श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( २२६ ) जन्माद्यस्य यतः १।१।२— जन्मादीति, सृष्टिस्थितिप्रलयम् तद्गुण संविज्ञानो बहुव्रीहिः । अस्याचिन्त्यविविधविचित्ररचनस्यनियतदेशकालफलभोग ब्रह्मादिस्त- म्बपर्यन्तक्षेत्रज्ञमिश्रस्य जगतः । यतः—यस्मात् सर्वेश्वरान्निखिल- हेयप्रत्यनीकस्वरूपात्सत्यसंकल्पाद्ज्ञानानंदाद्यनंतकल्याणगुणात् सर्व- ज्ञात् सर्वशक्तेः परमकारुणिकात् परस्मात् पुंसः सृष्टिस्थितिप्रलयाः वर्त्तन्ते; तत् ब्रह्मेति सूत्रार्थः । जन्मादि का अर्थ है, सृष्टि, स्थिति और प्रलय । यहाँ तद्गुण संविज्ञान बहुव्रीहि समास है । अस्य का अर्थ; अचिन्त्य, विविध, विचित्र रचनात्मक, नियमित देश-काल-फलोपभोग संपन्न, ब्रह्म से लेकर स्तम्ब पर्यन्त, जीवों से युक्त जगत् है । यतः का तात्पर्य है--जिस, हीन दोष रहित, सत्यसंकल्प, ज्ञानआनंदादि अनंत कल्याणमय गुणवाले, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, परमकारुणिक, सर्वेश्वर, परब्रह्म, परमात्मा, से सृष्टि- स्थिति-प्रलय का प्रवर्त्तन होता है, वही ब्रह्म है । यही सूत्रार्थ है । पूर्वपक्षः—भृगुर्वैवारुणिः, वरुणं पितरमुपससार, अधीहिभगवो ब्रह्म"—यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म"—इति श्रूयते । तत्र संशयः किमस्माद्वाक्यात् ब्रह्मलक्षणतः प्रतिपत्तुं शक्यते, नवा इति । किं प्राप्तं ? न शक्यमिति, न तावज्जन्मादयो विशेषणत्वेन ब्रह्म लक्षयन्ति, अनेकविशेषणव्यावृत्तत्वेन ब्रह्मणोऽनेकत्वप्रसक्तेः, विशेषणत्वंहि व्यावर्तकत्वम् । "वरुण पुत्र भृगु, वरुण के निकट जाकर कहते हैं —भगवन् ! मुझे ब्रह्म का उपदेश दें"—जिससे यह सारा भूत-समुदाय उत्पन्न होता है, जिसके आधार पर जीवित रहता है, तथा प्रयाण के समय जिनमें लीन हो जाता है, उसी को जानने की चेष्टा करो वही ब्रह्म है—"ऐसा श्रुति प्रमाण है । यहाँ संशय होता है कि— इस वाक्य से ब्रह्म का लक्षण जाना जा सकता है या नहीं ? कह सकते हैं कि— नहीं जान सकते, क्यों कि— उक्त वाक्य में जन्म आदि विशेषणों वाले ब्रह्म का व्याख्यान है, अनेक ankurnagpal108@gmail.com
( २३० ) विशेषणों से युक्त मानने से ब्रह्म में अनेकता आजायगी । विशेषणता का अर्थ ही पार्थक्य साधक होता है । ननु “देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षः समपरिमाणः” इत्यत्र विशेषणबहुत्वेऽप्येक एव देवदत्तः प्रतीयते । एवमत्राप्येकमेव ब्रह्म भवति । नैवम्—तत्र प्रमाणान्तरेणैक्यप्रतीतेः एकस्मिन्नेव विशेषणा- नामुपसंहारः । अन्यथा तत्रापि व्यावर्तकत्वेनानेकत्वमपरिहार्यम् । अत्र त्वनेनैवविशेषणेन लिलक्षयिषितत्वात् ब्रह्मणः प्रमाणान्तरेणै- क्यमनवगतमिति व्यावर्तकभेदेन ब्रह्मबहुत्वमवर्जनीयम् । (तर्क) “देवदत्त श्यामवर्ण का युवा, लालनेत्रों वाला सुडौल व्यक्ति है” इस वर्णन में, अनेक विशेषणों वाला एकही व्यक्ति कहा गया है, वैसे ही उपर्युक्त ब्रह्मलक्षण बोधक श्रुति वाक्य में अनेक विशेषणों वाले एक ही ब्रह्म का वर्णन है [वितर्क] ऐसी बात नही है क्यों कि- देवदत्त के वर्णन में तो, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से एक देवदत्त की स्पष्ट प्रतीति होती है, इसलिए अनेक विशेषणों का समन्वय हो जाता है, यदि स्पष्ट प्रतीति न होती तो, विशिष्टता ज्ञापक पार्थक्य से अनेकता अनिवार्य हो जाती । ब्रह्म के प्रसंग में तो, विशेषणों द्वारा ही लक्षण बतलाने की चेष्टा की गई है, किसी अन्य प्रमाण से तो उसकी एकता ज्ञात होती नही, इसलिए विभिन्न विशेषताओं से ब्रह्म की अनेकता अनिवार्य हो जाती है । ब्रह्मशब्दैक्यादाप्यैक्यं प्रतीयेत् इति चेत् न, अज्ञातगो व्यक्तेः जिज्ञासो पुरुषस्य “षण्डो मुण्डः पूर्णशृंगो गौः” इत्युक्ते गोपदैक्येऽपि षण्डत्वादि व्यावर्तकभेदेन गोव्यक्तिबहुत्वप्रतीतेः ब्रह्मव्यक्तयोऽपि बह्व्यः स्युः । अतएव लिलक्षयिषिते वस्तुनि एषां विशेषणानां संभूय लक्षणत्वमप्यनुपपन्नम् । ब्रह्म शब्द एक है, इसलिए सारे विशेषण भी एक होंगे ऐसा भी नहीं कह सकते; जैसे-जो व्यक्ति गौ को नही जानता, वह उसे जानना चाहता है, यदि उससे कहा जाय कि-“षण्ड-मुंड बड़ी सींगों वाली गौ होती है” तो उसे एक गौ के विशेषणों के पार्थक्य से अनेक गो रूपों की प्रतीति ankurnagpal108@gmail.com
