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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ३५० ) साथ जो सम्बन्ध होता है, वह कर्म मूलक होता है। कार्यं संपादन में जैसे मनुष्यों को ज्ञान शक्ति मानते हैं, वैसे ही कर्म सम्बन्ध में भी मानना चाहिए, क्योंकि-ज्ञान शक्ति की विचित्रता भी कर्ममूलक ही होती है, इच्छा कार्यारम्भ की हेतु होती है, फिर भी, विषय विशेष से विशेषित वह इच्छा सत्व आदि गुण मूलक ही होती है, इस प्रकार उसका कर्म सम्बन्ध अनिवार्य हो जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि-जीव ही कर्त्ता है, उसके अतिरिक्त कोई और अनुमान सिद्ध व्यक्तित्व नहीं है। भवंति च प्रयोगाः-तनुभुवनादि क्षेत्रज्ञकर्तृकम्, कार्यत्वात् घटवत् । ईश्वरः कर्त्ता न भवति, प्रयोजनशून्यत्वात् मुक्तात्मवत् । ईश्वरः कर्त्ता न भवति, अशरीरत्वात् तद्वदेव । न च क्षेत्रज्ञानां स्वशरीराधिष्ठाने व्यभिचारः, तत्राप्यनादेः सूक्ष्मशरीरस्य सद्- भावात् विमति विषयः कालो न लोकशून्यः कालत्वात् वर्तमाम- कालवत् इति । प्रायः सामान्य लोग कहा करते हैं कि-शरीर, विश्व आदि, घट आदि की तरह, जीव के ही निर्माण हैं। ईश्वर को आवश्यकता ही क्या है कि, वह सृष्ट करे, वह तो मुक्त पुरुष की तरह स्वच्छन्द है। ईश्वर, मुक्त पुरुष की तरह शरीर रहित है, इसलिए वह कर्त्ता हो ही कैसे सकता है ? जीवों का कभी शरीराभाव तो हो ही नहीं सकता, जिससे सृष्टि उच्छेद की शंका हो, सूक्ष्म शरीर की तो सदा स्थिति रहती है। कोई भी ऐसा समय नहीं होता जब कि-सृष्टि न रहे, काल का कभी उच्छेद नहीं होता, सदा एकसा काल का चक्र चलता रहता है। इत्यादि अपि च-किमीश्वरः सशरीरोऽशरीरो वा कार्यं करोति । न तावदशरीरः अशरीरस्य कर्तृत्वानुपलब्धेः । मानसान्यपि कार्याणि सशरीरस्यैव भवंति, मनसो नित्यत्वेऽप्यशरीरेषु मुक्तेषु तत्कार्यं अदर्शनात् । नापि सशरीरः विकल्पासहत्वात् । तच्छरीरं किं नित्यम् ? उतं नित्यम् ? न तावन्नित्यम्, सावयवस्य तस्य नित्यत्वे ankurnagpal108@gmail.com

( २५१ ) जगतोऽपि नित्यत्वाविरोधादीश्वरासिद्धेः । नाप्यनित्यम्, तद्व्य- तिरिक्तस्य तच्छरीरहेतोस्तदानीमभावात् । स्वयमेव हेतुरिति चेत्, न, अशरीरस्य योगात् । अन्येन शरीरेण सशरीर इति चेत्, न, अनवस्थानात् । और भी तर्क किये जाते है कि यदि ईश्वर जगत बनाता है तो क्या शरीर धारण करता है अथवा नहीं ? बिना शरीर वाला होकर तो वह सृष्टि कर नहीं सकता, बिना शरीर वाले का कोई निर्माण कार्य देखा नहीं जाता । मानस कार्य भी शरीर धारी के ही होते हैं, मन के नित्य होते हुए भी, मुक्त पुरुषों में मानस कार्य का अभाव होता है । ईश्वर शरीर धारण कर, सृष्टि करता है, यह भी थोथा तर्क है । यदि ईश्वर का शरीर है तो वह नित्य है या अनित्य ? नित्य तो हो नहीं सकता, उसकी नित्य साकारता स्वीकारने से, साकार जगत को भी नित्य मानना पड़ेगा और फिर नित्य जगत के उत्पादन में ईश्वर की उपयोगिता ही क्या रहेगी ? ईश्वर का शरीर अनित्य भी नहीं हो सकता क्योंकि-ईश्वर के शरीर के निर्माता का कोई वर्णन नहीं मिलता । वह स्वयं तो अपने शरीर का निर्माता हो नहीं सकता, कोई भी अशरीरी, शरीर का निर्माता नहीं हुआ करता । अपने अन्य शरीर से वह शरीर निर्माण करता है, ऐसा मानने से अनेक अन्य निर्माता शरीरों की कल्पना करनी पड़ेगी, अतः अनवस्था उपस्थित होगी । स किं सव्यापारो निर्व्यापारो वा ? अशरीरत्वादेव न सव्यापारः । नापि निर्व्यापारः कार्यं करोति मुक्तात्मवत् । कार्यं जगदिच्छामात्रव्यापारकर्तृकमित्युच्यमाने पक्षस्याप्रसिद्धविशेषण- त्वम्, दृष्टान्तस्य च साध्यहीनता । श्रतो दर्शनानुगुण्येनेश्वरानु- मानं दर्शनानुगुण्यपराहतमिति शास्त्रैकप्रमाणकः परब्रह्मभूतः सर्वेश्वरः पुरुषोत्तमः । वह ईश्वर सचेष्ट है अथवा निश्चेष्ट ? ( यह भी विचारणीय है ) वह शरीरी नहीं है, इसलिए सचेष्ट नहीं कह सकते । निश्चेष्ट भी नहीं

कह सकते, क्योंकि-वह मुक्तात्माओं की तरह कार्य करता है। इच्छामात्र चेष्टा कर्तृक, जागतिक कार्य मानने से, पक्ष की अप्रसिद्ध विशेषता होती है (अर्थात् जगत के लिए कोई भी ऐसा विशेषण नहीं मिलता, जिसमें यह कहा गया हो कि-वह इच्छात्मक है) ऐसा मानने से दृष्टान्त भी साध्य नहीं होता (अर्थात् सृष्टि के सम्बन्ध में जो कुम्हार का दृष्टान्त दिया जाता है, वह भी विपरीत सिद्ध होगा, क्योंकि-इच्छामात्र से कुम्हार का कार्य होते नहीं देखा जाता) इस प्रकार प्रत्यक्ष के अनुसार ईश्वर सम्बन्धी अनुमान असिद्ध हो जाता है। इससे मानना होगा कि-परब्रह्म रूप सर्वेश्वर पुरुषोत्तम, एकमात्र शास्त्र प्रमाण से ही परिज्ञान हैं। शास्त्रन्तु सकलेतर प्रमाण परिदृष्टसमस्तवस्तु विसजातीयं सार्वज्ञसत्य ' कल्पत्वादि मिश्रानवधिकातिशयापरिमितोदारगुण सागरं निखिलहेय प्रत्यनीक स्वरूपं प्रतिपादयतीति न प्रमाणान्त- रावसितवस्तु साधर्म्यप्रयुक्तदोषगंधप्रसंगः । यत्तु निमित्तोपादान- योरैक्यमाकाशादेर्निरवयवद्रव्यस्य कार्यत्वं चानुपलब्धम् अशक्य- प्रतिपादनमित्युक्तम्, तदप्यविरुद्धमिति “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता- नुपरोधात्” न वियदश्रुतेः ' इत्यत्र प्रतिपादयिष्यते । अतः प्रमाणान्तरागोचरत्वेनशास्त्रैकविषयत्वात् “यतो वा इमानि भूतानि” इति वाक्यं उक्तलक्षणं ब्रह्म प्रतिपादयतीति सिद्धम् । शास्त्र-अन्यान्य प्रमाणों से सिद्ध होनी वाली समस्त वस्तुओं से विलक्षण; सर्वज्ञता, सत्यसंकल्पता आदि से युक्त, सीमा और तारतम्य रहित, अत्यन्त अपरिमित, उदार गुणों के सागर, हीन और निकृष्ट गुणों से रहित, उसी ईश्वर का वर्णन करते हैं इसलिए अन्य प्रमाणों से निर्णीत अन्य वस्तुओं से, ईश्वर से समता की बात, कही नहीं जा सकती । और जो यह कहा कि-एक ही वस्तु की निमित्त और उपादान कारणता तथा निराकार आकाश आदि की उत्पति कहीं देखी नहीं जाती न शक्य ही है। यह आपका कथन ठीक है, पर यह हमारे सिद्धान्त से विरुद्ध नहीं होता। इसकी अविरुद्धता का हम “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा

