियोग, सुख दुःख निवृत्ति से पृथक् वस्तु है। नियोग के विषय में जो इच्छा होती है, वह सुख दुःख निवृत्ति विषयक ही होती है, तथा उसके साधन रूप नियोग की इष्टता और कृति साध्यता भी होती है; इसी से उसकी, क्रिया से भिन्नता होती है, अन्यथा क्रिया ही कार्य हो जाय (अर्थात् अनुष्ठान और फल एक हो जाय) स्वर्गकाम पद के साथ एक योग में संबंधित "लिंग" आदि विभक्ति से जो कार्य प्रतीत होता है, वही स्वर्ग का साधन है। इससे ज्ञान होता है कि-क्षणभंगुर याग आदि कर्मों से पृथक् एवं चिरस्थायी स्वर्ग साधन, "अपूर्व" (पाप- पुण्यरूप अदृष्ट) ही कार्य है। स्वर्ग साधनोल्लेख से "अपूर्व शब्द के अर्थ की ही प्रतीति होती है। इस प्रकार" अपूर्व "और" कार्य "जब एक ही वस्तु है तब दोनों की अभिन्नता के लिए पहिले उसे "अपूर्व" कह कर उसे ही स्वर्ग साधन बतलाना उपहासास्पद बात है। "स्वर्गकाम" पद के साथ संबद्ध कार्य बोधक पद, पहिले भी अभिन्नता अर्थ का प्रतिपादन नहीं करता, क्यों कि-सुखदुःख निवृत्ति और उन दोनों के साधन से भिन्न "अनन्यता" अर्थ कभी कृतिसाध्यता ज्ञान से उत्पन्न नहीं हो