श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६६ ) हो जाता है। इसलिए मोक्ष, ध्यान नियोग साध्य नहीं है। ध्यान विधि के वर्णन से ब्रह्म प्रमाणित भी नहीं होता। अपितु--“ब्रह्म सत्यज्ञान और अनंतरूप है”--“तू वही है”--“यह आत्मा ब्रह्म है” इत्यादि तत् परक पदों से ही उसकी सिद्धि होती है । तदयुक्तम्—वाक्यार्थज्ञानमात्रात् बंधनिवृत्त्यनुपपत्तेः । यद्यपि मिथ्यारूपोऽपिबन्धो ज्ञानबाध्यः, तथापि बंधस्यापरोक्षत्वात् न परोक्ष- रूपेण वाक्यार्थज्ञानेन स बाध्यते, रज्वादावपरोक्षसर्पप्रतीतौ वर्तमानायां “नायं सर्पोरज्जुरेषा” इत्याप्तोपदेशजनितपरोक्ष सर्प विपरीत ज्ञानमात्रेण भयान्निवृत्तिदर्शनात् । आप्तोपदेशस्तु भयनिवृत्तिहेतुवस्तुयाथात्म्यापरोक्षनिमित्तप्रवृत्ति हेतुत्वेन । तथाहि रज्जुसर्पदर्शनभयात् परावृत्तोपुरुषो “नायं सर्पोरज्जुरेषा” इत्याप्तोपदेशेन तद्वस्तुयाथात्म्यदर्शने प्रवृत्तस्तदेव प्रत्यक्षेण दृष्ट्वा भयान्निवर्तते । न च शब्दएव प्रत्यक्षज्ञानंजनयतीति वक्तुंयुक्तम्, तस्यानिन्द्रियत्वात् । ज्ञानसामग्रीष्विन्द्रियाण्येव ह्यपरोक्षसाधनानि । न चास्यानभिसंहितफलकर्मानुष्ठानमृदितकषायस्यश्रवणमनन- निदिध्यासनविमुखीकृतानवाह्यविषयस्य पुरुषस्यवाक्यमेवापरोक्षज्ञानं जनयति, निवृत्तप्रतिबन्धेतत्परेऽपि पुरुषे ज्ञानसामग्रीविशेषाणामि- न्द्रियादीनां स्वविषयनियमातिक्रमादर्शनेनतदयोगात् । उपर्युक्त सब कुछ असंगत है—वाक्यार्थ ज्ञान मात्र से बंधनमुक्ति नितान्त असंभव है । यद्यपि मिथ्या रूप बंधन ज्ञान बाध्य है, फिर भी बंधन अपरोक्ष है, परोक्ष रूप वाक्यार्थ ज्ञान से वह निवार्य नहीं है । रज्जु आदि में प्रत्यक्ष सर्पभय होता है ।” यह सर्प नहीं रज्जु है” ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति के कथन मात्र से भय की निवृत्ति नही देखी जाती, क्योंकि—भीत व्यक्ति के समक्ष तो, सर्प की ही प्रवृत्ति रहती है, उक्त आप्तवाक्य तो, अप्रत्यक्ष सर्प विपरीत ज्ञान मात्र ही है। आप्तोपदेश— भयन्निवृति हेतुता, वस्तु के यथार्थ प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित रहती है, जैसे कि रज्जु को सर्प मानकर भयभीत पीछे हटा हुआ व्यक्ति “यह सर्प