( २३१ ) होंगी; वैसे ही ब्रह्म की भी बहुत्व प्रतीति होगी । केवल लक्षणों द्वारा जानी जाने वाली वस्तु अनेक विशेषणों से सम्मिलित लक्षण वाली नहीं हो सकती । नाप्युपलक्षणत्वेन लक्षयंति, आकारान्तराप्रतिपत्तेः उपलक्ष- णानामेकेनाकारेण प्रतिपन्नस्य केनचिदाकारान्तरेण प्रतिपत्ति हेतुत्वं हि दृष्टं- 'यत्रायं सारसः स देवदत्तकेदारः" इत्यादिषु । उक्त विशेषण, उपलक्षण के रूप से कहे गए हों, ऐसा भी नहीं है, क्यों कि-उक्त लक्षणों से अतिरिक्त कोई अन्य रूप का वर्णन उपलब्ध नहीं होता । “जहाँ वह सारस बैठा है वही देवदत्त का खेत है” इत्यादि उदाहरण में उपलक्षण विशेषणों की एकाकार प्रतीति अन्य प्रकार की होती है (ब्रह्म के प्रसंग में ऐसी अन्य प्रकार की प्रतीति नहीं होती इसलिए, उपलक्षण की बात असंगत है) ननु च-“सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इति प्रतिपन्नाकारस्य जगज्ज- न्मादीनि उपलक्षणानि भवन्ति । न इतरेतरप्रतिपन्नाकारापेक्षत्वेन उभयोर्लक्षणवाक्ययोरन्याश्रयणात् । अतो न लक्षणतो ब्रह्म प्रतिपत्तुं शक्यत इति । "ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है" इस वाक्य से जैसा ब्रह्म का रूप ज्ञात होता है, जगज्जन्मादि उसी के उपलक्षण हैं, ऐसा मानना भी ठीक नहीं है; दोनों ही समान रूप से ब्रह्म के स्वरूप लक्षण हैं, ऐसा मानने से दोनों में परस्पर अन्योन्याश्रयता हो जायगी । फिर किसी भी लक्षण द्वारा ब्रह्म के स्वरूप का प्रतिपादन नहीं हो सकेगा । सिद्धान्तः—एवं प्राप्ते ऽभिधीयते—जगत्सृष्टिस्थितिप्रलयैरुप- लक्षणभूतैर्ब्रह्मप्रतिपत्तुं शक्यते । न च उपलक्षणोपलक्ष्याकारव्यतिरि- क्ताकारान्तराप्रतिपत्तेर्ब्रह्मप्रतिपत्तिः, उपलक्ष्यं हि अनवधिका- तिशयवृहत्, बृंहणं च बृहतेर्धातोस्तदर्थत्वात् । तदुपलक्षणभूताश्च जगज्जन्मस्थितिलयाः । “यतो-येनयत” इति प्रसिद्धिवन्निर्देशेन ankurnagpal108@gmail.com
( २३२ ) यथाप्रसिद्धि जन्मादिकारणमनूद्यते । प्रसिद्धिश्च-“सदेवसोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्”-तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत् इत्येकस्यैव सच्छब्दवाच्यस्य निमित्तोपादानरूपकारणत्वेन तदपि- “सदेवेदमग्र एकमेवासीत्” इत्युपादानतां प्रतिपाद्य “अद्वितीयम्” इत्याधिष्ठात्रन्तरं प्रतिषिध्य “तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्” इत्येकस्यैव प्रतिपादनात् । तस्माद् यन्मूला जगज्जन्मस्थितिलयाः तद्ब्रह्मेति जन्मस्थितिलयाः स्वनिमित्तोपादानभूतं वस्तुब्रह्मेति लक्षयन्ति । जगन्निमित्तोपादानताक्षिप्तसर्वज्ञत्वसत्यसंकल्पत्वविचि- त्रशक्तित्वाद्याकारबृहत्त्वेनप्रतिपन्नं ब्रह्मेति च जन्मादीनां तथा प्रतिपन्नस्य लक्षणत्वेन नाकारान्तराप्रतिपत्तिरूपानुपपत्तिः । जगत सृष्टि-स्थिति-प्रलय से उपलक्षित ब्रह्म का प्रतिपादन किया जा सकता है । यह कहना भूल है कि-उपलक्षण और औपलक्ष्य इन दोनों के आकार से भिन्न किसी प्रकार की प्रतीति के बिना ब्रह्म की स्वरूप प्रतीति नहीं हो सकती । औपलक्ष्य (ब्रह्म) सीमा रहित, अतिबृहन् और बृहंण अर्थात् जगद् वृद्धि का हेतु है, “बृह” धातु का यही शब्दार्थ होता है । जगत् का जन्म-स्थिति और लय उसके ही उपलक्षण स्वरूप (परिचायक) हैं । यतः येन और यत् ये तीनों पद, जन्मादि आदि का प्रसिद्ध की तरह निर्देश करते हैं, ये लोक प्रसिद्ध जन्मादि कारण के अनु- वादक मात्र हैं । “हे सोम्य ! यह जगत् सृष्टि के पूर्व एक अद्वितीय सत् ही था, उन्होंने विचार किया कि मैं बहुत होकर जन्म लूं , उन्होंने तेज की सृष्टि की” इस श्रुति में “सत्” पद वाच्य एक ही ब्रह्म की निमित्त और उपादान कारणता सुस्पष्ट है । “यह जगत पहले एक सत् स्वरूप था” इससे ब्रह्म की उपादान कारणता का प्रतिपादन करके “अद्वितीय” पद से अन्य अधिष्ठाता (निमित्त कारण) का निषेध करके “उन्होंने विचार किया बहुत होकर जन्म लूं और फिर तेज की सृष्टि की” इस वाक्य में एक ही ब्रह्म की उपादान और निमित्त कारणता का प्रतिपादन किया गया है, इससे उक्त तथ्य की पुष्टि होती है । इससे ज्ञात होता है कि-जगत् की सृष्टि-स्थिति और लय का मूल ब्रह्म ही है । उक्त वाक्य ankurnagpal108@gmail.com
( २३३ ) जन्म-स्थिति और लय के निमित्त और उपादान कारण को ब्रह्म कह कर लक्षित करते हैं । जगत् के निमित्त और उपादान कारण होने से ही ब्रह्म, सर्वज्ञ-सत्य संकल्प-विलक्षण शक्ति और वृहत्व से पूर्ण है। जन्मादि तथा उसी प्रकार की विशेषताओं से लक्षित होने से, ब्रह्म के लिए की गई आकारान्तर की अनुपपत्ति की शंका भी व्यर्थ हो जाती है । जगज्जन्मादिविशेषणतया लक्षणत्वेऽपि न कश्चिद्दोषः । लक्षणभूतान्यपि विशेषणानिस्वविरोधिब्यावृत्तंवस्तु लक्षयन्ति । अज्ञातस्वरूपे वस्तुन्येकस्मिन् लिलक्षयिषितेऽपि परस्पराविरोध्यनेक- विशेषणलक्षणत्वं न भेदमापादयति । अत्र तु कालभेदेन जन्मादीनां न विरोधः । जगज्जन्मादि विशेषणों से लक्षित होने पर भी ब्रह्म में किसी प्रकार का दोष संभव नहीं है। लक्षणात्मक विशेषण, अपनी विरुद्ध अविशिष्ट वस्तु को ही लक्षित करते हैं । अनेक विशेषण, अज्ञात स्वरूप एक ही वस्तु में, लक्षित होने के लिए प्रस्तुत होकर भी, परस्पर विरोधी नहीं होते, ऐसी बहु विशेषणात्मक लक्षणता, प्रतिपाद्य वस्तु में, विभिन्नता नहीं लाती । विशेषणों की एकाश्रयता प्रतीति से उन सभी का एक में ही समन्वय होता है [ षण्ड, मुण्ड, पूर्ण शृङ्ग आदि परस्पर विरुद्ध विशेषतायें तो व्यक्ति में भेद की परिचायिका हैं ] परन्तु जगत् के जन्मादि विशेषणों में तो विभिन्न कालीनता है इसलिए कोई विरोध नहीं है । “यतोवा इमानि भूतानि जायते” इत्यादि कारण वाक्येन प्रतिपन्नस्यजगज्जन्मादिकारणस्यब्रह्मणः सकलेतरव्यावृत्तं स्वरूप- मभिधीयते— “सत्यंज्ञानमन
