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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( २४० ) जगत् के उपादानादि कारणों के विषय में जीवों की अभिज्ञता नहीं है, इसलिए उनका कर्तृत्व संभव नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि— पृथिवी आदि उपादान कारण तथा कार्य संपादक विषयों को तो सभी चेतन प्रत्यक्ष देखते हैं । अब भी पृथिवी, यागादि की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है । यद्यपि; उपकरण रूप यागादि क्रिया की शक्ति “अपूर्व” शब्द वाच्य अदृष्ट का, प्रत्यक्ष साक्षात्कार नहीं होता, पर उसके चेतनों के कर्तृत्व में असंगति नहीं आती, क्योंकि—कार्यारम्भ में अदृष्ट के साक्षा- त्कार की अपेक्षा नही होती । कार्यारम्भ में वस्तु शक्ति का साक्षात्कार ही उपयोगी होता है । शक्ति में भी ज्ञानमात्र ही उपयोगी होता है साक्षात्कार भी नही । कुम्भकार, घट मटकी आदि कार्यों के निर्माण के लिए, कार्य के उपकरण दंडचक्र की तरह, उसकी शक्ति को जानकर ही, कार्यारम्भ करे, ऐसा कुछ आवश्यक नहीं है । इस सृष्टि कार्य में तो जीव, शास्त्र ज्ञात यागादि शक्ति विशेष को जानते ही हैं अतः उनके लिए, कार्यारम्भ असंगत हो ही नही सकता । किं च—यच्छ

( २४१ ) जिस कार्य की क्रिया, शक्ति-साध्य होती है और जिसके उपादा- नादि कारण विषय ज्ञान शक्य होते हैं, उसके अभिज्ञ व्यक्ति का कर्तृत्व देखा जाता है। मही, महीधर, महार्णव आदि की क्रिया अशक्य है तथा उनके उपादान कारण भी अशक्य हैं, इसलिए वे चेतन जीव की कृति नहीं हो सकते । घट, मटकी आदि की तरह, अन्य जिन पदार्थों की क्रिया तथा उनके उपादानादि का ज्ञान ही शक्य है, जीव उन्हीं वस्तुओं को बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से कार्यान्वित कर सकता है। घट आदि कार्य, एक शरीरधारी प्रभुताहीन अल्पज्ञान कार्योपयोगी वस्तुओं को संग्रह करने वाले, थोड़ी आवश्यकताओं वाले, सामान्य व्यक्ति (कुम्भकार) द्वारा निर्मित होते हैं। यदि वैसे ही, चेतन कर्त्ता को, इस महान् विश्व का कर्त्ता मानते हो तो, जिस विश्व के निर्माता की, सर्वज्ञता और सर्वेश्वरता के बिना, विश्व का निर्माण हो नहीं सकता, उससे नितांत विरुद्ध बात होगी । केवल इतनी ही बात से अनुमानों का अनुच्छेद भी नहीं हो सकता। जहाँ साध्य या साध्य विशिष्ट वस्तु, अनुमान रहित प्रमाण की सहायता से, जानी जाती है, वहाँ अनुमान द्वारा, यदि उसके विपरीत धर्म प्रमाणित हो सकें तो, साध्य वस्तु (ईश्वर) किसी भी प्रमाण का विषय नहीं रह जाता तथा निखिल वस्तु निर्माण निपुण उस साध्य से, अन्वय व्यतिरेक की सहायता से, जो समस्त धर्मों का नियत संबंध निश्चित होता है, वे सारे ही धर्म सामान्यतः प्रसक्त होते हैं। उन धर्मों के विरोधी प्रमाणों के अभाव से, वे वैसे के वैसे ही स्थित रहते हैं। इस प्रकार शास्त्र के अतिरिक्त ईश्वर सिद्धि का और दूसरा कौन सा उपाय हो सकता है ? अत्राहू:--सावयवत्वादेव जगतः कार्यत्वं न प्रत्याख्यातुं शक्यते । भवंति च प्रयोगाः-विवादाध्यसितं भू-भूधरादिकार्यं, सावयवत्वात्, घटादिवत् । तथा विवादाध्यसितमवनि-जलधि- महीधरादि कार्यं, महत्त्वे सति, क्रियावत्त्वात् घटवत् । तनुभुवनादि- कार्यं महत्त्वे सति मूर्त्तत्वात् घटवत् इति । सावयवेषु द्रव्येषु "इदमेव क्रियते नेतरत्" इति कार्यत्वस्य नियामकं सावयवत्वातिरेकि रूपा- ankurnagpal108@gmail.com

( २४२ ) न्तरं नोपलभामहे। कार्यत्वं प्रतिनियतं शक्यक्रियत्वं, शक्योपादा- नादि विज्ञानत्वं चोपलभ्यत इति चेत् न, कार्यत्वेनानुमतेऽपि विषयेज्ञानशक्तौ कार्यानुमेये-इत्यन्यत्रापि सावयवत्वादिना कार्यत्वं ज्ञातमिति ते च प्रतिपन्ने एवेति न कश्चिद् विशेषः । तथा हि घट मणिकादिषुकृतेषु कार्यदर्शनानुमितकर्त्तृगततन्निर्माणशक्तिज्ञानः पुरुषोऽदृष्टपूर्वं विचित्र सन्निवेशं नरेन्द्रभवनमालोक्यावयवसन्निवेश विशेषेण तस्य कार्यत्वं निश्चित्य, तदानीमेव कर्तुःतत् ज्ञानशक्ति वैचित्र्यं अनुमिनोति। अतस्तनुभुवनादेः कार्यत्वे सिद्धे सर्वसाक्षात्का- रतन्निर्माणादिनिपुणः कश्चित् पुरुषविशेषः सिद्ध्यत्येव । इस पर विद्वानों का कथन है कि साकार जगत की कार्यता को झुठला नहीं सकते; ऐसा कहा भी जाता है कि-विचारणीय विषय पृथिवी पर्वत आदि कार्य, घट आदि की तरह साकार हैं तथा इनमें घट आदि की तरह, महत्ता और क्रियात्मकता भी है। देह और भवन आदि विषय और कार्य, घट आदि की तरह मूर्त्त और महत्वपूर्ण हैं। साकार वस्तुओं में—"यही कार्य है, दूसरा नहीं है" ऐसा कार्यता नियामक, साकारता के अतिरिक्त कोई और कारण तो दीखता नहीं [जिसके आधार पर साकार वस्तु की कार्यता को अस्वीकारा जाय] यदि कहो कि-निर्माण योग्यता और शक्ति-साध्य उपादानादि कारण विषयक विशेष ज्ञान ही विश्व का कारण हो सकता है। सो असंभव बात है- क्योंकि-जो विषय कार्य रूप से अनुमोदित है, उस विषय में कर्त्ता के उपयुक्त ज्ञान और शक्ति सद्भाव का, कार्य द्वारा ही अनुमान हो सकता है। अन्यत्र ( घट आदि में) भी साकारता आदि से, कार्यता ज्ञात होती है; कार्य विषयक ज्ञान और शक्ति भी ज्ञात ही रहती है, कोई विशेषता नहीं होती । घट मटकी आदि कृत कार्यों में कार्यता को देखकर ही, कर्त्तृगत निर्माण शक्ति का परिज्ञान हो जाता है। कोई भी व्यक्ति, अदृष्ट पूर्व विचित्र राजा के महल को देखकर, उसकी बनावट से, शिल्पी की कार्यदक्षता को मानकर तत्काल शिल्पी की शिल्पकारी की निपुणता का अनुमान लगा लेता है। इसी प्रकार शरीर, विश्व आदि की कार्यता ankurnagpal108@gmail.com

