श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२६ ) जन्माद्यस्य यतः १।१।२— जन्मादीति, सृष्टिस्थितिप्रलयम् तद्गुण संविज्ञानो बहुव्रीहिः । अस्याचिन्त्यविविधविचित्ररचनस्यनियतदेशकालफलभोग ब्रह्मादिस्त- म्बपर्यन्तक्षेत्रज्ञमिश्रस्य जगतः । यतः—यस्मात् सर्वेश्वरान्निखिल- हेयप्रत्यनीकस्वरूपात्सत्यसंकल्पाद्ज्ञानानंदाद्यनंतकल्याणगुणात् सर्व- ज्ञात् सर्वशक्तेः परमकारुणिकात् परस्मात् पुंसः सृष्टिस्थितिप्रलयाः वर्त्तन्ते; तत् ब्रह्मेति सूत्रार्थः । जन्मादि का अर्थ है, सृष्टि, स्थिति और प्रलय । यहाँ तद्गुण संविज्ञान बहुव्रीहि समास है । अस्य का अर्थ; अचिन्त्य, विविध, विचित्र रचनात्मक, नियमित देश-काल-फलोपभोग संपन्न, ब्रह्म से लेकर स्तम्ब पर्यन्त, जीवों से युक्त जगत् है । यतः का तात्पर्य है--जिस, हीन दोष रहित, सत्यसंकल्प, ज्ञानआनंदादि अनंत कल्याणमय गुणवाले, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, परमकारुणिक, सर्वेश्वर, परब्रह्म, परमात्मा, से सृष्टि- स्थिति-प्रलय का प्रवर्त्तन होता है, वही ब्रह्म है । यही सूत्रार्थ है । पूर्वपक्षः—भृगुर्वैवारुणिः, वरुणं पितरमुपससार, अधीहिभगवो ब्रह्म"—यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म"—इति श्रूयते । तत्र संशयः किमस्माद्वाक्यात् ब्रह्मलक्षणतः प्रतिपत्तुं शक्यते, नवा इति । किं प्राप्तं ? न शक्यमिति, न तावज्जन्मादयो विशेषणत्वेन ब्रह्म लक्षयन्ति, अनेकविशेषणव्यावृत्तत्वेन ब्रह्मणोऽनेकत्वप्रसक्तेः, विशेषणत्वंहि व्यावर्तकत्वम् । "वरुण पुत्र भृगु, वरुण के निकट जाकर कहते हैं —भगवन् ! मुझे ब्रह्म का उपदेश दें"—जिससे यह सारा भूत-समुदाय उत्पन्न होता है, जिसके आधार पर जीवित रहता है, तथा प्रयाण के समय जिनमें लीन हो जाता है, उसी को जानने की चेष्टा करो वही ब्रह्म है—"ऐसा श्रुति प्रमाण है । यहाँ संशय होता है कि— इस वाक्य से ब्रह्म का लक्षण जाना जा सकता है या नहीं ? कह सकते हैं कि— नहीं जान सकते, क्यों कि— उक्त वाक्य में जन्म आदि विशेषणों वाले ब्रह्म का व्याख्यान है, अनेक ankurnagpal108@gmail.com