भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २४१ ) जिस कार्य की क्रिया, शक्ति-साध्य होती है और जिसके उपादा- नादि कारण विषय ज्ञान शक्य होते हैं, उसके अभिज्ञ व्यक्ति का कर्तृत्व देखा जाता है। मही, महीधर, महार्णव आदि की क्रिया अशक्य है तथा उनके उपादान कारण भी अशक्य हैं, इसलिए वे चेतन जीव की कृति नहीं हो सकते । घट, मटकी आदि की तरह, अन्य जिन पदार्थों की क्रिया तथा उनके उपादानादि का ज्ञान ही शक्य है, जीव उन्हीं वस्तुओं को बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से कार्यान्वित कर सकता है। घट आदि कार्य, एक शरीरधारी प्रभुताहीन अल्पज्ञान कार्योपयोगी वस्तुओं को संग्रह करने वाले, थोड़ी आवश्यकताओं वाले, सामान्य व्यक्ति (कुम्भकार) द्वारा निर्मित होते हैं। यदि वैसे ही, चेतन कर्त्ता को, इस महान् विश्व का कर्त्ता मानते हो तो, जिस विश्व के निर्माता की, सर्वज्ञता और सर्वेश्वरता के बिना, विश्व का निर्माण हो नहीं सकता, उससे नितांत विरुद्ध बात होगी । केवल इतनी ही बात से अनुमानों का अनुच्छेद भी नहीं हो सकता। जहाँ साध्य या साध्य विशिष्ट वस्तु, अनुमान रहित प्रमाण की सहायता से, जानी जाती है, वहाँ अनुमान द्वारा, यदि उसके विपरीत धर्म प्रमाणित हो सकें तो, साध्य वस्तु (ईश्वर) किसी भी प्रमाण का विषय नहीं रह जाता तथा निखिल वस्तु निर्माण निपुण उस साध्य से, अन्वय व्यतिरेक की सहायता से, जो समस्त धर्मों का नियत संबंध निश्चित होता है, वे सारे ही धर्म सामान्यतः प्रसक्त होते हैं। उन धर्मों के विरोधी प्रमाणों के अभाव से, वे वैसे के वैसे ही स्थित रहते हैं। इस प्रकार शास्त्र के अतिरिक्त ईश्वर सिद्धि का और दूसरा कौन सा उपाय हो सकता है ? अत्राहू:--सावयवत्वादेव जगतः कार्यत्वं न प्रत्याख्यातुं शक्यते । भवंति च प्रयोगाः-विवादाध्यसितं भू-भूधरादिकार्यं, सावयवत्वात्, घटादिवत् । तथा विवादाध्यसितमवनि-जलधि- महीधरादि कार्यं, महत्त्वे सति, क्रियावत्त्वात् घटवत् । तनुभुवनादि- कार्यं महत्त्वे सति मूर्त्तत्वात् घटवत् इति । सावयवेषु द्रव्येषु "इदमेव क्रियते नेतरत्" इति कार्यत्वस्य नियामकं सावयवत्वातिरेकि रूपा- ankurnagpal108@gmail.com