भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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चेत्, ममापि-“श्रोतव्योमंतव्यो निदिध्यासितव्यः”-“ब्रह्मविदाप्नोति परम्”-“न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा” मनसा तु विशुद्धेन”-“ हृदामनीषा मनसाऽपि क्लृप्तः”इत्यादिभिः शास्त्रैः ध्यान नियोगेन मनो निर्मलं भवति, निर्मलं च मनो ब्रह्मापरोक्षज्ञानंजनयती- त्यवगम्यते-इति निरवद्यम् । यदि पूछें कि-नियोग की ज्ञानोत्पत्ति हेतुता कैसे है ? (अर्थात् नियोग प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे कराता है ? ) तो मैं ही आप से पूछता हूँ कि- आपके मत से निष्काम कर्म ही ज्ञानोत्पत्ति का हेतु कैसे है ? यदि आप कहें कि-निर्मल मन में संभव है, तो वैसे ही मेरी हेतुता भी संभव है । आप कहें कि-हमारे मत से तो मन निर्मल होने पर शास्त्र की सहायता से ज्ञानोत्पत्ति होती है; तुम्हारे मत से नियोग द्वारा निर्मल मन में ज्ञानोत्पत्ति होती है,तुम्हें ज्ञानोत्पत्ति की सामग्री बतलानी होगी । इस पर हमारा कथन है कि-ध्यान नियोग से निर्मल मन ही ज्ञानोत्पत्ति का साधन है । यदि पूछें कि-यह कैसे जाना ? तो मैं पूछना हूँ कि-आपके मत में कर्म द्वारा मन की निर्मलता तथा श्रवण- मनन- निदिध्यासन द्वारा समस्त विषयों की पराङ्मुखता में ही, मोक्ष शास्त्र, बंध निवर्त्तक ज्ञान का उत्पादन करता है, यही कैसे जाना ? इस पर उदाहरण प्रस्तुत करें कि- यज्ञ-दान-तप और भोग त्याग द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा करते हैं-“आत्म तत्त्व श्रवणीय, मननीय और चिन्तनीय है-“ब्रह्म वेत्ता ब्रह्म ही होता है“ इत्यादि वाक्यों से हमारे मत की पुष्टि होती है । तो हमारे मत में भी-‘आत्म तत्त्व श्रवणीय- मननीय और चिन्तनीय है” “ब्रह्म वेत्ता ब्रह्म को प्राप्त करता है”-“वह नेत्र या वाणी से ग्राह्य नहीं है”-“विशुद्ध मन से ही गृहीत है”-“वशीकृत मन से ही वह परिज्ञात है”-इत्यादि शास्त्र, ध्यान नियोग से मन की निर्मलता का प्रतिपादन करते हैं । निर्मल मन ही ब्रह्म साक्षात्कार करता, अतः यही निर्दोष मत है । “नेदं यदिदमुपासते” इत्युपास्यत्वं प्रतिषिद्धमिति चेत् नैवम्-नात्र ब्रह्मण उपास्यत्वं प्रतिषिध्यते, अपितु ब्रह्मणो जगत् वैरूप्यं प्रतिपाद्यते । यदिदं जगदुपासते प्राणिनः, नेदं ब्रह्म, तदेव