( २५३ ) दृष्टान्तानुपरोधात् “न वियदश्रुतेः” सूत्रों में सुष्ठु प्रतिपादन करेंगे । अन्य प्रमाणों से अगम्य वह ईश्वर, एकमात्र शास्त्र का ही विषय है” “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्य, उक्त लक्षणों वाले ब्रह्म के ही प्रतिपादक सिद्ध होते हैं । ४ समन्वयाधिकरण :— यद्यपि प्रमाणान्तरागोचरं ब्रह्म; तथापि प्रवृत्तिनिवृत्तिपरत्वा- भावेन सिद्धरूपं ब्रह्म न शास्त्रं प्रतिपादयतीत्याशंक्याह— ब्रह्म, यद्यपि अन्य प्रमाणों का विषय नहीं है, फिर भी, शास्त्र कभी स्वतः सिद्ध ब्रह्म का, प्रतिपादक नहीं हो सकता, क्योकि-ईश्वर में प्रवृति निवृति कुछ भी नही है-इस संशय पर कहते है— तत्तु समन्वयात् ।१।१।४— प्रसक्ताशंकानिवृत्त्यर्थः तु शब्दः । तत् शास्त्र प्रमाणकत्वं ब्रह्मणः संभवत्येव । कुतः ? समन्वयात्-परमपुरुषार्थतयाऽन्वयः समन्वयः, परम् पुरुषार्थभूतस्यैव ब्रह्मणोऽभिधेयतयाऽन्वयात् । की गई आशंका की निवृति के लिए, सूत्र में तु शब्द का प्रयोग किया गया है । तत् शब्द ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता की सम्भावना का द्योतक है । सारे शास्त्र, एक मात्र ईश्वर को ही परं पुरुषार्थ प्रतिपादन करते हैं । विधिपूर्ण अन्वय अर्थात् सम्बन्ध को ही समन्वय कहते है, अर्थात् सारे शास्त्र ईश्वर को पर पुरुषार्थ मानने में एकमत है, इसीसे ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता सिद्ध होती है । एवमिव समन्वितो हि औपनिषदः पदसमुदायः “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते”—“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्विती- यम्”—“तदैक्षत् बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत” “ब्रह्म वा इदमेकमेवाग्र आसीत्”— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”— “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” —— “एको ह वै नारायण आसीत् ” आनन्दो ब्रह्म” इत्येवमादिः । ankurnagpal108@gmail.com

औपनिषद् पद समूह इसी प्रकार एक मत है—"जिससे यह सारा भूत समुदाय उत्पन्न होता है—हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व यह जगत निश्चित ही एक अद्वितीय सत था-उसने इच्छा की अनेक हो जाऊँ तब उसने तेज की सृष्टि की-यह जगत् सृष्टि के पूर्व एक ब्रह्म रूप ही था । सृष्टि के पूर्व यह आत्म स्वरूप ही था— ब्रह्म, सत्य-ज्ञान-आनन्द स्वरूप है-इस आत्मा से आकाश प्रकट हुआ-सृष्टि के पूर्व प्रसिद्ध यह नारायण रूप ही था-ब्रह्म आनंद स्वरूप है ।'' इत्यादि । न च व्युत्पत्तिसिद्धपरिनिष्पन्नवस्तुप्रतिपादनसमर्थानां पदसमुदायानां अखिलजगदुत्पत्तिस्थितिविनाशहेतु भूताशेषदोष प्रत्यनीकापरिमितोदारगुणसागरानवधिकातिशयानन्दस्वरूपे ब्रह्मणि समन्वितानां प्रवृत्तिनिवृत्तिरूपप्रयोजन विरहादन्यपरत्वं, स्वविषयावबोधपर्यवसायित्वात् सर्वं प्रमाणानाम् न च प्रयोजनानु- गुण्या प्रमाण प्रवृत्तिः । प्रयोजनं हि प्रमाणानुगुणम् । न च प्रवृत्ति- निवृत्त्यन्वयविरहिणः प्रयोजनशून्यत्वम् पुरुषान्वयप्रतीतेः । तथा स्वरूप परेष्वपि "पुत्रस्तेजातः" "नायं सर्प" इत्यादिषु हर्षभयनिवृत्ति- रूप प्रयोजनत्वं दृष्टम् । शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार सुव्यवस्थित वस्तु के प्रतिवादन में समर्थ शास्त्रीय पदों का, जब समस्त जगत की सृष्टि-स्थिति और प्रलय के हेतु निर्दोष, असीम उदार गुणों के सागर, अन्यन्त आनन्द स्वरूप ब्रह्म में ही ऐकमत्य है तब, प्रवृत्ति-निवृत्ति रूप प्रयोजन रहित ईश्वर के होने से, शास्त्रों की अन्यपरता होगी; ऐसी शंका भी असंगत है । समस्त प्रमाणों की, अपने अपने विषयों को सुस्पष्ट करा देने में ही चरितार्थता होती है । प्रयोजन के अनुसार प्रमाणों की प्रवृत्ति होती हो, ऐसा भी नहीं है, अपितु प्रयोजन ही प्रमाणों के अनुरूप होता है । प्रवृत्ति-निवृत्ति एकता से रहित वाक्यों को प्रयोजन हीन भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि-सारे वाक्य परमपुरुषार्य में एक मत प्रतीत होते हैं । उसी प्रकार "तुम्हारे पुत्र हुआ" यह सर्प नहीं है" इत्यादि निष्पन्नार्थ बोधक वाक्यों में भी, हर्ष और भय निवृत्ति रूप प्रयोजन दिखलाई देता है ।