( २४३ )

निश्चित हो जाने पर, उन सबको देखकर, निर्माण निपुण शिल्पी विशेष का अस्तित्व भी निश्चित हो जाता है । किञ्च-सर्वचेतनानां धर्माधर्मनिमित्तोऽपि सुखदुःखोपभोगे चेत- नानधिष्ठितयोस्तयोरचेतनयोः फलहेतुत्वानुपपत्तेः सर्वकर्मानुगुण- सर्वफलप्रदानचतुरः कश्चिदास्थेयः, वर्धकिनाऽनधिष्ठितस्य वास्पादेरचेतनस्य देशकालद्यनेकपरिकरसन्निधाने अपि यूपादि- निर्माणसाधनत्वादर्शनात् । बीजांकुरादेः पक्षांतरभावेन तैर्व्यभिचा- रोपादानं श्रोत्रियवेतालानाममभिज्ञता विजृम्भितम् । तत एव सुखादिभिर्व्यभिचारवचमपि तथैव । न च लाघवेनोभयवादिसंप्रति- पन्नक्षेत्रज्ञानामेव ईदृशाधिष्ठातृत्व कल्पनं युक्तम्, तेषां सूक्ष्मव्यव- हितविप्रकृष्टदर्शनशक्तिनिश्चयात् । दर्शनानुगुणैव हि सर्वत्रकल्पना न च क्षेत्रज्ञवत् ईश्वर

( २४४ ) सम्मिलित किया जायगा तो एक व्यर्थ गौरव होगा, इसलिए जीवों को कर्त्ता मानने से ही कार्य चल जाय तो लाघव होगा) जीवों में, सूक्ष्म, व्यवहित (अन्य वस्तु द्वारा अंतरित) और दूरवर्त्ती वस्तु को देखने की सामर्थ्य नहीं होती । प्रायः दर्शन सामर्थ्य के अनुरूप ही हर जगह, शक्ति की कल्पना की जाती है [अर्थात् जिसकी जितनी जानकारी है उसकी उतनी ही शक्ति है] जीवों की तरह ईश्वर में भी शक्ति का अभाव हो ऐसा तो कही नहीं सकते। अनुमान आदि प्रमाणों से ईश्वर की सिद्धि में कोई बाधा नहीं है। शक्तिशाली कर्त्ता से ही विचित्र जगत् रूप कार्यों- त्पत्ति हो सकती है, इस अनुमान से ईश्वर का कर्तृं व सिद्ध होता है, सभी वस्तुओं में साक्षात्कार की स्वाभाविक शक्ति संपन्नता भी, ईश्वर की अनुमित कर्तृं त्व से सिद्ध होती है। यत्त्वनैश्वर्याद्यापादनेन धर्मविशेष विपरीतसाधनत्वनुन्नीतम्, तदनुमानवृत्तानभिज्ञत्वनिबन्धनम्, सपक्षे सह दृष्टानां सर्वेषां कार्य- स्याहेतुभूतानां च धर्माणां लिंगिन्याप्तेः। और जो (कुम्हार के दृष्टान्त की तरह जगत कर्त्ता में भी) अनैश्वर्य संभावना से, अभीष्ट धर्म के विपरीत धर्म साधर्कता की बात कही गई, वह भी अनुमान प्रणाली की अनभिज्ञता के कारण ही कही गई। सपक्ष अर्थात् कर्तृसाध्यरूप घट आदि कार्य में, जो धर्म दीखते हैं, जो कि कार्य के हेतु नही हैं, वे सब पक्ष अर्थात् विचार्य (जगतकर्त्ता ईश्वर) में संभाव्य ही नहीं हैं। एतदुक्तं भवति-केनचित् किंचित् क्रियमाणं स्वोत्पत्तये कर्तुं, स्वनिर्माणसामर्थ्यं स्वोपादानोपकरणज्ञानं च अपेक्षते, न तु अन्यसामर्थ्यं अन्यज्ञानं च, हेतुत्वाभावात्। स्वनिर्माणसामर्थ्यं स्वोपादानोपकरणज्ञानाभ्यामेव स्वोत्पत्तावुपपन्नायां संबन्धितया दर्शनमात्रेणाकिंचित्करस्यार्थान्तराज्ञानादेर्हेतुत्वकल्पना योगाद् इति। किं च-क्रियमाणवस्तुव्यतिरिक्तार्थज्ञानादिकं किं सर्वविषयं क्रियोपयोगि, उत कतिपय विषयम् ? न तावत् सर्वविषयं, नहि ankurnagpal108@gmail.com

