श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५१ ) जगतोऽपि नित्यत्वाविरोधादीश्वरासिद्धेः । नाप्यनित्यम्, तद्व्य- तिरिक्तस्य तच्छरीरहेतोस्तदानीमभावात् । स्वयमेव हेतुरिति चेत्, न, अशरीरस्य योगात् । अन्येन शरीरेण सशरीर इति चेत्, न, अनवस्थानात् । और भी तर्क किये जाते है कि यदि ईश्वर जगत बनाता है तो क्या शरीर धारण करता है अथवा नहीं ? बिना शरीर वाला होकर तो वह सृष्टि कर नहीं सकता, बिना शरीर वाले का कोई निर्माण कार्य देखा नहीं जाता । मानस कार्य भी शरीर धारी के ही होते हैं, मन के नित्य होते हुए भी, मुक्त पुरुषों में मानस कार्य का अभाव होता है । ईश्वर शरीर धारण कर, सृष्टि करता है, यह भी थोथा तर्क है । यदि ईश्वर का शरीर है तो वह नित्य है या अनित्य ? नित्य तो हो नहीं सकता, उसकी नित्य साकारता स्वीकारने से, साकार जगत को भी नित्य मानना पड़ेगा और फिर नित्य जगत के उत्पादन में ईश्वर की उपयोगिता ही क्या रहेगी ? ईश्वर का शरीर अनित्य भी नहीं हो सकता क्योंकि-ईश्वर के शरीर के निर्माता का कोई वर्णन नहीं मिलता । वह स्वयं तो अपने शरीर का निर्माता हो नहीं सकता, कोई भी अशरीरी, शरीर का निर्माता नहीं हुआ करता । अपने अन्य शरीर से वह शरीर निर्माण करता है, ऐसा मानने से अनेक अन्य निर्माता शरीरों की कल्पना करनी पड़ेगी, अतः अनवस्था उपस्थित होगी । स किं सव्यापारो निर्व्यापारो वा ? अशरीरत्वादेव न सव्यापारः । नापि निर्व्यापारः कार्यं करोति मुक्तात्मवत् । कार्यं जगदिच्छामात्रव्यापारकर्तृकमित्युच्यमाने पक्षस्याप्रसिद्धविशेषण- त्वम्, दृष्टान्तस्य च साध्यहीनता । श्रतो दर्शनानुगुण्येनेश्वरानु- मानं दर्शनानुगुण्यपराहतमिति शास्त्रैकप्रमाणकः परब्रह्मभूतः सर्वेश्वरः पुरुषोत्तमः । वह ईश्वर सचेष्ट है अथवा निश्चेष्ट ? ( यह भी विचारणीय है ) वह शरीरी नहीं है, इसलिए सचेष्ट नहीं कह सकते । निश्चेष्ट भी नहीं