( २३४ ) अनन्त पदं--देशकालवस्तुपरिच्छेद रहितं स्वरूपमाह । सगुणत्वा- त्स्वरूपस्य स्वरूपेण गुणैश्चानन्त्यम् । तेन पूर्वपदद्वयव्यावृत्तकोटिद्वय विलक्षणाः सातिशयस्वरूपस्वगुणाः नित्याः व्यावृत्ताः । विशेषणानां व्यावृतकत्वात् । ततः "सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इत्यनेन वाक्येन जगज्जन्मादिनावगतस्वरूपंब्रह्म सकलेतरवस्तुविजातीयमिति लक्ष्यत, इति नान्योन्याश्रयणम् । अतः सकल जगज्जन्मादिकारणं निरवद्यं, सर्वज्ञं, सत्यसंकल्पं, सर्वशक्तिः ब्रह्म लक्षणतः प्रतिपत्तुं शक्यत, इतिसिद्धम् । कारणता बोधक "यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य से, ब्रह्म को, जगत् के जन्मादि का कारण बतलाकर "सत्यं ज्ञान" इत्यादि वाक्य से, ब्रह्म की, अन्यान्य पदार्थों से विलक्षणता दिखलाई गई है । उक्त वाक्य में- सत्य पद, निरुपाधिसत्ता अर्थात् स्वाभाविक सत्ता विशिष्ट ब्रह्म का प्रतिपादक है । जिससे विकार पूर्ण अचेतन तथा उससे संबद्ध चेतन की ब्रह्मता का प्रतिषेध हो जाता है, क्योकि-ये दोनों ही वस्तुएं विभिन्ननामों की मूलकारण, विभिन्न अवस्थाओंवाली होती हैं, इसलिए इनमें निरु- पाधिक सत्ता की अर्हता नहीं रहती । ज्ञान-पद, नित्य-विकसित अद्वैत बिशिष्ट ज्ञान का द्योतक है, जिससे संकुचित ज्ञानवाले मुक्त पुरुषों से भिन्नता सिद्ध होती है । अनन्त-पद, देश-काल और वस्तु कृत परिच्छेद रहित स्वरूप का परिचायक है । ब्रह्म का स्वरूप सगुण है, इसलिए वह गुण और स्वरूप दोनों से अनन्त है । इस पद से, पूर्वोक्त दोनों, सत्य और ज्ञान पदों से प्रतिषिद्ध दो अंशों (असत्य और जड) से भी विलक्षण सातिशय, नित्य, स्वरूप और स्वगुण का भी प्रतिषेध हो जाता है । विशेषणों की व्यावर्तक ( इतर भेदक ) प्रवृत्ति होती है । "सत्यं ज्ञान मनन्तंब्रह्म" इस वाक्य से, जगज्जन्मादि कारण रूप से प्रतिज्ञात ब्रह्म अन्यान्य समस्त पदार्थों से विलक्षण स्वरूप वाला लक्षित होता है, इसलिए दोनों प्रकार के विशेषणों में अन्योन्याश्रता नहीं होती । समस्त जगत् के जन्मादि के कारण, निर्दोष, सर्वज्ञ, सत्य संकल्प और सर्वशक्ति संपन्न ब्रह्म लक्षण द्वारा प्रतिपाध्य है, ऐसा सिद्ध होता है ।
( २३५ ) ये तु निर्विशेषवस्तु जिज्ञास्यमिति वदन्ति। तन्मते “ब्रह्मजिज्ञासा” जन्माद्यस्ययतः इत्यसंगतंस्यात्, निरतिशय बृहत्बृंहणं च ब्रह्मेति वचनात्; तच्च ब्रह्म जगज्जन्मादिकारणं इति वचनाच्च । एवमुत्तरे- ष्वपि सूत्रगणेषु सूत्रोदाहृत श्रुतिगणेषु च ईक्षणाद्यन्वयदर्शनात् सूत्राणि सूत्रोदाहृतश्रुतयश्च न तत्र प्रमाणम् । तर्कश्च साध्यधर्माव्यभि- चारिसाधनधर्मान्वितवस्तुविषयत्वान्न निर्विशेषवस्तुनि प्रमाणम् । जगज्जन्मादि भ्रमोयतस्तद्ब्रह्मेति स्वोत्प्रेक्षा पक्षेऽपि न निर्विशेष वस्तुसिद्धिः भ्रममूलमज्ञानं, अज्ञानसाक्षिब्रह्मेत्यभ्युपगमात् । साक्षित्वं हि प्रकाशैकरसतयैवोच्यते । प्रकाशत्वं तु जडाद्व्यावर्त्तकं, स्वस्यपरस्य च व्यवहारयोग्यतापादनस्वभावेन भवति । तथा सति सविशेषत्वम् । तदभावे प्रकाशतयैव न स्यात् । तुच्छतैव स्यात् । जो यह कहते हैं कि—निर्विशेष वस्तु ही जिज्ञास्य है, उनके मतानुसार “ब्रह्मजिज्ञासा” कहने के बाद “जन्माद्यस्ययतः” कहना ही असंगत होगा । क्योंकि-जो सर्वापेक्षा बृहत् तथा सभी वस्तुओं की वृद्धि के कारण, ब्रह्म कहा जाता है, वही ब्रह्म जगत के जन्मादि का कारण बतलाया गया है । इसी प्रकार परवर्त्ती सूत्रों में भी, सूत्रों और सूत्रों में उदाहृत श्रुतियों में ईक्षण आदि विशेषताओं से उस का संबंध दिखलाया गया है, इसलिए उन सूत्रों और सूत्रोदाहृत श्रुतियों को तो निर्विशेष वस्तु में प्रमाण कह नहीं सकते । जो साधन, साध्य या प्रतिपाद्य विषय के धर्म को नहीं छोड़ सकता, ऐसे साधन धर्म संबद्ध पदार्थ के विषय में ही तर्क किया जा सकता, निर्विशेष वस्तु में तो तर्क भी प्रमाण नहीं हो सकता । जगत् का जन्मादि भ्रम जिससे हो वह ब्रह्म है, ऐसी आपकी अभिमत उत्प्रेक्षा ( असंभव की संभावना ) में भी निर्विशेष वस्तु की सिद्धि नहीं हो सकती क्योंकि भ्रम अज्ञानमूलक होता है, और आप ही ब्रह्म को अज्ञान का साक्षी मानते हैं । प्रकाश या अज्ञान का अभाव ही साक्षित्व है । प्रकाशता जड से भिन्न वस्तु है, एवं स्वतः और दूसरे को व्यवहार योग्य बनाने वाली होती है । ऐसे प्रकाशमान ankurnagpal108@gmail.com