कुलालादिः क्रियमाणव्यतिरिक्तं किमपि न जानाति । नापि कतिपय विषयम्, सर्वेषु कर्तृ षु तत्तदज्ञानाशक्यनियमेन सर्वेषाम- ज्ञानादीनां व्यभिचारात् । अतः कार्यत्वस्यासाधकानामीश्वरत्वादीनां र्लिगिन्यप्राप्तिरिति न विपरीतसाधनत्वम् । कथन यह है कि-कोई किसी भी क्रियमाण कार्य की उत्पत्ति में, उसी कार्य से संबंधी, कर्त्ता के निर्माण सामर्थ्य, उपादान, उपकरण और उसके ज्ञान की अपेक्षा रहती है, अन्य विषयक सामर्थ्य या ज्ञान से कार्य नहीं चलता । कर्त्ता के कार्य निर्माण सामर्थ्य, उपादान और उपकरणों के ज्ञान से ही जब कार्य की उत्पत्ति सुसंपन्न हो जाती है तो, दिखावटी, बिना मतलब के अन्य विषयक ज्ञान आदि की कल्पना करना ही व्यर्थ है । क्रियमाणवस्तु से अतिरिक्त विषयों का ज्ञान, समस्त विषयों की क्रिया का उपयोगी होता है, या कुछ विषयों का ही उपयोगी होता है ? सर्व विषयक तो हो नहीं सकता; ऐसा तो है नहीं कि-कुंभकार आदि शिल्पी, क्रियमाण से भिन्न और कुछ जानते ही नहीं । कतिपय विषयक भी नहीं हो सकता—सभी कर्त्ताओं में उन्हीं उन्हीं विषयों में अज्ञान और अशक्ति होगी ही, ऐसा कोई नियम तो है नहीं; अज्ञानादि कार्योपयोगिता के संबंध में अनियम ही रहता है इस प्रकार कार्यता के असाधक, अनीश्वरता इत्यादि की, विचार्य विषय में प्राप्ति न होने से, उनकी विपरीत साधकता नहीं हो सकती । कुलालादीनां दण्डचक्राद्यधिष्ठानं शरीरद्वारेणैव दृष्टम् इति जगदुपादानोपकरणाधिष्ठानमीश्वरस्याशरीरस्याानुपपन्नमिति चेत्- न, संकल्पमात्रेणैव परशरीरगत भूतवेतालगरलाद्यपगमविनाश दर्शनात् । कथमशरीरस्य परप्रवर्त्तनरूपः संकल्प इति चेत्, न शरीरापेक्षः संकल्पः, शरीरस्य संकल्प हेतुत्वाभावात् । मन एव हि संकल्पहेतुः । तदभ्युपगतमीश्वरेऽपि, कार्यत्वेनैव ज्ञानशक्तिवन्मनं- सोऽपि प्राप्तत्वात् । मानसः संकल्प शरीरस्यैव, सशरीरस्यैव समनं-

ंसकत्वादिति चेत्, न-मनसो नित्यत्वेन देहापगमेऽपि मनसःसद्भावे- नानैकान्त्यात् । अतो विचित्रावयवसन्निवेशविशेषतनुभुवनादि कार्यनिर्माणे पुण्यपापपरवशः परिमितशक्तिज्ञानः क्षेत्रज्ञो न प्रभवतीति, निखिलभुवननिर्माणचतुरोऽचिन्त्यापरिमित ज्ञान- शक्त्यैश्वर्योऽशरीरः संकल्पमात्रसाधनपरिनिष्पन्नानंतविस्तार विचित्ररचनप्रपंचः पुरुषविशेष ईश्वरोऽनुमानेनैव सिद्ध्यति । अतः प्रमाणान्तरावसेयत्वात् ब्रह्मणः नैतद् वाक्यं ब्रह्म प्रतिपाद- यति । किं च—अत्यंतभिन्नयोरेव मृद्द्रव्यकुलालयोः निमित्तो पादानत्वदर्शनेन, आकाशादेर्निरवयवद्रव्यस्य कार्यत्वानुपपत्या च नैकमेव ब्रह्म कृत्स्नस्य जगतो निमित्तमुपादानं च प्रतिवादयितुं शक्नोति इति । कुम्हार आदि अपने शरीर द्वारा ही, दंडचक्र आदि कार्योपकरणों का प्रयोग करते हैं; शरीर रहित ईश्वर, जगत के उपादान और उपकरण आदि का प्रेरक नहीं हो सकता ? ऐसा संशय भी नहीं करना चाहिए; प्रायः देखा जाता है कि-इच्छामात्र से ही, पर शरीरगत भूत वेताल आदि द्वारा, विष का विनाश हो जाता है। अशरीरी ईश्वर का पर प्रेरक रूप संकल्प हो कैसे सकता है ? ऐसी शंका भी निर्मूल है, क्योंकि-संकल्प में शरीर होना आवश्यक नहीं है, शरीर में संकल्प हेतुता है ही नहीं, केवल मन ही संकल्प का हेतु है। ईश्वर का मन भी स्वीकारना होगा, उनकी कार्यकारिता से ही ज्ञानशक्तिमान् मन की सत्ता अनुमित होती है। मानस संकल्प शरीर वाले को ही होता हो, शरीरी ही मनवाला हो सकता है, ऐसा भी नहीं कह सकते। मन नित्य पदार्थ है, देह के समाप्त हो जाने पर भी मन का अस्तित्व रहता है। मन शरीर संबद्ध होकर ही रहता हो ऐसा भी कोई नियम नहीं है। इससे निश्चित होता है कि- विचित्र अवयव सन्निवेश संपन्न शरीर और विश्व आदि के निर्माण में चतुर अचिन्त्य, अपरिमित, ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्यशाली, अशरीर, संकल्प- मात्र साधन से बनाने वाले अनंत विस्तृत जगत का रचयिता, पुरुष विशेष

( २४७ ) ईश्वर अनुमान से ही सिद्ध होता है । शास्त्र प्रमाण के बिना ही, अनुमान प्रमाण से ही ब्रह्म जगत का कर्त्ता सिद्ध हो जाता है । "यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य ब्रह्म प्रतिपादक नहीं प्रतीत होते । तथा-घट के निर्माण में मिट्टी और कुम्हार दो कारण देखे जाते हैं, आकाशादि निराकार की कार्यता होती नही, इसलिए एक ही ब्रह्म को समस्त जगत का निमित्त और उपादान दोनों कारण मानना भी शक्य नहीं है । सिद्धान्तः-एवं प्राप्ते ब्रूमः-यथोक्त लक्षणं ब्रह्म जन्मादि वाक्यं बोधयत्येव । कुतः ? शास्त्रैकप्रमाणकत्वाद् ब्रह्मणः । यदुक्तं- सावयवत्वादिना कार्यं सर्वं जगत् । कार्यं च तदुचितकर्त्तृ विशेषपूर्वकं दृष्टमिति निखिलजगन्निर्माणतदुपादानोपकरणवेदनचतुरः कश्चि- दनुमेयः, इति । तदयुक्तम्, महीमहार्णवादोना कार्यत्वेऽप्येकदैवैकेन निर्मिता इत्यत्रप्रमाणाभावात् । न चैकस्य घटस्येव सर्वेषामेकं कार्यत्वं, येनैकदैवैकः कर्त्ता स्यात् । पृथग्भूतेषु कार्येषु कालभेदकर्त्तृ- भेददर्शनेन कर्त्तृ कालैक्यनियमादर्शनात् । न च क्षेत्रज्ञानां विचित्र- जगन्निर्माणशक्त्यभावात्कार्यत्वबलेन तदतिरिक्तकल्पनायां अनेककल्पना- नुपपत्तेश्चैकः कर्त्ता भवितुमर्हतीति क्षेत्रज्ञानामेवोपचितपुण्यविशेषाणां शक्तिवैचित्र्यदर्शनेन तेषामेवातिशयितादृष्टसंभावनया च तत्तद्वि- लक्षणकार्य हेतुत्वसंभवात्, तदतिरिक्तात्यन्तादृष्टपुरुषकल्पनानु- पपत्तेः । न च युगपत्सर्वोत्पत्तिविनाशादर्शनाच्च । कार्यत्वेन सर्वोत्प- त्तिविनाशयोः कल्प्यमानयोर्दर्शनानुगुण्येन कल्पनायां विरोधाभा- वाच्च । अतो बुद्धिमदेककर्त्तृ कत्वे साध्ये कार्यत्वस्यानैकान्त्यम् , पक्षस्याप्रसिद्धविशेषणत्वम् , साध्यविकलता च दृष्टान्तस्य, सर्वंनिर्माणचतुरस्य एकस्याप्रसिद्धेः । बुद्धिमत् कर्त्तृ कत्वमात्रे साध्ये सिद्धसाधनता । ankurnagpal108@gmail.com

