श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६६ ) अहंकार करने वाला स्वाभाविक आत्मा नही है, वह तो साक्षी मात्र है, जैसा कि मंत्रवर्णों से ज्ञात होता है—"एक पिप्पल का आस्वाद करता है दूसरा देखता मात्र है।" मनीषी लोग, देह, इन्द्रिय, मन युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं।" एक ही देव, समस्त भूतों के अन्दर छिपे हुए हैं, वे सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी, जीवकर्मों के परिचालक सब भूतों में निवास करने वाले साक्षी, चेतन और निराकार हैं।" शुक्ल ( उज्वल अविद्या वासना ) रहित, अकाय ( सूक्ष्म शरीर रहित ) अव्रण ( अज्ञानरूप कारण शरीर रहित ) अस्नाविर ( स्नायु शून्य स्थूल शरीर रहित ) काम्यकर्म आदि दोष शून्य, निष्पाप परमात्मा हर जगह व्याप्त हैं। 'इत्यादि वाक्यों में अविद्या रहित, अहंकारी आत्मा के स्वरूप से पृथक् अतिशय गुणवाले नित्य शुद्ध निर्विकार परमात्मा का निर्देश किया गया है। इसलिए आत्म स्वरूपी मोक्ष साध्य तत्व नहीं है ( अपितु स्वयं सिद्ध है।) यद्येवं किंवाक्यार्थज्ञानेन क्रियत इति ? चेत्, मोक्ष प्रतिबन्ध निमित्तमात्रमिति ब्रूमः । तथा च श्रुतयः—"त्वं हि नः पितायोस्माक- मविद्यायाः परंपारंतारयसि” श्रुतं ह्येवमेव भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहंभगवः शोचामि तं मा भगवान् शोकस्य पारंतारयतु"—तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारंदर्शयति भगवान् सनत्कुमारः" इत्याद्याः । तस्मान्नित्यस्यैव मोक्षस्य प्रतिबंधनिवृत्ति- र्वाक्यार्थज्ञानेन क्रियते । निवृत्तिस्तु साध्याऽपि प्रध्वंसाभावरूपा न विनश्यति । "ब्रह्मवेद ब्रह्मैवभवति" "तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति" इत्यादि वचनं मोक्षस्य वेदनानन्तरभावितां प्रतिपादयन् नियोग व्यवधानं प्रतिरुणद्धि । न विदिक्रिया कर्मत्वेन वा ध्यानक्रियाकर्मत्वेन वा कार्यानुप्रवेशः उभयविधिकर्मत्वप्रतिषेधात् "अन्यदेव तद्विदिता- दथो अविदितादपि” येनेदं सर्वं विजानाति तत्केन विजानीयात् “इति । “तदेव ब्रह्मत्वं विद्धिनेदं यदिदमुपासते" इति च । यदि कहो कि—मोक्ष स्वतः सिद्ध है तो, "तत्त्वमसि" आदि