( २५५ ) अत्राह-न वेदांतवाक्यानि ब्रह्म प्रतिपादयंति, प्रवृत्तिनिवृत्त्यन्वय विरहिणः शास्त्रस्यानर्थक्यात् । यद्यपि प्रत्यक्षादीनि वस्तुयाथात्म्याव- बोधे पर्यवस्यन्ति, तथाऽपि शास्त्रं प्रयोजनपर्यवसाय्येव न हि लोक- वेदयोः प्रयोजनरहितस्य कस्यचिदपि वाक्यस्य प्रयोग उपलब्धचरः। न च किंचित् प्रयोजनमनुद्दिश्य वाक्यप्रयोगः श्रवणं वा संभवति । तच्च प्रयोजनं प्रवृत्तिनिवृत्तिसाध्येष्टानिष्ट प्राप्तिपरिहारात्मकमुप- लब्धम् “अर्थार्थी राजकुलं गच्छेत्”--मंदाग्निर्नम्बुपिवेत्”--स्वर्ग- कामो यजेत्”--न कलंजं भक्षयेत्”--इत्येवमादिषु यत्पुनः सिद्ध- वस्तुपरेष्वपि “पुत्रस्ते जातः”-- “नायं सर्पः रज्जुरेषा” इत्यादिषु हर्ष-भयनिवृत्तिरूपपुरुषार्थान्वयो दृष्ट इत्युक्तम् । तत्र किं पुत्रजन्मा- द्यथतिपुरुषार्थावाप्तिः ? उत् तत् ज्ञानादिति विवेचनीयम् हताऽप्य- ज्ञातस्यार्थस्यापुरुषार्थत्वेन तत् ज्ञानादिति चेत्-तर्हि असत्यप्यर्थे ज्ञानादेव पुरुषार्थः सिध्यतीत्यर्थपरत्वाभावेन प्रयोजनपर्यवसायि- नोऽपि शास्त्रस्य नार्थसद्भावे प्रमाण्यम् । तस्मात् सर्वत्र प्रवृत्ति- निवृत्ति परत्वेन ज्ञानपरत्वेन वा प्रयोजनपर्यवसानमिति कस्यापि वाक्यस्य परिनिष्पन्ने वस्तुनि तात्पर्यासंभवान्त वेदांताः परि- निष्पन्नं ब्रह्म प्रतिपादयंति । (इस पर प्रतिपक्षी कहते हैं)—वेदांत वाक्य ब्रह्म प्रतिपादक नहीं हो सकते, प्रवृत्ति-निवृत्ति प्रतिपादन रहित शास्त्र व्यर्थ होते हैं। यद्यपि 'प्रत्यक्ष आदि प्रमाण, वस्तु के यथार्थस्वरूप को ही ज्ञात कराने में चरि- तार्थ हैं, तथापि शास्त्र प्रमाण एकमात्र प्रयोजन बोधक ही होता है। लोक और वेद कहीं भी प्रयोजन रहित किसी भी वाक्य का प्रयोग नहीं देखा जाता, और न थोड़े प्रयोजन के बिना वाक्य का प्रयोग ही मिलता है [ अर्थात् बिना प्रयोजन के कोई नहीं बोलता ] प्रयोजन, मनुष्य की प्रवृति और निवृति के अनुसार इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट त्याग रूप ही होता है। "धन के इच्छुक को राजा के पास जाना चाहिए"--मंदाग्नि ankurnagpal108@gmail.com

( २५६ ) ग्रसित व्यक्ति को जल पीना चाहिए- "स्वर्ग की कामना से यज्ञ करना चाहिये"-'कलंज नहीं खाना चाहिए" इत्यादि प्रमाण उक्त बात की हीं पुष्टि करते हैं ।" जो यह कहा कि--सिद्ध वस्तु परक "तुम्हारे पुत्र हुआ" "यह सर्प नही रस्सी है" इत्यादि वाक्यों में हर्ष और भय निवृत्ति रूप अभीष्ट निहित है; सो यहां विचारणीय यह है कि-पुत्र जन्म आदि घटना से, अभीष्ट है, अथवा पुत्र जन्म विषयक ज्ञान मात्र से (अभीष्ट होता है)? विद्यमान वस्तु भी ज्ञान की विषय हुए बिना प्रयोजन साधक नहीं होती, तद् विषयक ज्ञान ही अभीष्ट होता है उक्त मत मानने से; पदार्थ के बिना, केवल ज्ञान से ही अभीष्ट सिद्धि होगी, पदार्थ की सत्ता तो आवश्यक होगी नही तथा प्रयोजन पर्यवसान ही शास्त्र का उद्देश्य होगा, वह पदार्थ का अस्तित्व सूचक तो होगा नही, पदार्थ के अस्तित्व में तो उसे प्रामाणिक कहा नहीं जा सकता। इससे स्पष्ट है कि-सब जगह प्रवृत्ति निवृत्ति परक और तद् विषयक ज्ञान प्रति पादक शास्त्र ही, स प्रयोजन या सार्थक है; शुद्ध स्वतः सिद्ध वस्तु "ब्रह्म" के प्रति

होता है । ब्रह्म को निष्प्रपंच बतलाने के लिए, ब्रह्म के प्रपंच विलय के वर्णन की विधि कही गई है । जीव नामधारी ब्रह्म, प्रपंच से मुक्त हो जाय, इसीलिए अनुष्ठान की विधि कही गई है, इसलिए सारे वाक्य ब्रह्म परक ही हैं । दृष्टि दृश्यात्मक जगत्-प्रपंच विलयन द्वारा ब्रह्म की ज्ञानैकरूपता का साधन करने वाली वह विधि क्या है ? इसका उत्तर— “न दृष्टे र्दृष्टारं पश्येः न मन्तेर्मन्तारं मन्वीथाः” इत्यादि वाक्य में दिया गया है । अर्थात् ब्रह्म को, दृष्टा और दृश्य भेद से शून्य केवल दृशिमात्र रूपवाला जानों । स्वतः सिद्ध होते हुए भी, ब्रह्म की कार्यता निष्प्रपंचता रूप होने से, विरुद्ध नहीं होती । तदयुक्तम्-नियोगवाक्यार्थवादिनां हि नियोगः, नियोज्य- विशेषणम् , विषयः करणम् , इति कर्त्तव्यता, प्रयोक्ता च वक्तव्याः । तत्र हि नियोज्यविशेषणमनुपादेयम् । तच्च निमित्तं फलमिति द्विधा । अत्र किं नियोज्य विशेषणं, तच्च किं निमित्तं फलं वेति विवेचनीयम् । ब्रह्मस्वरूपयाथात्म्यानुभवश्चेन्नियोज्यविशेषणम् , तर्हि न तन्निमित्तम्, जीवनादिवत्तासिद्धत्वात् निमित्तत्वे च तस्य नित्यत्वेनापवर्गोत्तरकालमपि जीवन्निमित्ताग्निहोत्रादिवत् नित्य- तद्विषयानुष्ठानप्रसंगः । नापि फलं नैयोगिकफलत्वेन स्वर्गादि- वदनित्यत्वप्रसंगात् । उक्त कथन असंगत है—नियोग को ही वाक्य का अर्थ बतलाने वाले को ही, नियोग, नियोज्य विशेषण विषय करण या साधन, इति कर्त्तव्यता (अनुष्ठान की पूर्वा पर कर्त्तव्य प्रणाली) और प्रयोक्ता इन सबका निर्धारण करके कुछ कहना चाहिए । वहाँ पर (निष्प्रपंचीकरण में) नियोज्य-विशेषण की तो कोई उपादेयता ही नहीं है । नियोज्य-विशेषण, निमित्त और फल रूप से दो प्रकार का होता है । उक्त स्थल में कौन सा नियोज्य-विशेषण हो सकता है, यह विवेचनीय विषय है । ब्रह्मस्वरूप के यथार्थ अनुभव को ही, नियोज्य-विशेषण कहा जाय, तो भी वह निमित्त तो हो नहीं सकता क्यों कि-वह जीवन की तरह सिद्ध अर्थात् पूर्वनिष्पन्न तो है नहीं, जिससे वह निमित्त हो सके । ब्रह्म के यथार्थ