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( २४८ ) सिद्धांत:-जगत के जन्मादि बोधक “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्य निश्चि- चत ही, ब्रह्म प्रतिपादक हैं, क्योंकि-ब्रह्म एकमात्र शास्त्र द्वारा ही प्रमाणित हैं। जो यह कहा कि-कार्य रूप संपूर्ण साकार जगत किसी ऐसे चतुर की ही रचना हो सकती है, जो कि समस्त जगत के निर्माण सम्बन्धी उपादान, उपकरण आदि को भली भाँति जानता है, क्योंकि कार्य, उचित कर्त्ताविशेष द्वारा ही प्रतीत होता है। यह कथन युक्ति संगत नहीं है। विशाल पृथिवी, विस्तृत समुद्र आदि कार्य, एक ही समय, एकही निर्माता द्वारा निर्मित हुए हों, ऐसा कोई प्रमाण नही मिलता । घट की तरह सारे पदार्थ एक ही उपादान के कार्य हों, अथवा एक ही समय एक ही कर्त्ता के कार्य हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता । विभिन्न कार्यों मे कालभेद, कर्त्ताभेद देखा जाता है कर्त्ता और काल की एकता भी निश्चित नही होती । जीवों की, विचित्र जगत निर्माण में शक्ति न होने से, जगत की कार्यता में, जीवातिरिक्त कर्त्ता की कल्पना करने में, अनेक

( २४६ ) सर्ववस्तुगतत्वे अनेककर्त्तृकत्वसाधनाद्विरुद्धता । अत्राप्येककर्त्तृक- त्वसाधने, प्रत्यक्षानुमानविरोधः शास्त्रविरोधश्च, "कुंभकारो जायते रथकारो जायते" इत्यादि श्रवणात् । सर्वज्ञ, सर्वशक्ति-समन्वित, किसी एक कर्त्ता की, साधक, समस्त वस्तुओं की एक साथ होने वाली कार्यता है ? अथवा समस्त वस्तुओं क्रमिक उत्पत्ति है ? समस्त वस्तुओं की एक साथ उत्पत्ति मानने से कार्यता की असिद्धि होती है तथा समस्त वस्तुओं की क्रमिक उत्पत्ति मानने से अनेक कर्तृत्व की सिद्धि होती है, जो कि साधन विरुद्ध है । यहाँ भी एक कर्तृत्व मानने से प्रत्यक्ष और अनुमान से विपरीतता और शास्त्र विपरीतता होती है--"कुंभकार होता है, रथकार होता है" ऐसा भिन्न-भिन्न कर्त्ताओं का ही वर्णन किया गया है । अपि च—सर्वेषां कार्याणां शरीरादीनां च सत्त्वादिगुणकार्य रूपसुखाद् यन्वयदर्शनेन सत्त्वादि मूलत्वमवश्याश्रयणीयम् । कार्य वैचित्र्यहेतुभूताः कारणगता विशेषाः सत्त्वादयः । तेषां कार्याणां तन्मूलत्वापादनं तद्युक्तपुरुषान्तः करणविकारद्वारेण । पुरुषस्य च तद्योगः कर्ममूल इति कार्यविशेषारम्भायैव, ज्ञानशक्तिवत्कर्त्तुः कर्म्मसंबन्धः । कार्य हेतुत्वेनैवावश्याश्रयणीयः, ज्ञानशक्ति वैचित्र्यस्य च कर्म्ममूलत्वात् । इच्छायाः कार्यारम्भहेतुत्वेऽपि विषयविशेषविशे- षितायास्तस्यास्सत्त्वादिमूलकत्वेन कर्मसंबंधोऽवर्जनीयः, अतः क्षेत्रज्ञा एव कर्त्तारः, न तद्विलक्षणः कश्चिदनुमानात् सिध्यति । देखा जाता है कि-शरीर आदि सारे कार्य, सत्त्व-रज और तमोगुण के परिणाम सुख आदि से, संबद्ध रहते हैं; इसलिए सत्त्व आदि को इनका मूल कारण मानना पड़ता है। कार्य वैचित्र्य के मूल कारण सत्त्वादि गुण ही, कारणगत विशेष धर्म हैं। सारे विचित्र कार्य सत्त्व आदि गुण मूलक ही होते हैं। सारे कार्य, सत्त्वादि गुणों से युक्त पुरुष के अन्तःकरण के विकारों के ही परिणाम होते हैं । पुरुषों का गुणों के

( ३५० ) साथ जो सम्बन्ध होता है, वह कर्म मूलक होता है। कार्यं संपादन में जैसे मनुष्यों को ज्ञान शक्ति मानते हैं, वैसे ही कर्म सम्बन्ध में भी मानना चाहिए, क्योंकि-ज्ञान शक्ति की विचित्रता भी कर्ममूलक ही होती है, इच्छा कार्यारम्भ की हेतु होती है, फिर भी, विषय विशेष से विशेषित वह इच्छा सत्व आदि गुण मूलक ही होती है, इस प्रकार उसका कर्म सम्बन्ध अनिवार्य हो जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि-जीव ही कर्त्ता है, उसके अतिरिक्त कोई और अनुमान सिद्ध व्यक्तित्व नहीं है। भवंति च प्रयोगाः-तनुभुवनादि क्षेत्रज्ञकर्तृकम्, कार्यत्वात् घटवत् । ईश्वरः कर्त्ता न भवति, प्रयोजनशून्यत्वात् मुक्तात्मवत् । ईश्वरः कर्त्ता न भवति, अशरीरत्वात् तद्वदेव । न च क्षेत्रज्ञानां स्वशरीराधिष्ठाने व्यभिचारः, तत्राप्यनादेः सूक्ष्मशरीरस्य सद्- भावात् विमति विषयः कालो न लोकशून्यः कालत्वात् वर्तमाम- कालवत् इति । प्रायः सामान्य लोग कहा करते हैं कि-शरीर, विश्व आदि, घट आदि की तरह, जीव के ही निर्माण हैं। ईश्वर को आवश्यकता ही क्या है कि, वह सृष्ट करे, वह तो मुक्त पुरुष की तरह स्वच्छन्द है। ईश्वर, मुक्त पुरुष की तरह शरीर रहित है, इसलिए वह कर्त्ता हो ही कैसे सकता है ? जीवों का कभी शरीराभाव तो हो ही नहीं सकता, जिससे सृष्टि उच्छेद की शंका हो, सूक्ष्म शरीर की तो सदा स्थिति रहती है। कोई भी ऐसा समय नहीं होता जब कि-सृष्टि न रहे, काल का कभी उच्छेद नहीं होता, सदा एकसा काल का चक्र चलता रहता है। इत्यादि अपि च-किमीश्वरः सशरीरोऽशरीरो वा कार्यं करोति । न तावदशरीरः अशरीरस्य कर्तृत्वानुपलब्धेः । मानसान्यपि कार्याणि सशरीरस्यैव भवंति, मनसो नित्यत्वेऽप्यशरीरेषु मुक्तेषु तत्कार्यं अदर्शनात् । नापि सशरीरः विकल्पासहत्वात् । तच्छरीरं किं नित्यम् ? उतं नित्यम् ? न तावन्नित्यम्, सावयवस्य तस्य नित्यत्वे ankurnagpal108@gmail.com

