श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकह सकते, क्योंकि-वह मुक्तात्माओं की तरह कार्य करता है। इच्छामात्र चेष्टा कर्तृक, जागतिक कार्य मानने से, पक्ष की अप्रसिद्ध विशेषता होती है (अर्थात् जगत के लिए कोई भी ऐसा विशेषण नहीं मिलता, जिसमें यह कहा गया हो कि-वह इच्छात्मक है) ऐसा मानने से दृष्टान्त भी साध्य नहीं होता (अर्थात् सृष्टि के सम्बन्ध में जो कुम्हार का दृष्टान्त दिया जाता है, वह भी विपरीत सिद्ध होगा, क्योंकि-इच्छामात्र से कुम्हार का कार्य होते नहीं देखा जाता) इस प्रकार प्रत्यक्ष के अनुसार ईश्वर सम्बन्धी अनुमान असिद्ध हो जाता है। इससे मानना होगा कि-परब्रह्म रूप सर्वेश्वर पुरुषोत्तम, एकमात्र शास्त्र प्रमाण से ही परिज्ञान हैं। शास्त्रन्तु सकलेतर प्रमाण परिदृष्टसमस्तवस्तु विसजातीयं सार्वज्ञसत्य ' कल्पत्वादि मिश्रानवधिकातिशयापरिमितोदारगुण सागरं निखिलहेय प्रत्यनीक स्वरूपं प्रतिपादयतीति न प्रमाणान्त- रावसितवस्तु साधर्म्यप्रयुक्तदोषगंधप्रसंगः । यत्तु निमित्तोपादान- योरैक्यमाकाशादेर्निरवयवद्रव्यस्य कार्यत्वं चानुपलब्धम् अशक्य- प्रतिपादनमित्युक्तम्, तदप्यविरुद्धमिति “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता- नुपरोधात्” न वियदश्रुतेः ' इत्यत्र प्रतिपादयिष्यते । अतः प्रमाणान्तरागोचरत्वेनशास्त्रैकविषयत्वात् “यतो वा इमानि भूतानि” इति वाक्यं उक्तलक्षणं ब्रह्म प्रतिपादयतीति सिद्धम् । शास्त्र-अन्यान्य प्रमाणों से सिद्ध होनी वाली समस्त वस्तुओं से विलक्षण; सर्वज्ञता, सत्यसंकल्पता आदि से युक्त, सीमा और तारतम्य रहित, अत्यन्त अपरिमित, उदार गुणों के सागर, हीन और निकृष्ट गुणों से रहित, उसी ईश्वर का वर्णन करते हैं इसलिए अन्य प्रमाणों से निर्णीत अन्य वस्तुओं से, ईश्वर से समता की बात, कही नहीं जा सकती । और जो यह कहा कि-एक ही वस्तु की निमित्त और उपादान कारणता तथा निराकार आकाश आदि की उत्पति कहीं देखी नहीं जाती न शक्य ही है। यह आपका कथन ठीक है, पर यह हमारे सिद्धान्त से विरुद्ध नहीं होता। इसकी अविरुद्धता का हम “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा