श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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मैं पूछता हूँ कि- इस विधिवाक्यस्थ नियोग की प्रयोजकता क्या है ? यदि सुख की तरह अनुकूलता ही नियोग की प्रयोजकता है, तो क्या सुख ही नियोग है ? क्योंकि सुख ही एकमात्र अनुकूल होता है । यदि सुख विशेष की तरह नियोग को भी एक प्रकार का सुख ही मानते हो तो इसका तात्पर्य हुआ कि नियोग, सुख का नामांतर मात्र है; इसबात को भी प्रमाणित करना पड़ेगा । अपने अनुभव को ही प्रमाण नहीं कह सकते, विषय विशेष के अनुभूत सुख की तरह “नियोगानुभव में सुख हुआ” ऐसा तो आप भी नहीं कह सकते । यदि शास्त्र से, नियोग का पुरुषार्थ रूप से प्रतिपादन करने से उसकी भोग्यता (सुखरूपता) निश्चित होती है तो नियोग को पुरुषार्थ बतलाने वाले वे शास्त्र वाक्य कौन से हैं ? लौकिक वाक्यों को तो (नियोगवाची) कह नहीं सकते, क्यों कि-उनमें प्रायः दुःखात्मक क्रिया का ही वर्णन है, जिससे सुखादि साधन रूप से ही कर्त्तव्यता का प्रतिपादन होता है । वैदिक वाक्यों को भी (नियोगवाची) नहीं कह सकते उनमें भी प्रायः स्वर्ग साधनरूप से कार्य का प्रतिपादन होता है । नित्य नैमित्तिक क्रिया विधायक शास्त्र भी (नियोगवाची) नहीं कहे जा सकते, क्यों कि-“स्वर्गकामः यजेत्” से जिस “अपूर्व” शक्ति की कल्पना की जाती है, उसके अनुसार ही नित्य नैमित्तिक क्रिया विधायक वाक्यों की अर्थ बोधकता कल्पित होती है; इस प्रकार उनसे भी सुखादि साधन रूप कार्य का ही प्रतिपादन होता है, जो कि अनिवार्य है । जिन कर्मों का फल इस लोक में ही निश्चित है, उन कर्मों का अनुष्ठान करने पर, फलस्वरूप अनुभूत, असन, वसन निरोगता आदि के अतिरिक्त, “नियोग” जन्य किसी विशेष सुख की उपलब्धि तो होती नहीं; जिससे नियोग को सुख कहा जाय, अतः “नियोग” का सुख मानने में कोई भी प्रमाण नहीं है । अर्थवाद आदि वाक्यों में भी स्वर्गादि सुख के जो प्रकार कहे गए हैं, उनकी तरह, नियोग रूप सुख के प्रकार का वर्णन तो संभवतः आपको भी किसी शास्त्र में दृष्टिगत न हुआ होगा । अतो विधिवाक्येष्वपि धात्वर्थस्य कर्त्तृव्यापार साध्यतामात्रं शब्दानुशासनसिद्धमेव लिंगादेर्वाच्यमित्यध्यवसीयते । धात्वर्थस्य च यागादेरग्न्यादि देवतान्तर्यामिपरंपुरुषसमाराधनरूपता, समाराधि-