( २३६ ) ब्रह्म में सविशेषता ही हो सकती है; निर्विशेष मानने से उसमें प्रकाशतां नही रह सकती, वह तुच्छ (मिथ्या) हो जायगा । (३) ऽशास्त्रयोनित्वाधिकरणः— जगज्जन्मादिकारणं ब्रह्म वेदांतवेद्यमित्युक्तम्, तदयुक्तम्, तद्धि न वाक्य प्रतिपाद्यम् । अनुमानेन सिद्धेरित्याशंक्याह— जगज्जन्मादि के कारण ब्रह्म को वेदांत वेद्य बतलाया गया सो असंगत बात है, यह अनुमान सिद्ध वस्तु है, वाक्य प्रतिपाद्य नहीं, इस आशंका पर कहते हैं— शास्त्रयोनित्वात् ।१।१।३ शास्त्रं यस्ययोनि. कारणं प्रमाणम्, तच्छास्त्रयोनिः तस्यभावः शास्त्र योनित्वं । तस्मात् ब्रह्मज्ञानकारणत्वात् शास्त्रस्य, तद्योनित्वं ब्रह्मणः । अत्यन्तातीन्द्रियत्वेन प्रत्यक्षादिप्रमाणाविषयतया ब्रह्मणः शास्त्रैकप्रमाणकत्वात् उक्त स्वरूपं ब्रह्म——“यतो वा इमानि भूतानि” इत्यादि वाक्य बोधयत्येवेत्यर्थः । शास्त्र जिसकी योनि, कारण अर्थात् प्रमाण है उसे ही शास्त्रयोनि कहते है, उसके भाव या धर्म को शास्त्र योनिता कहते है । एक मात्र शास्त्र ही जब ब्रह्म विषयक ज्ञान का समुत्पादक हो तभी ब्रह्म की शास्त्र योनिता सिद्ध होती है । अत्यन्त अतीन्द्रिय होने से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के अविषय ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणता सिद्ध होती है । ऐसे ब्रह्म के स्वरूप को ही “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्यों में बतलाया गया है । पूर्वपक्ष:—ननु शास्त्रयोनित्वंब्रह्मणो न संभवति, प्रमाणांतर- वेद्यत्वाद् ब्रह्मणः । अप्राप्ते तु शास्त्रमर्थवत् । किं तर्हि तत्र प्रमाणम् । न तावत् प्रत्यक्षं । तद्धिद्विविधं, इन्द्रियसम्भवं योगसंभवं चेति । इन्द्रियसम्भवं च बाह्य संभवमान्तरसंभवश्चेति द्विधा । बाह्येन्द्रियाणि विद्यमानं सन्निकर्षं योग्यस्वविषयबोधजननानीति न सर्वार्थसाक्षात्कारतन्नि
२३७ र्माणसमर्थपुरुषविशेष विषयबोधजननानि । नाप्यान्तरम्, आन्तर- सुखदुःखादि व्यतिरिक्तवर्हिर्विषयेषुतस्य बाह्येन्द्रियानपेक्षप्रवृत्त्यनु- पपत्तेः । नापि योगजन्यम्, भावनाप्रकर्षपर्यन्तजन्मनस्तस्य विशदाव- भासत्वेऽपि पूर्वानुभूतविषयस्मृतिमात्रत्वान्न प्रामाण्यमिति कुतः प्रत्यक्षता, तदतिरिक्तविषयत्वे कारणाभावात् । तथासति तस्य भ्रमरूपता । नाप्यनुमानं विशेषतोदृष्टं सामान्यतो दृष्टं वा, अतीन्द्रिये वस्तुनि संबंधावधारणविरहान्न विशेषतो दृष्टम् । समस्त वस्तुसाक्षात्कार तन्निर्माणसमर्थपुरुषविशेष नियतं सामान्यतो दृष्टमपि न लिंगमुपलभ्यते । पूर्वपक्ष-- ब्रह्म की शास्त्र योनिता संभव नहीं है ब्रह्म अन्य प्रमाणों से ही वेद्य है, शास्त्र तो अन्य प्रमाणों से अप्राप्त वस्तु को ही प्रमाणित करते हैं । अब विचारना यह है कि उस ब्रह्म के विषय में कौन सा प्रमाण हो सकता है ? प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता; प्रत्यक्ष दो प्रकार का होता है, इन्द्रिय संभव और योग संभव । इन्द्रिय संभव भी वाह्यसंभव और आन्तर संभव भेद से दो प्रकार का है । वाह्य इन्द्रियाँ केवल सन्निहित और ग्रहणयोग्य उपस्थित विषय का ही बोध करा सकती है, वे समस्त विषयों के साक्षात्कार और निर्माण करने में समर्थ परमपुरुष विशेष का बोध नहीं करा सकतीं । अन्तरिन्द्रिय (मन) मन भी उनका बोध कराने में असमर्थ है, क्योंकि-वाह्येन्द्रियों की सहायता के बिना, आन्तरिक सुखदुःखादि के अतिरिक्त किसी अन्य वाह्य विषय में उसकी प्रवृत्ति संभव नहीं है । योग जन्य प्रत्यक्ष भी ब्रह्म संबंधी प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि भावना या चिंतन के चरम उत्कर्ष से ही उत्पन्न विशद अवभास वाला वह ,पुर्वानुरत विषय की अनुभूति मात्रवाला ही होता है, अतः उसे तो प्रमाण कही नहीं सकते, ब्रह्म की प्रत्यक्षता उससे कैसे संभव है। पूर्वानुभूत विषय से अतिरिक्त किसी विषय का कभी योग द्वारा साक्षात् हो सके ऐसा कोई कारण नही मिलता, और यदि ऐसा अवभास संभव भी हो तो उसे भ्रम ही मानना चाहिए । ankurnagpal108@gmail.com