( २५८ ) अनुभव को निमित्त मान भी लें तो, जीवन निमित्तक (आजीवन) अग्नि- होत्र आदि अनुष्ठान की तरह नित्य हो जायगा, जिससे मोक्ष के बाद भी उसका अनुष्ठान आवश्यक हो जायगा । फल नियोज्य विशेषण भी नहीं हो सकता, क्यों कि-फलस्वरूप होने से, नियोग निष्पन्न स्वर्ग आदि फल की तरह, ब्रह्म ज्ञान का फल भी अनित्य हो जायगा । कश्चात्र नियोगविषयः ? ब्रह्मवेति चेत्, न-तस्य नित्यत्वे नाभव्यरूपत्वात्, अभावार्थत्वाच्च । निष्प्रपंचंब्रह्म साध्यमिति चेत्, साध्यत्वेऽपि फलत्वमेव । अभावार्थत्वान्न विधिविषयत्वम् । साध्यत्वं च कस्य ? किं ब्रह्मणः ? उत् प्रपंचनिवृत्तेः ? न तावत् ब्रह्मणः सिद्धत्वात्, अनित्यत्वं प्रसक्तेश्च । अथ प्रपंचनिवृत्तेः । न तर्हि ब्रह्मणः साध्यत्वम् । प्रपंचनिवृत्तिरेकविधि विषय इति चेत्, न-तस्याः फलत्वेन विधिविषयत्वायोगात् । प्रपंचनिवृत्तिरेव हि मोक्षः । स च फलम् । अस्य च नियोगविषयत्वे नियोगात् प्रपंच- निवृत्तिः प्रपंचनिवृत्त्या नियोगः इतीतरेतराश्रयत्वम् । यहाँ नियोग का विषय है कौन ? ब्रह्म को नियोग का विषय कहना असंगत होगा, क्यों कि-ब्रह्म नित्य है इसलिए वह भव्य अर्थात् क्रिया संपाद्य नहीं हो सकता । निष्प्रपंचीकरण रूप नियोग का विषय यदि ब्रह्म हो जायगा तो उसमें अभावात्मकता होगी; यदि ब्रह्म के निष्प्रपंचभाव को ही साध्य मानते हो तो, वह साध्य होकर फलमात्र ही रहेगा, अभावात्मक होने के कारण, विधिका विषय तो हो नहीं सकेगा । फिर यहाँ साध्यता है किसकी ? ब्रह्म की या प्रपंचनिवृत्ति की ब्रह्म की तो हो नहीं सकती, क्यों कि वह तो नित्य सिद्ध है, साध्य मानने से वह अनित्य हो जावेगा । प्रपंचनिवृत्ति की साध्यता होने पर फिर ब्रह्म की तो साध्यता हो नहीं सकती । प्रपंच निवृत्ति को ही विधि का विषय नहीं कह सकते, क्यों कि-उसे विधि का फल बतलाया गया है, इसलिए वह विधि का विषय नहीं हो सकता । प्रपंच की निवृत्ति ही मोक्ष है, और वही फल है । मोक्ष नामक फल को विधि का विषय बतलाने से अन्योन्याश्रय दोष होगा, अर्थात् नियोग जैसे प्रपंच निवृत्ति ankurnagpal108@gmail.com

( २५६ ) का कारण है, उसी प्रकार प्रपंचनिवृत्ति भी नियोग का कारण हो जायगा । अपि च-किं निवर्त्तनीयः प्रपंचो मिथ्या रूपो सत्यो वा ? मिथ्यारूपत्वे ज्ञाननिवर्त्यत्वादेव नियोगेन न किंचित् प्रयोजनम् । नियोगस्तु निवर्त्तकज्ञानमुत्पाद्यतद् द्वारेण प्रपंचस्य निवर्त्तक इति चेत् तत् स्ववाक्यादेव जातमिति नियोगेन न प्रयोजनम् । वाक्यार्थ- ज्ञानादेव ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यकृत्स्नस्यमिथ्याभूतस्यप्रपंचस्य बाधित- त्वात् सपरिकरस्य नियोगस्यासिद्धिश्च । प्रपंचस्य निवर्त्यत्वे प्रपंच- निवर्त्तको नियोगः किं ब्रह्मस्वरूपमेव उत् तद्व्यतिरिक्तः ? यदि ब्रह्मस्वरूपमेव निवर्त्तकस्य नित्यतया निवर्त्यप्रपंच सद्भाव एव न संभवति । नित्यत्वे न नियोगस्य विषयानुष्ठान साध्यत्वं च न घटते । अथ ब्रह्मस्वरूप व्यतिरिक्तः तस्य कृत्स्न प्रपंचनिवृत्ति रूप- विषयानुष्ठान साध्यत्वेन प्रयोक्ता च नष्ट इत्याश्रयाभावादसिद्धिः : प्रपंचनिवृत्तिरूपविषयानुष्ठाने नैव ब्रह्मस्वरूप व्यतिरिक्तस्य कृत्स्नस्य निवृत्तत्वात् न नियोग निष्पाद्यं मोक्षाख्यंफलं । और भी एक बात विचारणीय है-निवर्त्तनीय प्रपंच मिथ्यारूप है अथवा सत्य ? यदि मिथ्या है तो उसकी ज्ञान से ही निवृत्ति हो सकती है, नियोग की कोई आवश्यकता ही नहीं है। यदि कहो कि-नियोग ही, निवर्त्तक ज्ञान को उत्पन्न करके, उसके द्वारा प्रपंच की निवृत्ति कराने वाला निवर्त्तक है, तो श्रुति के वाक्य से ही जब ज्ञानोत्पत्ति हो जाती है तो नियोग की आवश्यकता ही क्या है ? वाक्यार्थ ज्ञान से ही जब, ब्रह्म से भिन्न, मिथ्यारूप सारा प्रपंचमय जगत बाध्य है तो नियोग और नियोगांग सभी व्यर्थ हैं । यदि नियोग को प्रपंच निवर्त्तक मान भी लें, तो उस प्रपंच निवर्त्तक नियोग का स्वरूप क्या होगा ? वह ब्रह्म स्वरूप है अथवा कोई भिन्न वस्तु है ? यदि ब्रह्म स्वरूप है तो, ब्रह्म की नित्यता से निवर्त्य प्रपंच भी नित्य हो जायगा तथा वह फिर प्रपंच तो ankurnagpal108@gmail.com

