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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 696 में से

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पृष्ठ 288

...न्तरात् पुरुषात्फलसिद्धिश्चेति "फलमत उपपत्तेः" इत्यत्र प्रति- पादयिष्यते । अतोवेदान्ताः परिनिष्पन्नं परंब्रह्म बोधयन्तीति ब्रह्मोपासनफलानन्त्यंस्थिरत्वं च सिद्धम् । चातुर्मास्यादि कर्मस्वपि केवलस्यकर्मणः क्षयिफलत्वोपदेशादक्षयफलश्रवणं "वायु- श्चांतरिक्षं चैतदमृतम्" इत्यादिवदापेक्षिकं मंतव्यम् । अतः केवलानां कर्मणामल्पास्थिरफलत्वात् ब्रह्मज्ञानस्य चानंतस्थिरफलत्वात् तन्निर्णयफलो ब्रह्मविचारारम्भोयुक्त इति स्थितम् । इससे सिद्ध होता है कि-विधिवाक्यों में कर्त्ता की कार्य साध्यता मात्र ही, लिंग आदि धातु का शब्दानुशासन (व्याकरण) सिद्ध सही वाच्यार्थ है । अग्नि आदि देवताओं के भी अन्तर्यामी परमपुरुष भगवान की सम्यक् आराधना तथा आराधित परमपुरुष से होने वाली फलसिद्धि ही, यागादि शब्द वाच्य "यज्" धातु का मुख्यार्थ है; "फलमत उपपत्तेः" सूत्र में इसी तथ्य का प्रतिपादन किया जायगा। वेदांत वाक्य स्वतः सिद्ध परं ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, उसी से ब्रह्मोपासना की अनंत और स्थिर फलता भी सिद्ध होती है। चातुर्मास्य आदि कर्मों में भी केवल कर्म के फल को नाशवान् बतलाया गया है । "वायु और अंतरिक्ष दोनों अमृत हैं" इस वाक्य में जैसे "अमृत" का अर्थ आपेक्षिक है (अर्थात् अन्यों की अपेक्षा चिरस्थायी है) वैसे ही चातुर्मास्यादि व्रतों का फल आपेक्षिक है । इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान संबंध रहित केवल कर्मों का फल अल्प और अस्थिर तथा ब्रह्म ज्ञान का फल अनंत और स्थिर है, अतः ब्रह्म ज्ञान के स्वरूप निरूपण के लिए ब्रह्म विचार करना आवश्यक है, यही मत निश्चित होता है । २ जन्माद्यधिकरण- किं पुनस्तद्ब्रह्म, यज्जिज्ञास्यमुच्यते, इत्यत्राहः- जिसे जिज्ञास्य कहा गया है, वह ब्रह्म कैसा है ? इसी आकांक्षा का समाधान करते हैं । ankurnagpal108@gmail.com

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