( २३८ ) विशेषतोदृष्ट या सामान्यतोदृष्ट अनुमान भी ब्रह्म विषयक प्रमाण नहीं हो सकता । अतीन्द्रिय वस्तु में जब संबन्धावधारण ही नहीं हो सकता तो विशेषतोदृष्ट अनुमान होगा भी कैसे ? समस्त वस्तुओं के साक्षात्कार और निर्माण में समर्थ सर्वोित्तम पुरुष विशेष के विषय नियत सामान्य मे दृष्ट अनुमान के लिए भी कोई चिन्ह दिखलाई नहीं देता जिसके आधार पर उसे लागू किया जा सके । ननु च—जगतः कार्यत्वं तदुपादानोपकरणसंप्रदानप्रयोजना- भिज्ञकर्तृ कत्वव्याप्तम् । अचेतनारब्धत्व जगतश्चैकचेतनाधीनत्वेन व्याप्तम् । सर्वं हि घटादिकार्यं तदपादानोपकरणसंप्रदानप्रयोजना- भिज्ञकर्तृकं दृष्टम् । अचेतनारब्धमरोगंस्वशरीमेकचेतनाधीनं च सावयवत्वेन जगतः कार्यत्वम् । ( तर्क ) जगत् की कार्यता उसके उपादान, उपकरण, संप्रदान ( कार्य का उद्देश्य ) और प्रयोजन से अभिज्ञ व्यक्ति के कर्तृत्व से, व्याप्त रहती है । अचेतनाबद्ध जागतिक कार्य, एकमात्र चेतन की अधीनता से ही व्याप्त हैं । घट आदि सारे कार्य, उनके उपादान, उपकरण, संप्रदान और प्रयोजन से अभिज्ञ व्यक्ति से संपादित और अचेतनाबद्ध दीखते हैं । अपना स्वस्थ शरीर भी, एक चेतन आत्मा के अधीन दीखता है । साकार होने से जगत की कार्यता प्रतीत होती है । उच्यते—किमिदमेकचेतनाधीनत्वम् ? न तावत् तदायत्तो- त्पत्तिस्थित्वम्, दृष्टांतो हि साध्यविकलः स्यात्, न हि अरोगं स्वशरीरमेक चेतनायत्तोत्पत्तिस्थि'त, तच्छरीरस्य भोक्तॄणां भार्यादि सर्वचेतनानामदृष्टजन्यत्वात्तदुत्पत्तिस्थित्योः । कि च शरीरावयविनः स्वावयवसमवेततारूपास्थिरवयवसंश्लेषव्यतिरेकेण न चेतनमपेक्षते । प्राणनलक्षणातुस्थितिः पक्षत्वाभिमते क्षितिजलधिमहीधरादौ न संभवतीति पक्षसपक्षानुगतामेकरूपां स्थिति नोपलभामहे । तदायत्त- प्रवृत्तित्वं तदधोनत्वमिति चेद् अनेकचेतनसाध्येषुगुरुतररथ- शिलामहीरुहादिषुव्यभिचारः । चेतनमात्राधोनत्वे सिद्धसाध्यता । ankurnagpal108@gmail.com
( २३६ ) ( वितर्क ) यह एक चेतनाधीनता क्या है ? उसके अधीन उत्पत्ति, स्थिति तो हो नहीं सकती, ऐसा होने से पूर्वकथित दृष्टान्त ही साध्य विरुद्ध हो जायगा । अपना स्वस्थ शरीर एक चेतन के अधीन, उत्पन्न और स्थित तो हो नहीं सकता । शरीर का जन्म और पालन, विषयोपभोग करने वाले स्त्री आदि अनेक चेतनों के, अदृष्ट फल के अनुरूप हुआ करता है । शरीर रूपी अवयवी का अपने अवयवों के साथ जो समवाय संबंध होता है, वह शरीर के संश्लेष विशेष से ही होता है, उसमें किसी अन्य चेतन की तो अपेक्षा होती नहीं । पृथिवी, समुद्र, पर्वत आदि पदार्थों की, आपकी अभिमतपक्षता में, प्राणधारणरूप स्थिति, की संभावना तो है ही नहीं । पक्ष हो या सपक्ष सब जगह एक प्रकार की स्थिति नहीं होती । एक चेतनाधीनता का अर्थ, यदि तदायत्त प्रवृत्तता करें तो, अनेक चेतनों से साध्य, गुरुतर रथ-शिला-पर्वत आदि पदार्थों में असंगति हो जायगी । यदि चेतनमात्र अधीनता अर्थ करें तो, सिद्ध साध्यता होगी । किं च--उभयवादिसिद्धानां जीवानामेव लाघवेन कर्तृत्वाभ्यु- पगमो युक्तः । न च जीवानामुपादानाद्यनभिज्ञतया कर्तृत्वासंभवः सर्वेषामेव चेतनानां पृथिव्याद्युपादानयागाद्युपकरणसाक्षात्कार- सामर्थ्यात् । यथेदानीं पृथिव्यादयोयागादयश्च प्रत्यक्षमीक्ष्यन्ते । उपकरणभूतयागादिशक्तिरूपापूर्वादिशब्दवाच्यादृष्ट साक्षात्कारा- भावेऽपि चेतनानां न कर्तृत्वानुपपत्तिः, तत्साक्षात्कारानपेक्षणात् कार्यारम्भस्य । शक्तिमत्साक्षात्कार एव हि कार्यारम्भोपयोगी । शक्तिस्तु ज्ञानमात्रमेवोपयुज्यते, न साक्षात्कारः । नहि कुलालादयः कार्योपकरणभूतदंडचक्रादिवत् तच्छक्तिमपि साक्षात्कृत्य घटमणि- कादिकार्यमारभन्ते । इह तु चेतनानामागमावगतयागादिशक्ति विशेषाणां कार्यारम्भोनानुपपन्नः । जीव के अस्तित्व के संबंध में वादी प्रतिवादी दोनों एकमत है, अतः सुविधा के लिए जीव का कर्तृत्व ही स्वीकारना सुसंगत होगा ।
( २४० ) जगत् के उपादानादि कारणों के विषय में जीवों की अभिज्ञता नहीं है, इसलिए उनका कर्तृत्व संभव नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि— पृथिवी आदि उपादान कारण तथा कार्य संपादक विषयों को तो सभी चेतन प्रत्यक्ष देखते हैं । अब भी पृथिवी, यागादि की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है । यद्यपि; उपकरण रूप यागादि क्रिया की शक्ति “अपूर्व” शब्द वाच्य अदृष्ट का, प्रत्यक्ष साक्षात्कार नहीं होता, पर उसके चेतनों के कर्तृत्व में असंगति नहीं आती, क्योंकि—कार्यारम्भ में अदृष्ट के साक्षा- त्कार की अपेक्षा नही होती । कार्यारम्भ में वस्तु शक्ति का साक्षात्कार ही उपयोगी होता है । शक्ति में भी ज्ञानमात्र ही उपयोगी होता है साक्षात्कार भी नही । कुम्भकार, घट मटकी आदि कार्यों के निर्माण के लिए, कार्य के उपकरण दंडचक्र की तरह, उसकी शक्ति को जानकर ही, कार्यारम्भ करे, ऐसा कुछ आवश्यक नहीं है । इस सृष्टि कार्य में तो जीव, शास्त्र ज्ञात यागादि शक्ति विशेष को जानते ही हैं अतः उनके लिए, कार्यारम्भ असंगत हो ही नही सकता । किं च—यच्छ