रहेगा नहीं । नियोग की नित्यता होने से विषयानुष्ठान (यागादि क्रिया) की साध्यता भी समाप्त हो जायगी । यदि ब्रह्म से भिन्न कोई वस्तु नियोग है तो उसकी संपूर्ण प्रपंचनिवृत्तिरूप विषयानुष्ठान साध्यता और प्रयोक्ता दोनों ही नष्ट हो जावेंगे तथा आश्रय के अभाव से वह स्वयं (नियोग) भी अस्तित्व हीन हो जायगा । प्रपंचनिवृत्ति रूप अनुष्ठात्व से ही, ब्रह्म भिन्न समस्त वस्तुओ की निवृत्ति हो जायगी, फिर नियोग निष्पाद्य, मोक्ष नामक फल भी न होगा । किं च प्रपंचनिवृत्ते नियोगकरणस्य इति-कर्त्तव्यताऽभावात् अनुपकृतस्य च करणत्वऽयोगान्न करणत्वं । कथं इतिकर्त्तव्यता अभाव इति चेत् , इत्थम अस्येति कर्त्तव्यता भावरूपा अभावरूपा वा ? भावरूपा च करणशरीरनिष्पत्तितदनुग्रहकार्यं भेदभिन्ना । उभयविधा च न संभवति । न हि मुद्गरादि घातादिवत् कृत्स्नस्य प्रपंचस्य निवर्त्तकः कोऽपि दृश्यत इति दृष्टार्था न संभवति । नापि निष्पन्नस्य करणस्य कार्योत्पत्तावनुग्रहः संभवति । अनुग्राह- कांश सद्भावेन कृत्स्नप्रपंचनिवृत्ति रूपकरण स्वरूपासिद्धेः । ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वज्ञानं प्रपंचनिवृत्ति रूपकरण शरीरं निष्पादयतीति चेत् तेनैव प्रपंचनिवृत्तिरूपो मोक्षः सिद्ध इति न करणादि निष्पाद्यम्, अवशिष्यत इति पूर्वमेवोक्तम् । अभावरूपत्वे चाभावा- देव न करणशरीरं निष्पादयति । नाऽप्यनुग्राहकः श्रतो निष्प्रपंच ब्रह्मविषयो विधिर्न संभवति । नियोग की करण रूप प्रपंचनिवृत्ति की इति कर्त्तव्यता के अभाव से उसके अनुकर्त्ता करणता का भी अभाव हो जाने से, करणता ही समाप्त हो जाती है (इसलिए प्रपंचनिवृत्ति कभी नियोग का करण नहीं हो सकती) यदि कहें कि-इति कर्त्तव्यता का अभाव कैसे हो सकता है ? तो सुनिये—इतिकर्त्तव्यता भावरूप या अभावरूप होती है । भावरूप वह दो प्रकार की होगी, एक करण शरीर स्वरूप निष्पादक, दूसरी करण की अनुग्राहक (उपकारी) सो, यहाँ दोनों प्रकार की नहीं हो

( २६१ )

सकती। तण्डुल निष्पादक मुद्गर (मुसल) आदि के आघात की तरह, संपूर्ण प्रपंच का निवर्त्तक ऐसा कोई नहीं दीखता, जिससे उसकी निवृत्ति हो सके, इसलिए दृष्टार्थ इति कर्त्तव्यता तो संभव है, नहीं और न, निष्पन्न करण का कर्म योग्यता संपादक अनुग्रह ही संभव है। केवल अनुग्राहक अंश से ही निखिल जगत की प्रपंच की करणता हो सके ऐसा संभव नहीं है। यदि कहें कि-ब्रह्म का अद्वैत रूप ज्ञान ही प्रपंचनिवृत्ति रूप करण शरीर का निष्पादन कर सकता है। जब उसी से प्रपंच निवृत्ति रूप मोक्ष हो सकता है तो, करण निष्पाद्य, कुछ भी शेष नहीं रह जाता, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। यदि इति कर्त्तव्यता अभावरूप है तो वह अस्तित्वहीन होने से, न करण के शरीर का निष्पादन कर सकती है, न अनुग्रह ही। इससे स्पष्ट होता है कि-ब्रह्म के निष्प्रपंचीकरण की विधि संभव नहीं है। अन्योऽप्याह-यद्यपि वेदांतवाक्यानां न परिनिष्पन्न ब्रह्म स्वरूपपरतया प्रामाण्यम्, तथापि ब्रह्मस्वरूपं सिद्धत्येव। कुतः ? ध्यानाविधिसामर्थ्यात् । एवमेव हि समामनन्ति । “ आत्मा वाऽरेद्रष्टव्यः 'निदिध्यासितव्यः-"यः आत्मा अपहतपाप्मा सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्य"-"आत्मेत्येवोपासीत्"-"आत्मान- मेव लोकमुपासीत् “इति। अथ ध्यानविषयो हि नियोगः स्वविषय भूतध्यानं ध्येयैकनिरूपणीयम्-इति ध्येयमाक्षिपति । स च ध्येयः स्ववाक्य निर्दिष्ट आत्मा। स किं रूप इत्यपेक्षायां तत् स्वरूपविशेषसमर्पणद्वारेण “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" सदैव सोम्येद्- मग्र आसीत्"इत्येवमादीनां वाक्यानां ध्यानविधिशेषतया प्रामाण्यम्- इति विधिविषयभूतध्यानशरीरानुप्रविष्ट ब्रह्म स्वरूपे अपि तात्पर्यमस्त्येव । “अतः एकमेवाद्वितीयम् ” 'तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतोः “नेह नानास्ति-किंचन”इत्यादिभि- र्ब्रह्मस्वरूपमेकमेव सत्यं तद्व्यतिरिक्तं सर्वं मिथ्येत्येवंगम्यते । प्रत्यक्षादिभिर्भेंदावलंबिना च कर्म शास्त्रेण भेदः प्रतीयते ।

