भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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सव ता [तात्पर्य यह है कि-स्वर्गकामः अश्वमेधेन यजेत" यह विधिवाक्य पहिले “लिगं” विभक्ति से यज्ञ की कर्त्तव्यता बतलाता है पुनः “स्वर्गकाम” से संबद्ध होकर यज्ञ की स्वर्गसाधनता का अर्थ प्रतिपादन करता है। यज्ञ एक अल्प कालीन क्रिया मात्र है, इससे कालांतरभावी स्वर्ग साधन होना संभव नही है इसलिए यज्ञ के अतिरिक्त “अपूर्व” नामक यज्ञ फल को स्वीकारना पड़ता है। यज्ञ के उपयुक्त फल न होने तक वह “अपूर्व” रहता है, फलावाप्ति कराकर वह समाप्त हो जाता है। स्वर्ग सुख की स्वाभाविक लालसा होती है, उस सुख की प्राप्ति के लिए ही लोगो की यज्ञ की ओर प्रवृत्ति होती है। इसलिए “अपूर्व” और “कार्य” पहिले अभिन्न रूप से माने जाये बाद मे स्वर्ग के साधन माने जाये, यह बात समझ मे नही आती] अपि च किमिदं नियोगस्य प्रयोजनत्वम् ? सुखवन्नियोगस्या- प्यनुकूलत्वमेवेति चेत्; किं नियोगस्सुखम्, सुखमेव हि अनुकूलम् । सुखविशेषवन्नियोगापरपर्यायं विलक्षणं सुखान्तरमिति चेत्; किं तत्र प्रमाणमिति वक्तव्यम् स्वानुभवश्चेत्, न, विषयविशेषानुभवसुख- वन्नियोगानुभवसुखमिदमिति भवताऽपि नानुभूयते । शास्त्रेण नियोगस्य पुरुषार्थतया प्रतिपादनात् पश्चात्तु भोक्ष्यत इति चेत्, किं तन्नियोगस्य पुरुषार्थत्ववाचिशास्त्रम् । न तावल्लौकिकं वाक्यं तस्यदुःखात्मकक्रियाविषयत्वात् तेन सुखादिसाधनतयैव कृतिसाध्य- तामात्र प्रतिपादनात् । नापि वैदिकं, तेनापिस्वर्गादि साधनतयैव कार्यस्य प्रतिपादनात् । नापिनित्यनैमित्तिकशास्त्रम् तस्यापि तद- भिधायित्वं स्वर्गकामवाक्यस्थापूर्वव्युत्पत्तिपूर्वकमित्युक्तरीत्या तेनापि सुखादिसाधनकार्याभिधानमवर्जनीयम् । नियतैहिक फलस्य कर्मणोऽनुष्ठितस्य फलत्वेन तदानीमनुभूयमानान्नाद्यरोगतादि व्यति- रेकेण नियोगरूप सुखानुभवानुपलब्धेश्च नियोगः सुखमित्यत्र न [किंचन प्रमाणमुपलभामहे अर्थवादादिष्वपि स्वर्गादिसुख प्रकार- कीर्त्तनवन्नियोगरूपसुख प्रकारकोर्त्तनं भवताऽपि न दृष्टचरम् ।