भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २४६ ) सर्ववस्तुगतत्वे अनेककर्त्तृकत्वसाधनाद्विरुद्धता । अत्राप्येककर्त्तृक- त्वसाधने, प्रत्यक्षानुमानविरोधः शास्त्रविरोधश्च, "कुंभकारो जायते रथकारो जायते" इत्यादि श्रवणात् । सर्वज्ञ, सर्वशक्ति-समन्वित, किसी एक कर्त्ता की, साधक, समस्त वस्तुओं की एक साथ होने वाली कार्यता है ? अथवा समस्त वस्तुओं क्रमिक उत्पत्ति है ? समस्त वस्तुओं की एक साथ उत्पत्ति मानने से कार्यता की असिद्धि होती है तथा समस्त वस्तुओं की क्रमिक उत्पत्ति मानने से अनेक कर्तृत्व की सिद्धि होती है, जो कि साधन विरुद्ध है । यहाँ भी एक कर्तृत्व मानने से प्रत्यक्ष और अनुमान से विपरीतता और शास्त्र विपरीतता होती है--"कुंभकार होता है, रथकार होता है" ऐसा भिन्न-भिन्न कर्त्ताओं का ही वर्णन किया गया है । अपि च—सर्वेषां कार्याणां शरीरादीनां च सत्त्वादिगुणकार्य रूपसुखाद् यन्वयदर्शनेन सत्त्वादि मूलत्वमवश्याश्रयणीयम् । कार्य वैचित्र्यहेतुभूताः कारणगता विशेषाः सत्त्वादयः । तेषां कार्याणां तन्मूलत्वापादनं तद्युक्तपुरुषान्तः करणविकारद्वारेण । पुरुषस्य च तद्योगः कर्ममूल इति कार्यविशेषारम्भायैव, ज्ञानशक्तिवत्कर्त्तुः कर्म्मसंबन्धः । कार्य हेतुत्वेनैवावश्याश्रयणीयः, ज्ञानशक्ति वैचित्र्यस्य च कर्म्ममूलत्वात् । इच्छायाः कार्यारम्भहेतुत्वेऽपि विषयविशेषविशे- षितायास्तस्यास्सत्त्वादिमूलकत्वेन कर्मसंबंधोऽवर्जनीयः, अतः क्षेत्रज्ञा एव कर्त्तारः, न तद्विलक्षणः कश्चिदनुमानात् सिध्यति । देखा जाता है कि-शरीर आदि सारे कार्य, सत्त्व-रज और तमोगुण के परिणाम सुख आदि से, संबद्ध रहते हैं; इसलिए सत्त्व आदि को इनका मूल कारण मानना पड़ता है। कार्य वैचित्र्य के मूल कारण सत्त्वादि गुण ही, कारणगत विशेष धर्म हैं। सारे विचित्र कार्य सत्त्व आदि गुण मूलक ही होते हैं। सारे कार्य, सत्त्वादि गुणों से युक्त पुरुष के अन्तःकरण के विकारों के ही परिणाम होते हैं । पुरुषों का गुणों के