( २६२ ) भेदाभेदयोः परस्परविरोधे सत्यनाद्यविद्यामूलत्वेनापि भेद प्रतीत्युपपत्तेरभेद एव परमार्थ इति निश्चीयते। तत्र ब्रह्म- ध्याननियोगेन तत्साक्षात्कारफलेन निरस्तसमस्ताविद्याकृत विविधभेदाद्वितीयज्ञानैकरसब्रह्मरूप मोक्षः प्राप्यते। एक बात और भी है यद्यपि वेदांत वाक्यों की परिनिष्पन्न सिद्धवस्तु परब्रह्म के स्वरूप निर्धारण में प्रमाणिक नहीं है फिर भी ध्यानविधि के सामर्थ्य से ब्रह्म का स्वरूप तो प्रामाणित होता ही है। ऐसा श्रुति प्रमाण भी है -"अरे! आत्मा द्रष्टव्य और ध्येय है' "जो निष्पाप है वह अन्वेषणीय है "वही विशेष रूप से जिज्ञास्य है "आत्मा का अस्तित्व स्वीकार कर उपासना करनी चाहिए "इत्यादि। यहाँ ध्यान के विषय में नियोग (विधि) है। नियोग का विषय रूप ध्यान कार्य, ध्येय सापेक्ष है। अर्थात् ध्येय के जाने बिना ध्यान हो नहीं सकता, इस प्रकार नियोग ही ध्येय वस्तु का अस्तित्व ज्ञापन करती है। स्व- पद वाच्य आत्मा ही ध्येय है,वह कैसा है? ऐसी आकांक्षा होने पर"ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनंत स्वरूप है 'हे सौम्य ! यह जगत एक अद्वितीय सत् ही था "इत्यादि वाक्य आकांक्षित आत्मा के स्वरूप का प्रकाशन करके ध्यान विधि के अंग रूप से प्रमाणित होते हैं। इस प्रकार विधि के विषय रूप ध्यान से संश्लिष्ट ब्रह्म का स्वरूप भी,उक्त वाक्य का तात्पर्य है, ऐसा स्वीकारना होगा। "एक अद्वितीय ही निश्चित है" जो सत्य वही आत्मा है "जगत में कोई भिन्नता नहीं है" इत्यादि वाक्यों से एकमात्र ब्रह्म का स्वरूप ही सत्य ज्ञात होता है। प्रत्यक्ष आदि भेदावलम्बी प्रमाणों और कर्मशास्त्र से भेद की प्रतीति होती है। यद्यपि इस प्रकार भेद और अभेद दो परस्पर विरुद्ध बातें हैं,पर भेद प्रतीति को अनादि अविद्यामूलक मान लेने से विरोध का परिहार हो जाता है तथा अभेद प्रतीत ही परमार्थ रूप पर निश्चित होती है और फिर,ब्रह्म साक्षात् रूप फल वाले,ब्रह्म ध्यान नियोग (विधि) से अविद्याकृत सारे भेद समाप्त हो जाते हैं एवं अद्वितीय ज्ञानैकस्वभावब्रह्मस्वरूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है। न च वाक्यात् वाक्यार्थज्ञानमात्रेण ब्रह्म भावसिद्धिः

( २६३ ) अनुपलब्धेः विविधभेददर्शनानुवृत्तेश्च । तथा च सति श्रवणादि विधानमनर्थकं स्यात् । वाक्य या वाक्यार्थ ज्ञान मात्र से, ब्रह्म भाव की सिद्धि नही हो सकती ऐसा कहीं देखा भी नहीं जाता बड़े बड़े वाक्यार्थ ज्ञानियों में भी भेद दर्शन की अनुवृत्ति बनी ही रहती है । यदि वाक्यार्थ ज्ञान मात्र से ब्रह्म भाव की सिद्धि संभव भी हो जाय तो श्रवण, मनन आदि शास्त्रीय विधि व्यर्थ हो जायेंगी । अथोच्येत—"रज्जुरेषा न सर्पः” इत्युपदेशेन सर्पभयनिवृत्ति दर्शनात् रज्जुसर्पवत् बन्धस्य च मिथ्यारूपत्वेन ज्ञानबाध्यतया तस्य वाक्यजन्यज्ञानेनैव निवृत्तिर्युक्ता, न नियोगेन । नियोग साध्यत्वे मोक्षस्यानित्यत्वं स्यात् स्वर्गादिवत् । मोक्षस्य नित्यत्वं हि सर्ववादि संप्रतिपन्नम् । किं च—धर्माधर्मयोः फलहेतुत्वं स्वफलानुभवानुगुण शरीरोत्पादनद्वारेणेति ब्रह्मादिस्थावरान्तचतुर्विधशरीरसंबन्धरूप संसार फलत्वमवर्जनीयम् । तस्मान्नधर्मसाध्यो मोक्षः । तथा च श्रुतिः—"स ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति अशरीरं वा वसंतं न प्रियाप्रियेस्पृशतः ।” इति, अशरीरत्वरूपे मोक्षे धर्माधर्मसाध्यप्रियाप्रियविरहश्रवणात्, न धर्मसाध्यमशरीरत्वमिति विज्ञायते । न च नियोगविशेष साध्यफल विशेषवत् ध्याननियोग साध्यमशरीरत्वम्, अशरीरत्वस्य स्वरूपत्वेनासाध्यत्वात् । यथाहूः श्रुतयः—"अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्, महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति” अप्राणोह्यमनाश्शुभ्रः”, असंगोह्ययं पुरुषः” इत्याद्याः । अतोऽशरीरत्वरूपो मोक्षो नित्य इति न धर्मसाध्यः । तथा च श्रुतिः “अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् अन्यत्र भूताद्भव्याच्च यत्तत्पश्यतितद्वद” इति । इस पर कहते हैं “यह रस्सी है सर्प नहीं” इस उपदेश से सर्प भयनिवृत्ति देखी जाती है । रज्जुसर्प की तरह बंधन जब मिथ्या है तथा ankurnagpal108@gmail.com

( २६४ ) मिथ्या होने से ही वह ज्ञान द्वारा निवार्य है, तो वाक्यार्थज्ञान से ही भेद बुद्धि का निवारण हो जायगा, नियोग (विधि) की आवश्यकता तो समझ में आती नहीं। मोक्ष को यदि नियोग साध्य मानेंगे तो स्वर्गादि की तरह उसकी अनित्यता भी स्वीकारनी पड़ेगी, जबकि मोक्ष की नित्यता सभी लोग मानते हैं। तथा जब, धर्म और अधर्म, अपने फलभोग के उपयुक्त शरीरो- त्पादक होने से ही फल के हेतु कहे जाते हैं। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त चारों प्रकार के शरीरों से संबंधित संसार की प्राप्ति अवश्यंभावी हो जावेगे इसलिए मोक्ष को धर्म साध्य नहीं मान सकते। ऐसा ही श्रुति का प्रमाण भी है—"शरीरधारी उसके प्रिय और अप्रिय (सुख और दुःख) निवृत्त नहीं होते, शरीर रहित होने पर प्रिय अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते” इस प्रकार शरीर रहित मोक्ष में, धर्म-अधर्म से साध्य प्रियअप्रिय की हीनता कही गई है। इससे ज्ञात होता है कि--मोक्ष वस्तु धर्म साध्य नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि—नियोग (विधि विशेष) साध्यफल विशेष की तरह, ध्यान नियोग से, अशरीरता साध्य हो सके। अशरीरता ही तो आत्मा का वास्तविक स्वरूप है, इसलिए वह किसी भी प्रकार साध्य नहीं हो सकता। जैसा कि—श्रुतियाँ कहती हैं—"स्वभाव से-अशरीर, अनवस्थित (क्षणभंगुर) शरीरों में स्थित, महान और विभु आत्मा का मनन करके धीर व्यक्ति, शोक नहीं करते”—आत्मा, प्राण और मन रहित समुज्वल है “यह आत्मा अनासक्त है, इत्यादि। इस प्रकार अश- रीरतारूप मोक्ष नित्य है, इसलिए धर्मसाध्य नहीं हो सकता। वैसा ही श्रुतिवाक्य भी है—"धर्म से पृथक् अधर्म से पृथक्, भूत-भविष्य-वर्तमान घटित पदार्थों से पृथक्, कृतकार्य से पृथक् अकृत से पृथक् जिस वस्तु को आप जानते हों उसे बतलावें।" अपि च—उत्पत्तिप्राप्तिविकृतिसंस्कृतिरूपेण चतुर्विधं हि साध्यत्वं मोक्षस्य न संभवति । न तावदुत्पाद्यः, मोक्षस्य ब्रह्म स्वरूपत्वेन नित्यत्वात् । नापि प्राप्यः आत्मस्वरूपत्वेन ब्रह्मणो नित्य प्राप्तत्वात् । नापि विकार्यः दध्यादिवदनित्यत्वप्रसंगादेव । नापि संस्कार्यः संस्कारो हि दोषापनयनेन वा गुणाधानेन वा ankurnagpal108@gmail.com