( २५१ ) जगतोऽपि नित्यत्वाविरोधादीश्वरासिद्धेः । नाप्यनित्यम्, तद्व्य- तिरिक्तस्य तच्छरीरहेतोस्तदानीमभावात् । स्वयमेव हेतुरिति चेत्, न, अशरीरस्य योगात् । अन्येन शरीरेण सशरीर इति चेत्, न, अनवस्थानात् । और भी तर्क किये जाते है कि यदि ईश्वर जगत बनाता है तो क्या शरीर धारण करता है अथवा नहीं ? बिना शरीर वाला होकर तो वह सृष्टि कर नहीं सकता, बिना शरीर वाले का कोई निर्माण कार्य देखा नहीं जाता । मानस कार्य भी शरीर धारी के ही होते हैं, मन के नित्य होते हुए भी, मुक्त पुरुषों में मानस कार्य का अभाव होता है । ईश्वर शरीर धारण कर, सृष्टि करता है, यह भी थोथा तर्क है । यदि ईश्वर का शरीर है तो वह नित्य है या अनित्य ? नित्य तो हो नहीं सकता, उसकी नित्य साकारता स्वीकारने से, साकार जगत को भी नित्य मानना पड़ेगा और फिर नित्य जगत के उत्पादन में ईश्वर की उपयोगिता ही क्या रहेगी ? ईश्वर का शरीर अनित्य भी नहीं हो सकता क्योंकि-ईश्वर के शरीर के निर्माता का कोई वर्णन नहीं मिलता । वह स्वयं तो अपने शरीर का निर्माता हो नहीं सकता, कोई भी अशरीरी, शरीर का निर्माता नहीं हुआ करता । अपने अन्य शरीर से वह शरीर निर्माण करता है, ऐसा मानने से अनेक अन्य निर्माता शरीरों की कल्पना करनी पड़ेगी, अतः अनवस्था उपस्थित होगी । स किं सव्यापारो निर्व्यापारो वा ? अशरीरत्वादेव न सव्यापारः । नापि निर्व्यापारः कार्यं करोति मुक्तात्मवत् । कार्यं जगदिच्छामात्रव्यापारकर्तृकमित्युच्यमाने पक्षस्याप्रसिद्धविशेषण- त्वम्, दृष्टान्तस्य च साध्यहीनता । श्रतो दर्शनानुगुण्येनेश्वरानु- मानं दर्शनानुगुण्यपराहतमिति शास्त्रैकप्रमाणकः परब्रह्मभूतः सर्वेश्वरः पुरुषोत्तमः । वह ईश्वर सचेष्ट है अथवा निश्चेष्ट ? ( यह भी विचारणीय है ) वह शरीरी नहीं है, इसलिए सचेष्ट नहीं कह सकते । निश्चेष्ट भी नहीं

कह सकते, क्योंकि-वह मुक्तात्माओं की तरह कार्य करता है। इच्छामात्र चेष्टा कर्तृक, जागतिक कार्य मानने से, पक्ष की अप्रसिद्ध विशेषता होती है (अर्थात् जगत के लिए कोई भी ऐसा विशेषण नहीं मिलता, जिसमें यह कहा गया हो कि-वह इच्छात्मक है) ऐसा मानने से दृष्टान्त भी साध्य नहीं होता (अर्थात् सृष्टि के सम्बन्ध में जो कुम्हार का दृष्टान्त दिया जाता है, वह भी विपरीत सिद्ध होगा, क्योंकि-इच्छामात्र से कुम्हार का कार्य होते नहीं देखा जाता) इस प्रकार प्रत्यक्ष के अनुसार ईश्वर सम्बन्धी अनुमान असिद्ध हो जाता है। इससे मानना होगा कि-परब्रह्म रूप सर्वेश्वर पुरुषोत्तम, एकमात्र शास्त्र प्रमाण से ही परिज्ञान हैं। शास्त्रन्तु सकलेतर प्रमाण परिदृष्टसमस्तवस्तु विसजातीयं सार्वज्ञसत्य ' कल्पत्वादि मिश्रानवधिकातिशयापरिमितोदारगुण सागरं निखिलहेय प्रत्यनीक स्वरूपं प्रतिपादयतीति न प्रमाणान्त- रावसितवस्तु साधर्म्यप्रयुक्तदोषगंधप्रसंगः । यत्तु निमित्तोपादान- योरैक्यमाकाशादेर्निरवयवद्रव्यस्य कार्यत्वं चानुपलब्धम् अशक्य- प्रतिपादनमित्युक्तम्, तदप्यविरुद्धमिति “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता- नुपरोधात्” न वियदश्रुतेः ' इत्यत्र प्रतिपादयिष्यते । अतः प्रमाणान्तरागोचरत्वेनशास्त्रैकविषयत्वात् “यतो वा इमानि भूतानि” इति वाक्यं उक्तलक्षणं ब्रह्म प्रतिपादयतीति सिद्धम् । शास्त्र-अन्यान्य प्रमाणों से सिद्ध होनी वाली समस्त वस्तुओं से विलक्षण; सर्वज्ञता, सत्यसंकल्पता आदि से युक्त, सीमा और तारतम्य रहित, अत्यन्त अपरिमित, उदार गुणों के सागर, हीन और निकृष्ट गुणों से रहित, उसी ईश्वर का वर्णन करते हैं इसलिए अन्य प्रमाणों से निर्णीत अन्य वस्तुओं से, ईश्वर से समता की बात, कही नहीं जा सकती । और जो यह कहा कि-एक ही वस्तु की निमित्त और उपादान कारणता तथा निराकार आकाश आदि की उत्पति कहीं देखी नहीं जाती न शक्य ही है। यह आपका कथन ठीक है, पर यह हमारे सिद्धान्त से विरुद्ध नहीं होता। इसकी अविरुद्धता का हम “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा

