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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( २४० ) जगत् के उपादानादि कारणों के विषय में जीवों की अभिज्ञता नहीं है, इसलिए उनका कर्तृत्व संभव नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि— पृथिवी आदि उपादान कारण तथा कार्य संपादक विषयों को तो सभी चेतन प्रत्यक्ष देखते हैं । अब भी पृथिवी, यागादि की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है । यद्यपि; उपकरण रूप यागादि क्रिया की शक्ति “अपूर्व” शब्द वाच्य अदृष्ट का, प्रत्यक्ष साक्षात्कार नहीं होता, पर उसके चेतनों के कर्तृत्व में असंगति नहीं आती, क्योंकि—कार्यारम्भ में अदृष्ट के साक्षा- त्कार की अपेक्षा नही होती । कार्यारम्भ में वस्तु शक्ति का साक्षात्कार ही उपयोगी होता है । शक्ति में भी ज्ञानमात्र ही उपयोगी होता है साक्षात्कार भी नही । कुम्भकार, घट मटकी आदि कार्यों के निर्माण के लिए, कार्य के उपकरण दंडचक्र की तरह, उसकी शक्ति को जानकर ही, कार्यारम्भ करे, ऐसा कुछ आवश्यक नहीं है । इस सृष्टि कार्य में तो जीव, शास्त्र ज्ञात यागादि शक्ति विशेष को जानते ही हैं अतः उनके लिए, कार्यारम्भ असंगत हो ही नही सकता । किं च—यच्छ

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