( २६५ ) साधयति । न तावत् दोषापनयनेन वा नित्यशुद्धत्वाद् ब्रह्मणः । नाप्यतिशयाधानेन अनाधेयातिशय स्वरूपत्वात् । नित्यनिर्विकारत्वेन स्वाश्रयायाः पराश्रयायाश्च क्रियाया अविषयतया न निघर्षेणेनादर्शा दिवत् संस्कार्यत्वम् । न च देहस्थया स्नानादि क्रियया आत्मा संस्क्रियते । किंतु अविद्यागृहीतः तत्संगतोऽहंकर्त्ता, तत्फलानुभवोऽपि तस्यैव । न चाहंकृत्तैवात्मा तत्साक्षित्वात् । तथा च मंत्रवर्णाँ “तयोरन्यं पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति इति ।” आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः “एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा कर्माध्यक्षः सर्वभूतादिवासः साक्षी चेता केवलोगिर्गुणश्च” संपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रह्मणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्” इति च । अविद्यागृहीतादहंकर्तु ु रात्मस्वरूपमनाधे यातिशयम् नित्यशुद्धं निर्विकारं निष्कृष्येत । तस्मादात्मस्वरूपत्वेन न साध्योमोक्षः । उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति रूप चार प्रकार की साध्यता भी मोक्ष की नहीं हो सकती । मोक्ष की उत्पत्ति तो इसलिए संभव नहीं है कि-वह ब्रह्मस्वरूप होने से नित्य है । उसे प्राप्य इसलिए नहीं कह सकते कि--ब्रह्म स्वरूप होने से नित्य प्राप्त है । उसकी विकृति भी संभव नहीं है, विकृति मानने से वह दही आदि की तरह अनित्य हो जायगा । वह संस्कार्य भी नहीं है; संस्कार दोषों का परिमार्जन कर गुणों का संस्थापन करता है । नित्य शुद्ध ब्रह्म में दोषों के परिमार्जन की बात नितांत असंगत है । ब्रह्म, स्वरूपतः ही अतिशय गुणों वाले हैं इसलिए गुणाधान रूप संस्कार की बात भी उनमें लागू नहीं होती । नित्य निर्विकार होने से, स्वाश्रित या पराश्रित क्रियाओं के अविषय होने के कारण, दर्पण के घर्षण के समान संस्कार का रूप भी नहीं हो सकता । परमात्मा अशरीरी है, इसलिए स्नान आचमन आदि रूप संस्कार भी असंभव है । अविद्या के कारण, देह संश्लिष्ट अहंकार करने वाला, कर्त्ता ही संस्कृत होता है, संस्कार के फलस्वरूप वही फलोपभोग भी करता है ।

( २६६ ) अहंकार करने वाला स्वाभाविक आत्मा नही है, वह तो साक्षी मात्र है, जैसा कि मंत्रवर्णों से ज्ञात होता है—"एक पिप्पल का आस्वाद करता है दूसरा देखता मात्र है।" मनीषी लोग, देह, इन्द्रिय, मन युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं।" एक ही देव, समस्त भूतों के अन्दर छिपे हुए हैं, वे सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी, जीवकर्मों के परिचालक सब भूतों में निवास करने वाले साक्षी, चेतन और निराकार हैं।" शुक्ल ( उज्वल अविद्या वासना ) रहित, अकाय ( सूक्ष्म शरीर रहित ) अव्रण ( अज्ञानरूप कारण शरीर रहित ) अस्नाविर ( स्नायु शून्य स्थूल शरीर रहित ) काम्यकर्म आदि दोष शून्य, निष्पाप परमात्मा हर जगह व्याप्त हैं। 'इत्यादि वाक्यों में अविद्या रहित, अहंकारी आत्मा के स्वरूप से पृथक् अतिशय गुणवाले नित्य शुद्ध निर्विकार परमात्मा का निर्देश किया गया है। इसलिए आत्म स्वरूपी मोक्ष साध्य तत्व नहीं है ( अपितु स्वयं सिद्ध है।) यद्येवं किंवाक्यार्थज्ञानेन क्रियत इति ? चेत्, मोक्ष प्रतिबन्ध निमित्तमात्रमिति ब्रूमः । तथा च श्रुतयः—"त्वं हि नः पितायोस्माक- मविद्यायाः परंपारंतारयसि” श्रुतं ह्येवमेव भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहंभगवः शोचामि तं मा भगवान् शोकस्य पारंतारयतु"—तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारंदर्शयति भगवान् सनत्कुमारः" इत्याद्याः । तस्मान्नित्यस्यैव मोक्षस्य प्रतिबंधनिवृत्ति- र्वाक्यार्थज्ञानेन क्रियते । निवृत्तिस्तु साध्याऽपि प्रध्वंसाभावरूपा न विनश्यति । "ब्रह्मवेद ब्रह्मैवभवति" "तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति" इत्यादि वचनं मोक्षस्य वेदनानन्तरभावितां प्रतिपादयन् नियोग व्यवधानं प्रतिरुणद्धि । न विदिक्रिया कर्मत्वेन वा ध्यानक्रियाकर्मत्वेन वा कार्यानुप्रवेशः उभयविधिकर्मत्वप्रतिषेधात् "अन्यदेव तद्विदिता- दथो अविदितादपि” येनेदं सर्वं विजानाति तत्केन विजानीयात् “इति । “तदेव ब्रह्मत्वं विद्धिनेदं यदिदमुपासते" इति च । यदि कहो कि—मोक्ष स्वतः सिद्ध है तो, "तत्त्वमसि" आदि

वाक्यार्थ ज्ञान से फिर क्या होता है ? इसका उत्तर स्पष्ट है; वाक्यार्थ ज्ञान, मोक्ष प्रतिबन्धक अज्ञान की निवृत्ति मात्र करता है। जैसी कि श्रुति भी है—"आप हमारे पिता हैं, निश्चित आप हमें विद्या द्वारा पार उतार सकते हैं"—"आप ऐसे लोगों से ही मैंने सुना है कि—आत्मवेत्ता शोक से मुक्त हो जाता है"—"भगवन् ! मैं बड़ा शोकाकुल हूं, कृपया मुझे शोक से मुक्त करिये" "भगवान् सनत्कुमार ऋषि ने भोगवासना रहित उन नारद को अज्ञान से पार मायातीत आत्मस्वरूप ) का दर्शन कराया" इत्यादि। इससे ज्ञात होता है कि—वाक्यार्थ ज्ञान, नित्यसिद्ध मोक्ष के प्रतिबन्धक अज्ञान की निवृत्ति मात्र करता है। निवृत्ति, साध्य होते हुए भी प्रध्वंसाभाव रूपा होती है, नष्ट नहीं होती (उत्पत्ति शील भाव का ही विनाश होता है, अभाव के विनाश का प्रश्न ही उठता) "ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है"—"उसको जानकर अमर हो जाता है"—इत्यादि वाक्य, मोक्ष को, ज्ञान का अनन्तरभावी बतलाकर, नियोग व्यवधान का प्रत्याख्यान करते हैं ] अर्थात्—ज्ञान द्वारा ही

