श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७२ ) इति। अनेन ज्ञानमात्रान्मोक्षश्च निरस्तः। अतः सफलभेद निवृत्ति रूपा मुक्तिर्जीवतो न संभवति। वाक्य से प्रत्यक्ष ज्ञान तो हो नहीं सकता, परोक्षवाक्यार्थ ज्ञान द्वारा भी अविद्या की निवृत्ति संभव नहीं है, इसलिए जीवन्मुक्ति की बात भी दूर से ही त्याज्य है। फिर यह जीवन्मुक्ति है क्या वस्तु ? सशरीर अवस्था में ही जीवन्मुक्ति कहना “मेरी माता बन्ध्या है” के समान असंगत हास्यास्पद बात है। सशरीरता को बंधन तथा अशरीरता को मोक्ष तो तुमने भी स्वयं श्रुति प्रमाणों से सिद्ध किया है। यदि कहो कि—सशरीर के प्रतिभास में ही उसकी मिथ्या प्रतीति हो जाने से, मिथ्यामय सशरीरत्व की प्रतीति निवारित हो जाती है। नही ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि—"यह शरीर मिथ्या है" ऐसे ज्ञान से ही सशरीरता की निवृत्ति कैसे हो जायगी ? मृत की मुक्ति भी, मिथ्यामय शरीरता- भिमान की निवृत्ति ही तो है, जीवन्मुक्ति की ही क्या विशेषता है ? यदि कहो कि—जिसकी, सशरीरता की प्रतीति बाधित होते हुए भी, द्विचन्द्र दर्शन ज्ञान की तरह अविलुप्त भाव से रहती है, वही जीवन्मुक्त है। यह कथन भी असंगत है—बाधक ज्ञान, ब्रह्म से अतिरिक्त सभी विषयों से संबद्ध होता है, तो शरीरता की प्रतीति, उसकी कारण अविद्या कर्म आदि दोष भी तो, उस ज्ञान से बाध्य होंगे, इसलिए शरीरता की प्रतीति को, द्विचन्द्र ज्ञान की तरह अनुवृत्त नहीं कह सकते [अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त जब सभी कुछ मिथ्या हो जायगा तो उसका कोई भी अंश अवभासित हो भी कैसे सकता है] द्विचन्द्र के आभास में, द्विचन्द्र प्रतीति का हेतुभूत दोष, कभी भी, तद्बाधक द्विचन्द्रैकता के ज्ञान का विषय तो होता नहीं, विषय न होने से, वह बाधक ज्ञान से बाधित भी नहीं होता, इसलिए वहाँ द्विचन्द्र दर्शन की अनुवृत्ति बना रहना स्वाभाविक है। “उसकी मुक्ति में तभी तक का विलम्ब है, जब तक देह से छूटकारा नहीं होता”—सद्विद्या ( उपासना ) निष्ठ व्यक्ति का मोक्ष शरीरावसान अपेक्षित होता है, यह बतलाने वाली उक्त श्रुति, जीव- न्मुक्ति का प्रत्याख्यान करती है। इस जीवन्मुक्ति का आपस्तम्ब स्मृति में भी प्रत्याख्यान इस प्रकार किया गया है—"वैदिक लौकिक कर्मों का