श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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त्याग करके आत्मचिंतन करना चाहिए, केवल आत्मज्ञान बुद्धि से मोक्ष होने की बात शास्त्र से प्रतिबद्ध है; यदि बुद्धि से ही मोक्ष की प्राप्ति, इस शरीर में ही संभव हो सकती है तो, फिर दुःख नहीं मिलना चाहिए, सो ऐसा होता नहीं” (अर्थात् दुःख होता देखा जाता है) इस वाक्य से ज्ञानमात्र लभ्य मोक्ष की बात का निराकरण हो जाता है। इसलिए समस्त भेद निवृत्तिरूपामुक्ति शरीर रहते संभव नहीं है। तस्माद् ध्याननियोगेन ब्रह्मापरोक्षज्ञान फलेनैव बंधनिवृत्तिः। न च नियोगसाध्यत्वे मोक्षस्यानित्यत्वप्रसक्तिः प्रतिबंधनिवृत्ति मात्रस्यैव साध्यत्वात् । किंचं न-नियोगेन साक्षात् बंध निवृत्तिः क्रियते, किंतु निष्प्रपंचज्ञानैकरसब्रह्मापरोक्ष्यज्ञानेन । नियोगस्तुत- दापरोक्ष्यज्ञानं जनयति । इससे निश्चित होता है कि-ब्रह्म के अप्रत्यक्ष ज्ञान के उत्पादक, ध्यान नियोग (विधि) से ही बंध निवृत्ति होती है। नियोग की साधनता से मोक्ष की अनित्यता नहीं हो सकती; क्यों कि-नियोग की, प्रतिबंध निवृत्ति मात्र ही, साध्यता है। नियोग से सीधे बंध निवृत्ति नहीं होती, अपितु निष्प्रपंचज्ञानस्वरूप ब्रह्म के परोक्ष ज्ञान से मुक्ति होती है। नियोग तो उसमें अपरोक्ष ज्ञान का उत्पादन करता है। कथं नियोगस्य ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वमिति चेत् ,कथं वा भक्तो अनभिसंहित फलानांकर्मणां वेदनोत्पत्तिहेतुत्वम् ? मनोनैर्मल्य- द्वारेणेति चेत् ,ममापि तथैव,मम तु निर्मले मनसि शास्त्रेण ज्ञानमुत्पाद्यते । तव तु नियोगेन मनसि निर्मले ज्ञानसामग्री वक्तव्येति चेत्, ध्याननियोगनिर्मलंमन एव साधनमिति ब्रूमः । केनावगम्यते इति चेत् ,भवतो वा कर्मभिर्मनोनिर्मल भवति, निर्मलेमनसि श्रवणमनननिदिध्यासनैः सकलेतर विषय विमुखस्यैव शास्त्रं निवर्त्तकज्ञानमुत्पादयतीति केनावगम्यते ? “विविदिषन्ति यज्ञेनदानेनतपसानाशकेन”-श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः”-“ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”इत्यादिभिः शास्त्रैरिति