श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाक्यार्थ ज्ञान से फिर क्या होता है ? इसका उत्तर स्पष्ट है; वाक्यार्थ ज्ञान, मोक्ष प्रतिबन्धक अज्ञान की निवृत्ति मात्र करता है। जैसी कि श्रुति भी है—"आप हमारे पिता हैं, निश्चित आप हमें विद्या द्वारा पार उतार सकते हैं"—"आप ऐसे लोगों से ही मैंने सुना है कि—आत्मवेत्ता शोक से मुक्त हो जाता है"—"भगवन् ! मैं बड़ा शोकाकुल हूं, कृपया मुझे शोक से मुक्त करिये" "भगवान् सनत्कुमार ऋषि ने भोगवासना रहित उन नारद को अज्ञान से पार मायातीत आत्मस्वरूप ) का दर्शन कराया" इत्यादि। इससे ज्ञात होता है कि—वाक्यार्थ ज्ञान, नित्यसिद्ध मोक्ष के प्रतिबन्धक अज्ञान की निवृत्ति मात्र करता है। निवृत्ति, साध्य होते हुए भी प्रध्वंसाभाव रूपा होती है, नष्ट नहीं होती (उत्पत्ति शील भाव का ही विनाश होता है, अभाव के विनाश का प्रश्न ही उठता) "ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है"—"उसको जानकर अमर हो जाता है"—इत्यादि वाक्य, मोक्ष को, ज्ञान का अनन्तरभावी बतलाकर, नियोग व्यवधान का प्रत्याख्यान करते हैं ] अर्थात्—ज्ञान द्वारा ही