भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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कुलालादिः क्रियमाणव्यतिरिक्तं किमपि न जानाति । नापि कतिपय विषयम्, सर्वेषु कर्तृ षु तत्तदज्ञानाशक्यनियमेन सर्वेषाम- ज्ञानादीनां व्यभिचारात् । अतः कार्यत्वस्यासाधकानामीश्वरत्वादीनां र्लिगिन्यप्राप्तिरिति न विपरीतसाधनत्वम् । कथन यह है कि-कोई किसी भी क्रियमाण कार्य की उत्पत्ति में, उसी कार्य से संबंधी, कर्त्ता के निर्माण सामर्थ्य, उपादान, उपकरण और उसके ज्ञान की अपेक्षा रहती है, अन्य विषयक सामर्थ्य या ज्ञान से कार्य नहीं चलता । कर्त्ता के कार्य निर्माण सामर्थ्य, उपादान और उपकरणों के ज्ञान से ही जब कार्य की उत्पत्ति सुसंपन्न हो जाती है तो, दिखावटी, बिना मतलब के अन्य विषयक ज्ञान आदि की कल्पना करना ही व्यर्थ है । क्रियमाणवस्तु से अतिरिक्त विषयों का ज्ञान, समस्त विषयों की क्रिया का उपयोगी होता है, या कुछ विषयों का ही उपयोगी होता है ? सर्व विषयक तो हो नहीं सकता; ऐसा तो है नहीं कि-कुंभकार आदि शिल्पी, क्रियमाण से भिन्न और कुछ जानते ही नहीं । कतिपय विषयक भी नहीं हो सकता—सभी कर्त्ताओं में उन्हीं उन्हीं विषयों में अज्ञान और अशक्ति होगी ही, ऐसा कोई नियम तो है नहीं; अज्ञानादि कार्योपयोगिता के संबंध में अनियम ही रहता है इस प्रकार कार्यता के असाधक, अनीश्वरता इत्यादि की, विचार्य विषय में प्राप्ति न होने से, उनकी विपरीत साधकता नहीं हो सकती । कुलालादीनां दण्डचक्राद्यधिष्ठानं शरीरद्वारेणैव दृष्टम् इति जगदुपादानोपकरणाधिष्ठानमीश्वरस्याशरीरस्याानुपपन्नमिति चेत्- न, संकल्पमात्रेणैव परशरीरगत भूतवेतालगरलाद्यपगमविनाश दर्शनात् । कथमशरीरस्य परप्रवर्त्तनरूपः संकल्प इति चेत्, न शरीरापेक्षः संकल्पः, शरीरस्य संकल्प हेतुत्वाभावात् । मन एव हि संकल्पहेतुः । तदभ्युपगतमीश्वरेऽपि, कार्यत्वेनैव ज्ञानशक्तिवन्मनं- सोऽपि प्राप्तत्वात् । मानसः संकल्प शरीरस्यैव, सशरीरस्यैव समनं-