( २४१ ) जिस कार्य की क्रिया, शक्ति-साध्य होती है और जिसके उपादा- नादि कारण विषय ज्ञान शक्य होते हैं, उसके अभिज्ञ व्यक्ति का कर्तृत्व देखा जाता है। मही, महीधर, महार्णव आदि की क्रिया अशक्य है तथा उनके उपादान कारण भी अशक्य हैं, इसलिए वे चेतन जीव की कृति नहीं हो सकते । घट, मटकी आदि की तरह, अन्य जिन पदार्थों की क्रिया तथा उनके उपादानादि का ज्ञान ही शक्य है, जीव उन्हीं वस्तुओं को बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से कार्यान्वित कर सकता है। घट आदि कार्य, एक शरीरधारी प्रभुताहीन अल्पज्ञान कार्योपयोगी वस्तुओं को संग्रह करने वाले, थोड़ी आवश्यकताओं वाले, सामान्य व्यक्ति (कुम्भकार) द्वारा निर्मित होते हैं। यदि वैसे ही, चेतन कर्त्ता को, इस महान् विश्व का कर्त्ता मानते हो तो, जिस विश्व के निर्माता की, सर्वज्ञता और सर्वेश्वरता के बिना, विश्व का निर्माण हो नहीं सकता, उससे नितांत विरुद्ध बात होगी । केवल इतनी ही बात से अनुमानों का अनुच्छेद भी नहीं हो सकता। जहाँ साध्य या साध्य विशिष्ट वस्तु, अनुमान रहित प्रमाण की सहायता से, जानी जाती है, वहाँ अनुमान द्वारा, यदि उसके विपरीत धर्म प्रमाणित हो सकें तो, साध्य वस्तु (ईश्वर) किसी भी प्रमाण का विषय नहीं रह जाता तथा निखिल वस्तु निर्माण निपुण उस साध्य से, अन्वय व्यतिरेक की सहायता से, जो समस्त धर्मों का नियत संबंध निश्चित होता है, वे सारे ही धर्म सामान्यतः प्रसक्त होते हैं। उन धर्मों के विरोधी प्रमाणों के अभाव से, वे वैसे के वैसे ही स्थित रहते हैं। इस प्रकार शास्त्र के अतिरिक्त ईश्वर सिद्धि का और दूसरा कौन सा उपाय हो सकता है ? अत्राहू:--सावयवत्वादेव जगतः कार्यत्वं न प्रत्याख्यातुं शक्यते । भवंति च प्रयोगाः-विवादाध्यसितं भू-भूधरादिकार्यं, सावयवत्वात्, घटादिवत् । तथा विवादाध्यसितमवनि-जलधि- महीधरादि कार्यं, महत्त्वे सति, क्रियावत्त्वात् घटवत् । तनुभुवनादि- कार्यं महत्त्वे सति मूर्त्तत्वात् घटवत् इति । सावयवेषु द्रव्येषु "इदमेव क्रियते नेतरत्" इति कार्यत्वस्य नियामकं सावयवत्वातिरेकि रूपा- ankurnagpal108@gmail.com
( २४२ ) न्तरं नोपलभामहे। कार्यत्वं प्रतिनियतं शक्यक्रियत्वं, शक्योपादा- नादि विज्ञानत्वं चोपलभ्यत इति चेत् न, कार्यत्वेनानुमतेऽपि विषयेज्ञानशक्तौ कार्यानुमेये-इत्यन्यत्रापि सावयवत्वादिना कार्यत्वं ज्ञातमिति ते च प्रतिपन्ने एवेति न कश्चिद् विशेषः । तथा हि घट मणिकादिषुकृतेषु कार्यदर्शनानुमितकर्त्तृगततन्निर्माणशक्तिज्ञानः पुरुषोऽदृष्टपूर्वं विचित्र सन्निवेशं नरेन्द्रभवनमालोक्यावयवसन्निवेश विशेषेण तस्य कार्यत्वं निश्चित्य, तदानीमेव कर्तुःतत् ज्ञानशक्ति वैचित्र्यं अनुमिनोति। अतस्तनुभुवनादेः कार्यत्वे सिद्धे सर्वसाक्षात्का- रतन्निर्माणादिनिपुणः कश्चित् पुरुषविशेषः सिद्ध्यत्येव । इस पर विद्वानों का कथन है कि साकार जगत की कार्यता को झुठला नहीं सकते; ऐसा कहा भी जाता है कि-विचारणीय विषय पृथिवी पर्वत आदि कार्य, घट आदि की तरह साकार हैं तथा इनमें घट आदि की तरह, महत्ता और क्रियात्मकता भी है। देह और भवन आदि विषय और कार्य, घट आदि की तरह मूर्त्त और महत्वपूर्ण हैं। साकार वस्तुओं में—"यही कार्य है, दूसरा नहीं है" ऐसा कार्यता नियामक, साकारता के अतिरिक्त कोई और कारण तो दीखता नहीं [जिसके आधार पर साकार वस्तु की कार्यता को अस्वीकारा जाय] यदि कहो कि-निर्माण योग्यता और शक्ति-साध्य उपादानादि कारण विषयक विशेष ज्ञान ही विश्व का कारण हो सकता है। सो असंभव बात है- क्योंकि-जो विषय कार्य रूप से अनुमोदित है, उस विषय में कर्त्ता के उपयुक्त ज्ञान और शक्ति सद्भाव का, कार्य द्वारा ही अनुमान हो सकता है। अन्यत्र ( घट आदि में) भी साकारता आदि से, कार्यता ज्ञात होती है; कार्य विषयक ज्ञान और शक्ति भी ज्ञात ही रहती है, कोई विशेषता नहीं होती । घट मटकी आदि कृत कार्यों में कार्यता को देखकर ही, कर्त्तृगत निर्माण शक्ति का परिज्ञान हो जाता है। कोई भी व्यक्ति, अदृष्ट पूर्व विचित्र राजा के महल को देखकर, उसकी बनावट से, शिल्पी की कार्यदक्षता को मानकर तत्काल शिल्पी की शिल्पकारी की निपुणता का अनुमान लगा लेता है। इसी प्रकार शरीर, विश्व आदि की कार्यता ankurnagpal108@gmail.com
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निश्चित हो जाने पर, उन सबको देखकर, निर्माण निपुण शिल्पी विशेष का अस्तित्व भी निश्चित हो जाता है । किञ्च-सर्वचेतनानां धर्माधर्मनिमित्तोऽपि सुखदुःखोपभोगे चेत- नानधिष्ठितयोस्तयोरचेतनयोः फलहेतुत्वानुपपत्तेः सर्वकर्मानुगुण- सर्वफलप्रदानचतुरः कश्चिदास्थेयः, वर्धकिनाऽनधिष्ठितस्य वास्पादेरचेतनस्य देशकालद्यनेकपरिकरसन्निधाने अपि यूपादि- निर्माणसाधनत्वादर्शनात् । बीजांकुरादेः पक्षांतरभावेन तैर्व्यभिचा- रोपादानं श्रोत्रियवेतालानाममभिज्ञता विजृम्भितम् । तत एव सुखादिभिर्व्यभिचारवचमपि तथैव । न च लाघवेनोभयवादिसंप्रति- पन्नक्षेत्रज्ञानामेव ईदृशाधिष्ठातृत्व कल्पनं युक्तम्, तेषां सूक्ष्मव्यव- हितविप्रकृष्टदर्शनशक्तिनिश्चयात् । दर्शनानुगुणैव हि सर्वत्रकल्पना न च क्षेत्रज्ञवत् ईश्वर
