श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३० ) विशेषणों से युक्त मानने से ब्रह्म में अनेकता आजायगी । विशेषणता का अर्थ ही पार्थक्य साधक होता है । ननु “देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षः समपरिमाणः” इत्यत्र विशेषणबहुत्वेऽप्येक एव देवदत्तः प्रतीयते । एवमत्राप्येकमेव ब्रह्म भवति । नैवम्—तत्र प्रमाणान्तरेणैक्यप्रतीतेः एकस्मिन्नेव विशेषणा- नामुपसंहारः । अन्यथा तत्रापि व्यावर्तकत्वेनानेकत्वमपरिहार्यम् । अत्र त्वनेनैवविशेषणेन लिलक्षयिषितत्वात् ब्रह्मणः प्रमाणान्तरेणै- क्यमनवगतमिति व्यावर्तकभेदेन ब्रह्मबहुत्वमवर्जनीयम् । (तर्क) “देवदत्त श्यामवर्ण का युवा, लालनेत्रों वाला सुडौल व्यक्ति है” इस वर्णन में, अनेक विशेषणों वाला एकही व्यक्ति कहा गया है, वैसे ही उपर्युक्त ब्रह्मलक्षण बोधक श्रुति वाक्य में अनेक विशेषणों वाले एक ही ब्रह्म का वर्णन है [वितर्क] ऐसी बात नही है क्यों कि- देवदत्त के वर्णन में तो, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से एक देवदत्त की स्पष्ट प्रतीति होती है, इसलिए अनेक विशेषणों का समन्वय हो जाता है, यदि स्पष्ट प्रतीति न होती तो, विशिष्टता ज्ञापक पार्थक्य से अनेकता अनिवार्य हो जाती । ब्रह्म के प्रसंग में तो, विशेषणों द्वारा ही लक्षण बतलाने की चेष्टा की गई है, किसी अन्य प्रमाण से तो उसकी एकता ज्ञात होती नही, इसलिए विभिन्न विशेषताओं से ब्रह्म की अनेकता अनिवार्य हो जाती है । ब्रह्मशब्दैक्यादाप्यैक्यं प्रतीयेत् इति चेत् न, अज्ञातगो व्यक्तेः जिज्ञासो पुरुषस्य “षण्डो मुण्डः पूर्णशृंगो गौः” इत्युक्ते गोपदैक्येऽपि षण्डत्वादि व्यावर्तकभेदेन गोव्यक्तिबहुत्वप्रतीतेः ब्रह्मव्यक्तयोऽपि बह्व्यः स्युः । अतएव लिलक्षयिषिते वस्तुनि एषां विशेषणानां संभूय लक्षणत्वमप्यनुपपन्नम् । ब्रह्म शब्द एक है, इसलिए सारे विशेषण भी एक होंगे ऐसा भी नहीं कह सकते; जैसे-जो व्यक्ति गौ को नही जानता, वह उसे जानना चाहता है, यदि उससे कहा जाय कि-“षण्ड-मुंड बड़ी सींगों वाली गौ होती है” तो उसे एक गौ के विशेषणों के पार्थक्य से अनेक गो रूपों की प्रतीति ankurnagpal108@gmail.com