भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २३८ ) विशेषतोदृष्ट या सामान्यतोदृष्ट अनुमान भी ब्रह्म विषयक प्रमाण नहीं हो सकता । अतीन्द्रिय वस्तु में जब संबन्धावधारण ही नहीं हो सकता तो विशेषतोदृष्ट अनुमान होगा भी कैसे ? समस्त वस्तुओं के साक्षात्कार और निर्माण में समर्थ सर्वोित्तम पुरुष विशेष के विषय नियत सामान्य मे दृष्ट अनुमान के लिए भी कोई चिन्ह दिखलाई नहीं देता जिसके आधार पर उसे लागू किया जा सके । ननु च—जगतः कार्यत्वं तदुपादानोपकरणसंप्रदानप्रयोजना- भिज्ञकर्तृ कत्वव्याप्तम् । अचेतनारब्धत्व जगतश्चैकचेतनाधीनत्वेन व्याप्तम् । सर्वं हि घटादिकार्यं तदपादानोपकरणसंप्रदानप्रयोजना- भिज्ञकर्तृकं दृष्टम् । अचेतनारब्धमरोगंस्वशरीमेकचेतनाधीनं च सावयवत्वेन जगतः कार्यत्वम् । ( तर्क ) जगत् की कार्यता उसके उपादान, उपकरण, संप्रदान ( कार्य का उद्देश्य ) और प्रयोजन से अभिज्ञ व्यक्ति के कर्तृत्व से, व्याप्त रहती है । अचेतनाबद्ध जागतिक कार्य, एकमात्र चेतन की अधीनता से ही व्याप्त हैं । घट आदि सारे कार्य, उनके उपादान, उपकरण, संप्रदान और प्रयोजन से अभिज्ञ व्यक्ति से संपादित और अचेतनाबद्ध दीखते हैं । अपना स्वस्थ शरीर भी, एक चेतन आत्मा के अधीन दीखता है । साकार होने से जगत की कार्यता प्रतीत होती है । उच्यते—किमिदमेकचेतनाधीनत्वम् ? न तावत् तदायत्तो- त्पत्तिस्थित्वम्, दृष्टांतो हि साध्यविकलः स्यात्, न हि अरोगं स्वशरीरमेक चेतनायत्तोत्पत्तिस्थि'त, तच्छरीरस्य भोक्तॄणां भार्यादि सर्वचेतनानामदृष्टजन्यत्वात्तदुत्पत्तिस्थित्योः । कि च शरीरावयविनः स्वावयवसमवेततारूपास्थिरवयवसंश्लेषव्यतिरेकेण न चेतनमपेक्षते । प्राणनलक्षणातुस्थितिः पक्षत्वाभिमते क्षितिजलधिमहीधरादौ न संभवतीति पक्षसपक्षानुगतामेकरूपां स्थिति नोपलभामहे । तदायत्त- प्रवृत्तित्वं तदधोनत्वमिति चेद् अनेकचेतनसाध्येषुगुरुतररथ- शिलामहीरुहादिषुव्यभिचारः । चेतनमात्राधोनत्वे सिद्धसाध्यता । ankurnagpal108@gmail.com