श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंंसकत्वादिति चेत्, न-मनसो नित्यत्वेन देहापगमेऽपि मनसःसद्भावे- नानैकान्त्यात् । अतो विचित्रावयवसन्निवेशविशेषतनुभुवनादि कार्यनिर्माणे पुण्यपापपरवशः परिमितशक्तिज्ञानः क्षेत्रज्ञो न प्रभवतीति, निखिलभुवननिर्माणचतुरोऽचिन्त्यापरिमित ज्ञान- शक्त्यैश्वर्योऽशरीरः संकल्पमात्रसाधनपरिनिष्पन्नानंतविस्तार विचित्ररचनप्रपंचः पुरुषविशेष ईश्वरोऽनुमानेनैव सिद्ध्यति । अतः प्रमाणान्तरावसेयत्वात् ब्रह्मणः नैतद् वाक्यं ब्रह्म प्रतिपाद- यति । किं च—अत्यंतभिन्नयोरेव मृद्द्रव्यकुलालयोः निमित्तो पादानत्वदर्शनेन, आकाशादेर्निरवयवद्रव्यस्य कार्यत्वानुपपत्या च नैकमेव ब्रह्म कृत्स्नस्य जगतो निमित्तमुपादानं च प्रतिवादयितुं शक्नोति इति । कुम्हार आदि अपने शरीर द्वारा ही, दंडचक्र आदि कार्योपकरणों का प्रयोग करते हैं; शरीर रहित ईश्वर, जगत के उपादान और उपकरण आदि का प्रेरक नहीं हो सकता ? ऐसा संशय भी नहीं करना चाहिए; प्रायः देखा जाता है कि-इच्छामात्र से ही, पर शरीरगत भूत वेताल आदि द्वारा, विष का विनाश हो जाता है। अशरीरी ईश्वर का पर प्रेरक रूप संकल्प हो कैसे सकता है ? ऐसी शंका भी निर्मूल है, क्योंकि-संकल्प में शरीर होना आवश्यक नहीं है, शरीर में संकल्प हेतुता है ही नहीं, केवल मन ही संकल्प का हेतु है। ईश्वर का मन भी स्वीकारना होगा, उनकी कार्यकारिता से ही ज्ञानशक्तिमान् मन की सत्ता अनुमित होती है। मानस संकल्प शरीर वाले को ही होता हो, शरीरी ही मनवाला हो सकता है, ऐसा भी नहीं कह सकते। मन नित्य पदार्थ है, देह के समाप्त हो जाने पर भी मन का अस्तित्व रहता है। मन शरीर संबद्ध होकर ही रहता हो ऐसा भी कोई नियम नहीं है। इससे निश्चित होता है कि- विचित्र अवयव सन्निवेश संपन्न शरीर और विश्व आदि के निर्माण में चतुर अचिन्त्य, अपरिमित, ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्यशाली, अशरीर, संकल्प- मात्र साधन से बनाने वाले अनंत विस्तृत जगत का रचयिता, पुरुष विशेष