( २४४ ) सम्मिलित किया जायगा तो एक व्यर्थ गौरव होगा, इसलिए जीवों को कर्त्ता मानने से ही कार्य चल जाय तो लाघव होगा) जीवों में, सूक्ष्म, व्यवहित (अन्य वस्तु द्वारा अंतरित) और दूरवर्त्ती वस्तु को देखने की सामर्थ्य नहीं होती । प्रायः दर्शन सामर्थ्य के अनुरूप ही हर जगह, शक्ति की कल्पना की जाती है [अर्थात् जिसकी जितनी जानकारी है उसकी उतनी ही शक्ति है] जीवों की तरह ईश्वर में भी शक्ति का अभाव हो ऐसा तो कही नहीं सकते। अनुमान आदि प्रमाणों से ईश्वर की सिद्धि में कोई बाधा नहीं है। शक्तिशाली कर्त्ता से ही विचित्र जगत् रूप कार्यों- त्पत्ति हो सकती है, इस अनुमान से ईश्वर का कर्तृं व सिद्ध होता है, सभी वस्तुओं में साक्षात्कार की स्वाभाविक शक्ति संपन्नता भी, ईश्वर की अनुमित कर्तृं त्व से सिद्ध होती है। यत्त्वनैश्वर्याद्यापादनेन धर्मविशेष विपरीतसाधनत्वनुन्नीतम्, तदनुमानवृत्तानभिज्ञत्वनिबन्धनम्, सपक्षे सह दृष्टानां सर्वेषां कार्य- स्याहेतुभूतानां च धर्माणां लिंगिन्याप्तेः। और जो (कुम्हार के दृष्टान्त की तरह जगत कर्त्ता में भी) अनैश्वर्य संभावना से, अभीष्ट धर्म के विपरीत धर्म साधर्कता की बात कही गई, वह भी अनुमान प्रणाली की अनभिज्ञता के कारण ही कही गई। सपक्ष अर्थात् कर्तृसाध्यरूप घट आदि कार्य में, जो धर्म दीखते हैं, जो कि कार्य के हेतु नही हैं, वे सब पक्ष अर्थात् विचार्य (जगतकर्त्ता ईश्वर) में संभाव्य ही नहीं हैं। एतदुक्तं भवति-केनचित् किंचित् क्रियमाणं स्वोत्पत्तये कर्तुं, स्वनिर्माणसामर्थ्यं स्वोपादानोपकरणज्ञानं च अपेक्षते, न तु अन्यसामर्थ्यं अन्यज्ञानं च, हेतुत्वाभावात्। स्वनिर्माणसामर्थ्यं स्वोपादानोपकरणज्ञानाभ्यामेव स्वोत्पत्तावुपपन्नायां संबन्धितया दर्शनमात्रेणाकिंचित्करस्यार्थान्तराज्ञानादेर्हेतुत्वकल्पना योगाद् इति। किं च-क्रियमाणवस्तुव्यतिरिक्तार्थज्ञानादिकं किं सर्वविषयं क्रियोपयोगि, उत कतिपय विषयम् ? न तावत् सर्वविषयं, नहि ankurnagpal108@gmail.com
कुलालादिः क्रियमाणव्यतिरिक्तं किमपि न जानाति । नापि कतिपय विषयम्, सर्वेषु कर्तृ षु तत्तदज्ञानाशक्यनियमेन सर्वेषाम- ज्ञानादीनां व्यभिचारात् । अतः कार्यत्वस्यासाधकानामीश्वरत्वादीनां र्लिगिन्यप्राप्तिरिति न विपरीतसाधनत्वम् । कथन यह है कि-कोई किसी भी क्रियमाण कार्य की उत्पत्ति में, उसी कार्य से संबंधी, कर्त्ता के निर्माण सामर्थ्य, उपादान, उपकरण और उसके ज्ञान की अपेक्षा रहती है, अन्य विषयक सामर्थ्य या ज्ञान से कार्य नहीं चलता । कर्त्ता के कार्य निर्माण सामर्थ्य, उपादान और उपकरणों के ज्ञान से ही जब कार्य की उत्पत्ति सुसंपन्न हो जाती है तो, दिखावटी, बिना मतलब के अन्य विषयक ज्ञान आदि की कल्पना करना ही व्यर्थ है । क्रियमाणवस्तु से अतिरिक्त विषयों का ज्ञान, समस्त विषयों की क्रिया का उपयोगी होता है, या कुछ विषयों का ही उपयोगी होता है ? सर्व विषयक तो हो नहीं सकता; ऐसा तो है नहीं कि-कुंभकार आदि शिल्पी, क्रियमाण से भिन्न और कुछ जानते ही नहीं । कतिपय विषयक भी नहीं हो सकता—सभी कर्त्ताओं में उन्हीं उन्हीं विषयों में अज्ञान और अशक्ति होगी ही, ऐसा कोई नियम तो है नहीं; अज्ञानादि कार्योपयोगिता के संबंध में अनियम ही रहता है इस प्रकार कार्यता के असाधक, अनीश्वरता इत्यादि की, विचार्य विषय में प्राप्ति न होने से, उनकी विपरीत साधकता नहीं हो सकती । कुलालादीनां दण्डचक्राद्यधिष्ठानं शरीरद्वारेणैव दृष्टम् इति जगदुपादानोपकरणाधिष्ठानमीश्वरस्याशरीरस्याानुपपन्नमिति चेत्- न, संकल्पमात्रेणैव परशरीरगत भूतवेतालगरलाद्यपगमविनाश दर्शनात् । कथमशरीरस्य परप्रवर्त्तनरूपः संकल्प इति चेत्, न शरीरापेक्षः संकल्पः, शरीरस्य संकल्प हेतुत्वाभावात् । मन एव हि संकल्पहेतुः । तदभ्युपगतमीश्वरेऽपि, कार्यत्वेनैव ज्ञानशक्तिवन्मनं- सोऽपि प्राप्तत्वात् । मानसः संकल्प शरीरस्यैव, सशरीरस्यैव समनं-
