श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३६ ) ( वितर्क ) यह एक चेतनाधीनता क्या है ? उसके अधीन उत्पत्ति, स्थिति तो हो नहीं सकती, ऐसा होने से पूर्वकथित दृष्टान्त ही साध्य विरुद्ध हो जायगा । अपना स्वस्थ शरीर एक चेतन के अधीन, उत्पन्न और स्थित तो हो नहीं सकता । शरीर का जन्म और पालन, विषयोपभोग करने वाले स्त्री आदि अनेक चेतनों के, अदृष्ट फल के अनुरूप हुआ करता है । शरीर रूपी अवयवी का अपने अवयवों के साथ जो समवाय संबंध होता है, वह शरीर के संश्लेष विशेष से ही होता है, उसमें किसी अन्य चेतन की तो अपेक्षा होती नहीं । पृथिवी, समुद्र, पर्वत आदि पदार्थों की, आपकी अभिमतपक्षता में, प्राणधारणरूप स्थिति, की संभावना तो है ही नहीं । पक्ष हो या सपक्ष सब जगह एक प्रकार की स्थिति नहीं होती । एक चेतनाधीनता का अर्थ, यदि तदायत्त प्रवृत्तता करें तो, अनेक चेतनों से साध्य, गुरुतर रथ-शिला-पर्वत आदि पदार्थों में असंगति हो जायगी । यदि चेतनमात्र अधीनता अर्थ करें तो, सिद्ध साध्यता होगी । किं च--उभयवादिसिद्धानां जीवानामेव लाघवेन कर्तृत्वाभ्यु- पगमो युक्तः । न च जीवानामुपादानाद्यनभिज्ञतया कर्तृत्वासंभवः सर्वेषामेव चेतनानां पृथिव्याद्युपादानयागाद्युपकरणसाक्षात्कार- सामर्थ्यात् । यथेदानीं पृथिव्यादयोयागादयश्च प्रत्यक्षमीक्ष्यन्ते । उपकरणभूतयागादिशक्तिरूपापूर्वादिशब्दवाच्यादृष्ट साक्षात्कारा- भावेऽपि चेतनानां न कर्तृत्वानुपपत्तिः, तत्साक्षात्कारानपेक्षणात् कार्यारम्भस्य । शक्तिमत्साक्षात्कार एव हि कार्यारम्भोपयोगी । शक्तिस्तु ज्ञानमात्रमेवोपयुज्यते, न साक्षात्कारः । नहि कुलालादयः कार्योपकरणभूतदंडचक्रादिवत् तच्छक्तिमपि साक्षात्कृत्य घटमणि- कादिकार्यमारभन्ते । इह तु चेतनानामागमावगतयागादिशक्ति विशेषाणां कार्यारम्भोनानुपपन्नः । जीव के अस्तित्व के संबंध में वादी प्रतिवादी दोनों एकमत है, अतः सुविधा के लिए जीव का कर्तृत्व ही स्वीकारना सुसंगत होगा ।