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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३५० ) साथ जो सम्बन्ध होता है, वह कर्म मूलक होता है। कार्यं संपादन में जैसे मनुष्यों को ज्ञान शक्ति मानते हैं, वैसे ही कर्म सम्बन्ध में भी मानना चाहिए, क्योंकि-ज्ञान शक्ति की विचित्रता भी कर्ममूलक ही होती है, इच्छा कार्यारम्भ की हेतु होती है, फिर भी, विषय विशेष से विशेषित वह इच्छा सत्व आदि गुण मूलक ही होती है, इस प्रकार उसका कर्म सम्बन्ध अनिवार्य हो जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि-जीव ही कर्त्ता है, उसके अतिरिक्त कोई और अनुमान सिद्ध व्यक्तित्व नहीं है। भवंति च प्रयोगाः-तनुभुवनादि क्षेत्रज्ञकर्तृकम्, कार्यत्वात् घटवत् । ईश्वरः कर्त्ता न भवति, प्रयोजनशून्यत्वात् मुक्तात्मवत् । ईश्वरः कर्त्ता न भवति, अशरीरत्वात् तद्वदेव । न च क्षेत्रज्ञानां स्वशरीराधिष्ठाने व्यभिचारः, तत्राप्यनादेः सूक्ष्मशरीरस्य सद्- भावात् विमति विषयः कालो न लोकशून्यः कालत्वात् वर्तमाम- कालवत् इति । प्रायः सामान्य लोग कहा करते हैं कि-शरीर, विश्व आदि, घट आदि की तरह, जीव के ही निर्माण हैं। ईश्वर को आवश्यकता ही क्या है कि, वह सृष्ट करे, वह तो मुक्त पुरुष की तरह स्वच्छन्द है। ईश्वर, मुक्त पुरुष की तरह शरीर रहित है, इसलिए वह कर्त्ता हो ही कैसे सकता है ? जीवों का कभी शरीराभाव तो हो ही नहीं सकता, जिससे सृष्टि उच्छेद की शंका हो, सूक्ष्म शरीर की तो सदा स्थिति रहती है। कोई भी ऐसा समय नहीं होता जब कि-सृष्टि न रहे, काल का कभी उच्छेद नहीं होता, सदा एकसा काल का चक्र चलता रहता है। इत्यादि अपि च-किमीश्वरः सशरीरोऽशरीरो वा कार्यं करोति । न तावदशरीरः अशरीरस्य कर्तृत्वानुपलब्धेः । मानसान्यपि कार्याणि सशरीरस्यैव भवंति, मनसो नित्यत्वेऽप्यशरीरेषु मुक्तेषु तत्कार्यं अदर्शनात् । नापि सशरीरः विकल्पासहत्वात् । तच्छरीरं किं नित्यम् ? उतं नित्यम् ? न तावन्नित्यम्, सावयवस्य तस्य नित्यत्वे ankurnagpal108@gmail.com

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