( २५३ ) दृष्टान्तानुपरोधात् “न वियदश्रुतेः” सूत्रों में सुष्ठु प्रतिपादन करेंगे । अन्य प्रमाणों से अगम्य वह ईश्वर, एकमात्र शास्त्र का ही विषय है” “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्य, उक्त लक्षणों वाले ब्रह्म के ही प्रतिपादक सिद्ध होते हैं । ४ समन्वयाधिकरण :— यद्यपि प्रमाणान्तरागोचरं ब्रह्म; तथापि प्रवृत्तिनिवृत्तिपरत्वा- भावेन सिद्धरूपं ब्रह्म न शास्त्रं प्रतिपादयतीत्याशंक्याह— ब्रह्म, यद्यपि अन्य प्रमाणों का विषय नहीं है, फिर भी, शास्त्र कभी स्वतः सिद्ध ब्रह्म का, प्रतिपादक नहीं हो सकता, क्योकि-ईश्वर में प्रवृति निवृति कुछ भी नही है-इस संशय पर कहते है— तत्तु समन्वयात् ।१।१।४— प्रसक्ताशंकानिवृत्त्यर्थः तु शब्दः । तत् शास्त्र प्रमाणकत्वं ब्रह्मणः संभवत्येव । कुतः ? समन्वयात्-परमपुरुषार्थतयाऽन्वयः समन्वयः, परम् पुरुषार्थभूतस्यैव ब्रह्मणोऽभिधेयतयाऽन्वयात् । की गई आशंका की निवृति के लिए, सूत्र में तु शब्द का प्रयोग किया गया है । तत् शब्द ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता की सम्भावना का द्योतक है । सारे शास्त्र, एक मात्र ईश्वर को ही परं पुरुषार्थ प्रतिपादन करते हैं । विधिपूर्ण अन्वय अर्थात् सम्बन्ध को ही समन्वय कहते है, अर्थात् सारे शास्त्र ईश्वर को पर पुरुषार्थ मानने में एकमत है, इसीसे ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता सिद्ध होती है । एवमिव समन्वितो हि औपनिषदः पदसमुदायः “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते”—“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्विती- यम्”—“तदैक्षत् बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत” “ब्रह्म वा इदमेकमेवाग्र आसीत्”— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”— “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” —— “एको ह वै नारायण आसीत् ” आनन्दो ब्रह्म” इत्येवमादिः । ankurnagpal108@gmail.com

औपनिषद् पद समूह इसी प्रकार एक मत है—"जिससे यह सारा भूत समुदाय उत्पन्न होता है—हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व यह जगत निश्चित ही एक अद्वितीय सत था-उसने इच्छा की अनेक हो जाऊँ तब उसने तेज की सृष्टि की-यह जगत् सृष्टि के पूर्व एक ब्रह्म रूप ही था । सृष्टि के पूर्व यह आत्म स्वरूप ही था— ब्रह्म, सत्य-ज्ञान-आनन्द स्वरूप है-इस आत्मा से आकाश प्रकट हुआ-सृष्टि के पूर्व प्रसिद्ध यह नारायण रूप ही था-ब्रह्म आनंद स्वरूप है ।'' इत्यादि । न च व्युत्पत्तिसिद्धपरिनिष्पन्नवस्तुप्रतिपादनसमर्थानां पदसमुदायानां अखिलजगदुत्पत्तिस्थितिविनाशहेतु भूताशेषदोष प्रत्यनीकापरिमितोदारगुणसागरानवधिकातिशयानन्दस्वरूपे ब्रह्मणि समन्वितानां प्रवृत्तिनिवृत्तिरूपप्रयोजन विरहादन्यपरत्वं, स्वविषयावबोधपर्यवसायित्वात् सर्वं प्रमाणानाम् न च प्रयोजनानु- गुण्या प्रमाण प्रवृत्तिः । प्रयोजनं हि प्रमाणानुगुणम् । न च प्रवृत्ति- निवृत्त्यन्वयविरहिणः प्रयोजनशून्यत्वम् पुरुषान्वयप्रतीतेः । तथा स्वरूप परेष्वपि "पुत्रस्तेजातः" "नायं सर्प" इत्यादिषु हर्षभयनिवृत्ति- रूप प्रयोजनत्वं दृष्टम् । शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार सुव्यवस्थित वस्तु के प्रतिवादन में समर्थ शास्त्रीय पदों का, जब समस्त जगत की सृष्टि-स्थिति और प्रलय के हेतु निर्दोष, असीम उदार गुणों के सागर, अन्यन्त आनन्द स्वरूप ब्रह्म में ही ऐकमत्य है तब, प्रवृत्ति-निवृत्ति रूप प्रयोजन रहित ईश्वर के होने से, शास्त्रों की अन्यपरता होगी; ऐसी शंका भी असंगत है । समस्त प्रमाणों की, अपने अपने विषयों को सुस्पष्ट करा देने में ही चरितार्थता होती है । प्रयोजन के अनुसार प्रमाणों की प्रवृत्ति होती हो, ऐसा भी नहीं है, अपितु प्रयोजन ही प्रमाणों के अनुरूप होता है । प्रवृत्ति-निवृत्ति एकता से रहित वाक्यों को प्रयोजन हीन भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि-सारे वाक्य परमपुरुषार्य में एक मत प्रतीत होते हैं । उसी प्रकार "तुम्हारे पुत्र हुआ" यह सर्प नहीं है" इत्यादि निष्पन्नार्थ बोधक वाक्यों में भी, हर्ष और भय निवृत्ति रूप प्रयोजन दिखलाई देता है ।