ंसकत्वादिति चेत्, न-मनसो नित्यत्वेन देहापगमेऽपि मनसःसद्भावे- नानैकान्त्यात् । अतो विचित्रावयवसन्निवेशविशेषतनुभुवनादि कार्यनिर्माणे पुण्यपापपरवशः परिमितशक्तिज्ञानः क्षेत्रज्ञो न प्रभवतीति, निखिलभुवननिर्माणचतुरोऽचिन्त्यापरिमित ज्ञान- शक्त्यैश्वर्योऽशरीरः संकल्पमात्रसाधनपरिनिष्पन्नानंतविस्तार विचित्ररचनप्रपंचः पुरुषविशेष ईश्वरोऽनुमानेनैव सिद्ध्यति । अतः प्रमाणान्तरावसेयत्वात् ब्रह्मणः नैतद् वाक्यं ब्रह्म प्रतिपाद- यति । किं च—अत्यंतभिन्नयोरेव मृद्द्रव्यकुलालयोः निमित्तो पादानत्वदर्शनेन, आकाशादेर्निरवयवद्रव्यस्य कार्यत्वानुपपत्या च नैकमेव ब्रह्म कृत्स्नस्य जगतो निमित्तमुपादानं च प्रतिवादयितुं शक्नोति इति । कुम्हार आदि अपने शरीर द्वारा ही, दंडचक्र आदि कार्योपकरणों का प्रयोग करते हैं; शरीर रहित ईश्वर, जगत के उपादान और उपकरण आदि का प्रेरक नहीं हो सकता ? ऐसा संशय भी नहीं करना चाहिए; प्रायः देखा जाता है कि-इच्छामात्र से ही, पर शरीरगत भूत वेताल आदि द्वारा, विष का विनाश हो जाता है। अशरीरी ईश्वर का पर प्रेरक रूप संकल्प हो कैसे सकता है ? ऐसी शंका भी निर्मूल है, क्योंकि-संकल्प में शरीर होना आवश्यक नहीं है, शरीर में संकल्प हेतुता है ही नहीं, केवल मन ही संकल्प का हेतु है। ईश्वर का मन भी स्वीकारना होगा, उनकी कार्यकारिता से ही ज्ञानशक्तिमान् मन की सत्ता अनुमित होती है। मानस संकल्प शरीर वाले को ही होता हो, शरीरी ही मनवाला हो सकता है, ऐसा भी नहीं कह सकते। मन नित्य पदार्थ है, देह के समाप्त हो जाने पर भी मन का अस्तित्व रहता है। मन शरीर संबद्ध होकर ही रहता हो ऐसा भी कोई नियम नहीं है। इससे निश्चित होता है कि- विचित्र अवयव सन्निवेश संपन्न शरीर और विश्व आदि के निर्माण में चतुर अचिन्त्य, अपरिमित, ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्यशाली, अशरीर, संकल्प- मात्र साधन से बनाने वाले अनंत विस्तृत जगत का रचयिता, पुरुष विशेष
( २४७ ) ईश्वर अनुमान से ही सिद्ध होता है । शास्त्र प्रमाण के बिना ही, अनुमान प्रमाण से ही ब्रह्म जगत का कर्त्ता सिद्ध हो जाता है । "यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य ब्रह्म प्रतिपादक नहीं प्रतीत होते । तथा-घट के निर्माण में मिट्टी और कुम्हार दो कारण देखे जाते हैं, आकाशादि निराकार की कार्यता होती नही, इसलिए एक ही ब्रह्म को समस्त जगत का निमित्त और उपादान दोनों कारण मानना भी शक्य नहीं है । सिद्धान्तः-एवं प्राप्ते ब्रूमः-यथोक्त लक्षणं ब्रह्म जन्मादि वाक्यं बोधयत्येव । कुतः ? शास्त्रैकप्रमाणकत्वाद् ब्रह्मणः । यदुक्तं- सावयवत्वादिना कार्यं सर्वं जगत् । कार्यं च तदुचितकर्त्तृ विशेषपूर्वकं दृष्टमिति निखिलजगन्निर्माणतदुपादानोपकरणवेदनचतुरः कश्चि- दनुमेयः, इति । तदयुक्तम्, महीमहार्णवादोना कार्यत्वेऽप्येकदैवैकेन निर्मिता इत्यत्रप्रमाणाभावात् । न चैकस्य घटस्येव सर्वेषामेकं कार्यत्वं, येनैकदैवैकः कर्त्ता स्यात् । पृथग्भूतेषु कार्येषु कालभेदकर्त्तृ- भेददर्शनेन कर्त्तृ कालैक्यनियमादर्शनात् । न च क्षेत्रज्ञानां विचित्र- जगन्निर्माणशक्त्यभावात्कार्यत्वबलेन तदतिरिक्तकल्पनायां अनेककल्पना- नुपपत्तेश्चैकः कर्त्ता भवितुमर्हतीति क्षेत्रज्ञानामेवोपचितपुण्यविशेषाणां शक्तिवैचित्र्यदर्शनेन तेषामेवातिशयितादृष्टसंभावनया च तत्तद्वि- लक्षणकार्य हेतुत्वसंभवात्, तदतिरिक्तात्यन्तादृष्टपुरुषकल्पनानु- पपत्तेः । न च युगपत्सर्वोत्पत्तिविनाशादर्शनाच्च । कार्यत्वेन सर्वोत्प- त्तिविनाशयोः कल्प्यमानयोर्दर्शनानुगुण्येन कल्पनायां विरोधाभा- वाच्च । अतो बुद्धिमदेककर्त्तृ कत्वे साध्ये कार्यत्वस्यानैकान्त्यम् , पक्षस्याप्रसिद्धविशेषणत्वम् , साध्यविकलता च दृष्टान्तस्य, सर्वंनिर्माणचतुरस्य एकस्याप्रसिद्धेः । बुद्धिमत् कर्त्तृ कत्वमात्रे साध्ये सिद्धसाधनता । ankurnagpal108@gmail.com
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( २४८ ) सिद्धांत:-जगत के जन्मादि बोधक “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्य निश्चि- चत ही, ब्रह्म प्रतिपादक हैं, क्योंकि-ब्रह्म एकमात्र शास्त्र द्वारा ही प्रमाणित हैं। जो यह कहा कि-कार्य रूप संपूर्ण साकार जगत किसी ऐसे चतुर की ही रचना हो सकती है, जो कि समस्त जगत के निर्माण सम्बन्धी उपादान, उपकरण आदि को भली भाँति जानता है, क्योंकि कार्य, उचित कर्त्ताविशेष द्वारा ही प्रतीत होता है। यह कथन युक्ति संगत नहीं है। विशाल पृथिवी, विस्तृत समुद्र आदि कार्य, एक ही समय, एकही निर्माता द्वारा निर्मित हुए हों, ऐसा कोई प्रमाण नही मिलता । घट की तरह सारे पदार्थ एक ही उपादान के कार्य हों, अथवा एक ही समय एक ही कर्त्ता के कार्य हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता । विभिन्न कार्यों मे कालभेद, कर्त्ताभेद देखा जाता है कर्त्ता और काल की एकता भी निश्चित नही होती । जीवों की, विचित्र जगत निर्माण में शक्ति न होने से, जगत की कार्यता में, जीवातिरिक्त कर्त्ता की कल्पना करने में, अनेक