भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २६८ ) अतएव न शरीरपातादूर्ध्वमेव बंधनिवृत्तिरिति वक्तुंयुक्तम्। नहि मिथ्यारूपसर्पभयनिवृत्तिः रज्जुयाथात्म्यज्ञानातिरेकेण सर्पविनाश- मपेक्षते। यदि शरीर संबंधः पारमार्थिकः तदा हि तद् विनाशापेक्षा। स तु ब्रह्मव्यतिरिक्ततया न पारमार्थिकः। यस्य तु बन्धो न निवृत्तः, तस्य ज्ञानमेव न जातमित्यवगम्यते, ज्ञानकार्यादर्शनात्। तस्मात् शरीरस्थितिर्भवतु वा, मा वा, वाक्यार्थज्ञानसमनन्तरं मुक्त एवासौ। अतो न ध्याननियोग साध्यो मोक्ष इति न ध्यानविधि- शेषतया ब्रह्मणस्सिद्धिः। अपितु-"सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म"-तत्त्व- मसि”-“अयमात्माब्रह्म" इति तत्परेणैव पदसमुदायेन सिध्यतीति। ब्रह्म की इयत्ता ( सीमा ) बोधक वाक्यों की निर्विषयता भी नहीं हो सकती, क्योंकि-अविद्या कल्पित भेद की निवृत्ति ही शास्त्र का तात्पर्य होता है। शास्त्र, कभी ब्रह्म को, प्रत्यक्ष वस्तु की तरह "इदं" भी नहीं कहते, अपितु वे, अविषय जीवात्मा स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए, अविद्या कल्पित, ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय-के विभाग का निवारण कर देते हैं—जैसे कि—"दृष्टि के दृष्टा का दर्शन मत करो" इत्यादि। ज्ञान के द्वारा बन्धन निवृत्ति होने से, श्रवण, मनन आदि विधि व्यर्थ हो जायगी, यह कथन भी ठीक नहीं। ब्रह्म से अतिरिक्त विषयों में जीवों की जो स्वाभाविक विकल्प बुद्धि होती है, उसी की निवृत्ति के लिए, श्रवण, मनन आदि का विधान है। यह भी नहीं कह सकते कि- ज्ञानमात्र से बंधन मुक्ति नहीं देखी जाती। बंधन मिथ्या वस्तु है, ज्ञानोदय के बाद उसकी स्थिति कदापि संभव नहीं है। सर्पबुद्धि के विनाश में रज्जु का यथार्थ ज्ञान ही अपेक्षित है, मिथ्या सर्पभय की निवृत्ति, रज्जु के यथार्थ ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य से संभव नहीं है। यदि शरीर के साथ आत्मा का पारमार्थिक संबंध होता, तो निश्चित उस संबंध का विनाश अपेक्षित होता, वह परब्रह्म से अतिरिक्त है, इसलिए पारमार्थिक नहीं हो सकता। जिसका बंधन मुक्त नहीं हुआ, उसे ज्ञान नहीं हुआ, ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि—उसमें, ज्ञान के कार्य मुक्ति का अभाव है। शरीर रहे या न रहे, वाक्यार्थ ज्ञान के बाद ही व्यक्ति मुक्त