( २६८ ) अतएव न शरीरपातादूर्ध्वमेव बंधनिवृत्तिरिति वक्तुंयुक्तम्। नहि मिथ्यारूपसर्पभयनिवृत्तिः रज्जुयाथात्म्यज्ञानातिरेकेण सर्पविनाश- मपेक्षते। यदि शरीर संबंधः पारमार्थिकः तदा हि तद् विनाशापेक्षा। स तु ब्रह्मव्यतिरिक्ततया न पारमार्थिकः। यस्य तु बन्धो न निवृत्तः, तस्य ज्ञानमेव न जातमित्यवगम्यते, ज्ञानकार्यादर्शनात्। तस्मात् शरीरस्थितिर्भवतु वा, मा वा, वाक्यार्थज्ञानसमनन्तरं मुक्त एवासौ। अतो न ध्याननियोग साध्यो मोक्ष इति न ध्यानविधि- शेषतया ब्रह्मणस्सिद्धिः। अपितु-"सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म"-तत्त्व- मसि”-“अयमात्माब्रह्म" इति तत्परेणैव पदसमुदायेन सिध्यतीति। ब्रह्म की इयत्ता ( सीमा ) बोधक वाक्यों की निर्विषयता भी नहीं हो सकती, क्योंकि-अविद्या कल्पित भेद की निवृत्ति ही शास्त्र का तात्पर्य होता है। शास्त्र, कभी ब्रह्म को, प्रत्यक्ष वस्तु की तरह "इदं" भी नहीं कहते, अपितु वे, अविषय जीवात्मा स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए, अविद्या कल्पित, ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय-के विभाग का निवारण कर देते हैं—जैसे कि—"दृष्टि के दृष्टा का दर्शन मत करो" इत्यादि। ज्ञान के द्वारा बन्धन निवृत्ति होने से, श्रवण, मनन आदि विधि व्यर्थ हो जायगी, यह कथन भी ठीक नहीं। ब्रह्म से अतिरिक्त विषयों में जीवों की जो स्वाभाविक विकल्प बुद्धि होती है, उसी की निवृत्ति के लिए, श्रवण, मनन आदि का विधान है। यह भी नहीं कह सकते कि- ज्ञानमात्र से बंधन मुक्ति नहीं देखी जाती। बंधन मिथ्या वस्तु है, ज्ञानोदय के बाद उसकी स्थिति कदापि संभव नहीं है। सर्पबुद्धि के विनाश में रज्जु का यथार्थ ज्ञान ही अपेक्षित है, मिथ्या सर्पभय की निवृत्ति, रज्जु के यथार्थ ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य से संभव नहीं है। यदि शरीर के साथ आत्मा का पारमार्थिक संबंध होता, तो निश्चित उस संबंध का विनाश अपेक्षित होता, वह परब्रह्म से अतिरिक्त है, इसलिए पारमार्थिक नहीं हो सकता। जिसका बंधन मुक्त नहीं हुआ, उसे ज्ञान नहीं हुआ, ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि—उसमें, ज्ञान के कार्य मुक्ति का अभाव है। शरीर रहे या न रहे, वाक्यार्थ ज्ञान के बाद ही व्यक्ति मुक्त

( २६६ ) हो जाता है। इसलिए मोक्ष, ध्यान नियोग साध्य नहीं है। ध्यान विधि के वर्णन से ब्रह्म प्रमाणित भी नहीं होता। अपितु--“ब्रह्म सत्यज्ञान और अनंतरूप है”--“तू वही है”--“यह आत्मा ब्रह्म है” इत्यादि तत् परक पदों से ही उसकी सिद्धि होती है । तदयुक्तम्—वाक्यार्थज्ञानमात्रात् बंधनिवृत्त्यनुपपत्तेः । यद्यपि मिथ्यारूपोऽपिबन्धो ज्ञानबाध्यः, तथापि बंधस्यापरोक्षत्वात् न परोक्ष- रूपेण वाक्यार्थज्ञानेन स बाध्यते, रज्वादावपरोक्षसर्पप्रतीतौ वर्तमानायां “नायं सर्पोरज्जुरेषा” इत्याप्तोपदेशजनितपरोक्ष सर्प विपरीत ज्ञानमात्रेण भयान्निवृत्तिदर्शनात् । आप्तोपदेशस्तु भयनिवृत्तिहेतुवस्तुयाथात्म्यापरोक्षनिमित्तप्रवृत्ति हेतुत्वेन । तथाहि रज्जुसर्पदर्शनभयात् परावृत्तोपुरुषो “नायं सर्पोरज्जुरेषा” इत्याप्तोपदेशेन तद्वस्तुयाथात्म्यदर्शने प्रवृत्तस्तदेव प्रत्यक्षेण दृष्ट्वा भयान्निवर्तते । न च शब्दएव प्रत्यक्षज्ञानंजनयतीति वक्तुंयुक्तम्, तस्यानिन्द्रियत्वात् । ज्ञानसामग्रीष्विन्द्रियाण्येव ह्यपरोक्षसाधनानि । न चास्यानभिसंहितफलकर्मानुष्ठानमृदितकषायस्यश्रवणमनन- निदिध्यासनविमुखीकृतानवाह्यविषयस्य पुरुषस्यवाक्यमेवापरोक्षज्ञानं जनयति, निवृत्तप्रतिबन्धेतत्परेऽपि पुरुषे ज्ञानसामग्रीविशेषाणामि- न्द्रियादीनां स्वविषयनियमातिक्रमादर्शनेनतदयोगात् । उपर्युक्त सब कुछ असंगत है—वाक्यार्थ ज्ञान मात्र से बंधनमुक्ति नितान्त असंभव है । यद्यपि मिथ्या रूप बंधन ज्ञान बाध्य है, फिर भी बंधन अपरोक्ष है, परोक्ष रूप वाक्यार्थ ज्ञान से वह निवार्य नहीं है । रज्जु आदि में प्रत्यक्ष सर्पभय होता है ।” यह सर्प नहीं रज्जु है” ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति के कथन मात्र से भय की निवृत्ति नही देखी जाती, क्योंकि—भीत व्यक्ति के समक्ष तो, सर्प की ही प्रवृत्ति रहती है, उक्त आप्तवाक्य तो, अप्रत्यक्ष सर्प विपरीत ज्ञान मात्र ही है। आप्तोपदेश— भयन्निवृति हेतुता, वस्तु के यथार्थ प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित रहती है, जैसे कि रज्जु को सर्प मानकर भयभीत पीछे हटा हुआ व्यक्ति “यह सर्प