भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २५३ ) दृष्टान्तानुपरोधात् “न वियदश्रुतेः” सूत्रों में सुष्ठु प्रतिपादन करेंगे । अन्य प्रमाणों से अगम्य वह ईश्वर, एकमात्र शास्त्र का ही विषय है” “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्य, उक्त लक्षणों वाले ब्रह्म के ही प्रतिपादक सिद्ध होते हैं । ४ समन्वयाधिकरण :— यद्यपि प्रमाणान्तरागोचरं ब्रह्म; तथापि प्रवृत्तिनिवृत्तिपरत्वा- भावेन सिद्धरूपं ब्रह्म न शास्त्रं प्रतिपादयतीत्याशंक्याह— ब्रह्म, यद्यपि अन्य प्रमाणों का विषय नहीं है, फिर भी, शास्त्र कभी स्वतः सिद्ध ब्रह्म का, प्रतिपादक नहीं हो सकता, क्योकि-ईश्वर में प्रवृति निवृति कुछ भी नही है-इस संशय पर कहते है— तत्तु समन्वयात् ।१।१।४— प्रसक्ताशंकानिवृत्त्यर्थः तु शब्दः । तत् शास्त्र प्रमाणकत्वं ब्रह्मणः संभवत्येव । कुतः ? समन्वयात्-परमपुरुषार्थतयाऽन्वयः समन्वयः, परम् पुरुषार्थभूतस्यैव ब्रह्मणोऽभिधेयतयाऽन्वयात् । की गई आशंका की निवृति के लिए, सूत्र में तु शब्द का प्रयोग किया गया है । तत् शब्द ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता की सम्भावना का द्योतक है । सारे शास्त्र, एक मात्र ईश्वर को ही परं पुरुषार्थ प्रतिपादन करते हैं । विधिपूर्ण अन्वय अर्थात् सम्बन्ध को ही समन्वय कहते है, अर्थात् सारे शास्त्र ईश्वर को पर पुरुषार्थ मानने में एकमत है, इसीसे ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता सिद्ध होती है । एवमिव समन्वितो हि औपनिषदः पदसमुदायः “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते”—“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्विती- यम्”—“तदैक्षत् बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत” “ब्रह्म वा इदमेकमेवाग्र आसीत्”— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”— “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” —— “एको ह वै नारायण आसीत् ” आनन्दो ब्रह्म” इत्येवमादिः । ankurnagpal108@gmail.com