( २५५ ) अत्राह-न वेदांतवाक्यानि ब्रह्म प्रतिपादयंति, प्रवृत्तिनिवृत्त्यन्वय विरहिणः शास्त्रस्यानर्थक्यात् । यद्यपि प्रत्यक्षादीनि वस्तुयाथात्म्याव- बोधे पर्यवस्यन्ति, तथाऽपि शास्त्रं प्रयोजनपर्यवसाय्येव न हि लोक- वेदयोः प्रयोजनरहितस्य कस्यचिदपि वाक्यस्य प्रयोग उपलब्धचरः। न च किंचित् प्रयोजनमनुद्दिश्य वाक्यप्रयोगः श्रवणं वा संभवति । तच्च प्रयोजनं प्रवृत्तिनिवृत्तिसाध्येष्टानिष्ट प्राप्तिपरिहारात्मकमुप- लब्धम् “अर्थार्थी राजकुलं गच्छेत्”--मंदाग्निर्नम्बुपिवेत्”--स्वर्ग- कामो यजेत्”--न कलंजं भक्षयेत्”--इत्येवमादिषु यत्पुनः सिद्ध- वस्तुपरेष्वपि “पुत्रस्ते जातः”-- “नायं सर्पः रज्जुरेषा” इत्यादिषु हर्ष-भयनिवृत्तिरूपपुरुषार्थान्वयो दृष्ट इत्युक्तम् । तत्र किं पुत्रजन्मा- द्यथतिपुरुषार्थावाप्तिः ? उत् तत् ज्ञानादिति विवेचनीयम् हताऽप्य- ज्ञातस्यार्थस्यापुरुषार्थत्वेन तत् ज्ञानादिति चेत्-तर्हि असत्यप्यर्थे ज्ञानादेव पुरुषार्थः सिध्यतीत्यर्थपरत्वाभावेन प्रयोजनपर्यवसायि- नोऽपि शास्त्रस्य नार्थसद्भावे प्रमाण्यम् । तस्मात् सर्वत्र प्रवृत्ति- निवृत्ति परत्वेन ज्ञानपरत्वेन वा प्रयोजनपर्यवसानमिति कस्यापि वाक्यस्य परिनिष्पन्ने वस्तुनि तात्पर्यासंभवान्त वेदांताः परि- निष्पन्नं ब्रह्म प्रतिपादयंति । (इस पर प्रतिपक्षी कहते हैं)—वेदांत वाक्य ब्रह्म प्रतिपादक नहीं हो सकते, प्रवृत्ति-निवृत्ति प्रतिपादन रहित शास्त्र व्यर्थ होते हैं। यद्यपि 'प्रत्यक्ष आदि प्रमाण, वस्तु के यथार्थस्वरूप को ही ज्ञात कराने में चरि- तार्थ हैं, तथापि शास्त्र प्रमाण एकमात्र प्रयोजन बोधक ही होता है। लोक और वेद कहीं भी प्रयोजन रहित किसी भी वाक्य का प्रयोग नहीं देखा जाता, और न थोड़े प्रयोजन के बिना वाक्य का प्रयोग ही मिलता है [ अर्थात् बिना प्रयोजन के कोई नहीं बोलता ] प्रयोजन, मनुष्य की प्रवृति और निवृति के अनुसार इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट त्याग रूप ही होता है। "धन के इच्छुक को राजा के पास जाना चाहिए"--मंदाग्नि ankurnagpal108@gmail.com

( २५६ ) ग्रसित व्यक्ति को जल पीना चाहिए- "स्वर्ग की कामना से यज्ञ करना चाहिये"-'कलंज नहीं खाना चाहिए" इत्यादि प्रमाण उक्त बात की हीं पुष्टि करते हैं ।" जो यह कहा कि--सिद्ध वस्तु परक "तुम्हारे पुत्र हुआ" "यह सर्प नही रस्सी है" इत्यादि वाक्यों में हर्ष और भय निवृत्ति रूप अभीष्ट निहित है; सो यहां विचारणीय यह है कि-पुत्र जन्म आदि घटना से, अभीष्ट है, अथवा पुत्र जन्म विषयक ज्ञान मात्र से (अभीष्ट होता है)? विद्यमान वस्तु भी ज्ञान की विषय हुए बिना प्रयोजन साधक नहीं होती, तद् विषयक ज्ञान ही अभीष्ट होता है उक्त मत मानने से; पदार्थ के बिना, केवल ज्ञान से ही अभीष्ट सिद्धि होगी, पदार्थ की सत्ता तो आवश्यक होगी नही तथा प्रयोजन पर्यवसान ही शास्त्र का उद्देश्य होगा, वह पदार्थ का अस्तित्व सूचक तो होगा नही, पदार्थ के अस्तित्व में तो उसे प्रामाणिक कहा नहीं जा सकता। इससे स्पष्ट है कि-सब जगह प्रवृत्ति निवृत्ति परक और तद् विषयक ज्ञान प्रति पादक शास्त्र ही, स प्रयोजन या सार्थक है; शुद्ध स्वतः सिद्ध वस्तु "ब्रह्म" के प्रति

होता है । ब्रह्म को निष्प्रपंच बतलाने के लिए, ब्रह्म के प्रपंच विलय के वर्णन की विधि कही गई है । जीव नामधारी ब्रह्म, प्रपंच से मुक्त हो जाय, इसीलिए अनुष्ठान की विधि कही गई है, इसलिए सारे वाक्य ब्रह्म परक ही हैं । दृष्टि दृश्यात्मक जगत्-प्रपंच विलयन द्वारा ब्रह्म की ज्ञानैकरूपता का साधन करने वाली वह विधि क्या है ? इसका उत्तर— “न दृष्टे र्दृष्टारं पश्येः न मन्तेर्मन्तारं मन्वीथाः” इत्यादि वाक्य में दिया गया है । अर्थात् ब्रह्म को, दृष्टा और दृश्य भेद से शून्य केवल दृशिमात्र रूपवाला जानों । स्वतः सिद्ध होते हुए भी, ब्रह्म की कार्यता निष्प्रपंचता रूप होने से, विरुद्ध नहीं होती । तदयुक्तम्-नियोगवाक्यार्थवादिनां हि नियोगः, नियोज्य- विशेषणम् , विषयः करणम् , इति कर्त्तव्यता, प्रयोक्ता च वक्तव्याः । तत्र हि नियोज्यविशेषणमनुपादेयम् । तच्च निमित्तं फलमिति द्विधा । अत्र किं नियोज्य विशेषणं, तच्च किं निमित्तं फलं वेति विवेचनीयम् । ब्रह्मस्वरूपयाथात्म्यानुभवश्चेन्नियोज्यविशेषणम् , तर्हि न तन्निमित्तम्, जीवनादिवत्तासिद्धत्वात् निमित्तत्वे च तस्य नित्यत्वेनापवर्गोत्तरकालमपि जीवन्निमित्ताग्निहोत्रादिवत् नित्य- तद्विषयानुष्ठानप्रसंगः । नापि फलं नैयोगिकफलत्वेन स्वर्गादि- वदनित्यत्वप्रसंगात् । उक्त कथन असंगत है—नियोग को ही वाक्य का अर्थ बतलाने वाले को ही, नियोग, नियोज्य विशेषण विषय करण या साधन, इति कर्त्तव्यता (अनुष्ठान की पूर्वा पर कर्त्तव्य प्रणाली) और प्रयोक्ता इन सबका निर्धारण करके कुछ कहना चाहिए । वहाँ पर (निष्प्रपंचीकरण में) नियोज्य-विशेषण की तो कोई उपादेयता ही नहीं है । नियोज्य-विशेषण, निमित्त और फल रूप से दो प्रकार का होता है । उक्त स्थल में कौन सा नियोज्य-विशेषण हो सकता है, यह विवेचनीय विषय है । ब्रह्मस्वरूप के यथार्थ अनुभव को ही, नियोज्य-विशेषण कहा जाय, तो भी वह निमित्त तो हो नहीं सकता क्यों कि-वह जीवन की तरह सिद्ध अर्थात् पूर्वनिष्पन्न तो है नहीं, जिससे वह निमित्त हो सके । ब्रह्म के यथार्थ

( २५८ ) अनुभव को निमित्त मान भी लें तो, जीवन निमित्तक (आजीवन) अग्नि- होत्र आदि अनुष्ठान की तरह नित्य हो जायगा, जिससे मोक्ष के बाद भी उसका अनुष्ठान आवश्यक हो जायगा । फल नियोज्य विशेषण भी नहीं हो सकता, क्यों कि-फलस्वरूप होने से, नियोग निष्पन्न स्वर्ग आदि फल की तरह, ब्रह्म ज्ञान का फल भी अनित्य हो जायगा । कश्चात्र नियोगविषयः ? ब्रह्मवेति चेत्, न-तस्य नित्यत्वे नाभव्यरूपत्वात्, अभावार्थत्वाच्च । निष्प्रपंचंब्रह्म साध्यमिति चेत्, साध्यत्वेऽपि फलत्वमेव । अभावार्थत्वान्न विधिविषयत्वम् । साध्यत्वं च कस्य ? किं ब्रह्मणः ? उत् प्रपंचनिवृत्तेः ? न तावत् ब्रह्मणः सिद्धत्वात्, अनित्यत्वं प्रसक्तेश्च । अथ प्रपंचनिवृत्तेः । न तर्हि ब्रह्मणः साध्यत्वम् । प्रपंचनिवृत्तिरेकविधि विषय इति चेत्, न-तस्याः फलत्वेन विधिविषयत्वायोगात् । प्रपंचनिवृत्तिरेव हि मोक्षः । स च फलम् । अस्य च नियोगविषयत्वे नियोगात् प्रपंच- निवृत्तिः प्रपंचनिवृत्त्या नियोगः इतीतरेतराश्रयत्वम् । यहाँ नियोग का विषय है कौन ? ब्रह्म को नियोग का विषय कहना असंगत होगा, क्यों कि-ब्रह्म नित्य है इसलिए वह भव्य अर्थात् क्रिया संपाद्य नहीं हो सकता । निष्प्रपंचीकरण रूप नियोग का विषय यदि ब्रह्म हो जायगा तो उसमें अभावात्मकता होगी; यदि ब्रह्म के निष्प्रपंचभाव को ही साध्य मानते हो तो, वह साध्य होकर फलमात्र ही रहेगा, अभावात्मक होने के कारण, विधिका विषय तो हो नहीं सकेगा । फिर यहाँ साध्यता है किसकी ? ब्रह्म की या प्रपंचनिवृत्ति की ब्रह्म की तो हो नहीं सकती, क्यों कि वह तो नित्य सिद्ध है, साध्य मानने से वह अनित्य हो जावेगा । प्रपंचनिवृत्ति की साध्यता होने पर फिर ब्रह्म की तो साध्यता हो नहीं सकती । प्रपंच निवृत्ति को ही विधि का विषय नहीं कह सकते, क्यों कि-उसे विधि का फल बतलाया गया है, इसलिए वह विधि का विषय नहीं हो सकता । प्रपंच की निवृत्ति ही मोक्ष है, और वही फल है । मोक्ष नामक फल को विधि का विषय बतलाने से अन्योन्याश्रय दोष होगा, अर्थात् नियोग जैसे प्रपंच निवृत्ति ankurnagpal108@gmail.com

( २५६ ) का कारण है, उसी प्रकार प्रपंचनिवृत्ति भी नियोग का कारण हो जायगा । अपि च-किं निवर्त्तनीयः प्रपंचो मिथ्या रूपो सत्यो वा ? मिथ्यारूपत्वे ज्ञाननिवर्त्यत्वादेव नियोगेन न किंचित् प्रयोजनम् । नियोगस्तु निवर्त्तकज्ञानमुत्पाद्यतद् द्वारेण प्रपंचस्य निवर्त्तक इति चेत् तत् स्ववाक्यादेव जातमिति नियोगेन न प्रयोजनम् । वाक्यार्थ- ज्ञानादेव ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यकृत्स्नस्यमिथ्याभूतस्यप्रपंचस्य बाधित- त्वात् सपरिकरस्य नियोगस्यासिद्धिश्च । प्रपंचस्य निवर्त्यत्वे प्रपंच- निवर्त्तको नियोगः किं ब्रह्मस्वरूपमेव उत् तद्व्यतिरिक्तः ? यदि ब्रह्मस्वरूपमेव निवर्त्तकस्य नित्यतया निवर्त्यप्रपंच सद्भाव एव न संभवति । नित्यत्वे न नियोगस्य विषयानुष्ठान साध्यत्वं च न घटते । अथ ब्रह्मस्वरूप व्यतिरिक्तः तस्य कृत्स्न प्रपंचनिवृत्ति रूप- विषयानुष्ठान साध्यत्वेन प्रयोक्ता च नष्ट इत्याश्रयाभावादसिद्धिः : प्रपंचनिवृत्तिरूपविषयानुष्ठाने नैव ब्रह्मस्वरूप व्यतिरिक्तस्य कृत्स्नस्य निवृत्तत्वात् न नियोग निष्पाद्यं मोक्षाख्यंफलं । और भी एक बात विचारणीय है-निवर्त्तनीय प्रपंच मिथ्यारूप है अथवा सत्य ? यदि मिथ्या है तो उसकी ज्ञान से ही निवृत्ति हो सकती है, नियोग की कोई आवश्यकता ही नहीं है। यदि कहो कि-नियोग ही, निवर्त्तक ज्ञान को उत्पन्न करके, उसके द्वारा प्रपंच की निवृत्ति कराने वाला निवर्त्तक है, तो श्रुति के वाक्य से ही जब ज्ञानोत्पत्ति हो जाती है तो नियोग की आवश्यकता ही क्या है ? वाक्यार्थ ज्ञान से ही जब, ब्रह्म से भिन्न, मिथ्यारूप सारा प्रपंचमय जगत बाध्य है तो नियोग और नियोगांग सभी व्यर्थ हैं । यदि नियोग को प्रपंच निवर्त्तक मान भी लें, तो उस प्रपंच निवर्त्तक नियोग का स्वरूप क्या होगा ? वह ब्रह्म स्वरूप है अथवा कोई भिन्न वस्तु है ? यदि ब्रह्म स्वरूप है तो, ब्रह्म की नित्यता से निवर्त्य प्रपंच भी नित्य हो जायगा तथा वह फिर प्रपंच तो ankurnagpal108@gmail.com