श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्म त्वं विद्धि-यद वाचाऽनभ्युदितं येन,वागभ्युद्यते-इति-वाक्यार्थः अन्यथा-“तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि” इति विरुध्यते ।ध्यानविधि वैयर्थ्यं च स्यात् । अतो ब्रह्मसाक्षात्कारफलेन ध्याननियोगेनैवापरमार्थ भूतस्य कृत्स्नस्य द्रष्ट दृश्यादि प्रपंचरूपबंधस्य निवृत्तिः । यदि कहें कि—“जिसकी उपासना करते हो वह ब्रह्म नहीं है” इसमें उपास्यता का प्रतिषेध किया गया है सो बात नहीं है, यहाँ ब्रह्म की उपास्यता का प्रतिषेध नहीं है, अपितु इसमें ब्रह्म की जगत से विलक्षणता बतलाई गई है—अर्थात् प्राणि, जिस जगत् की उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है, अपितु “उसे ही ब्रह्म जानों जिससे वाणी प्रस्फुरित होती है और जो वाक्य से अवर्णनीय है ।” यही उक्त वाक्य का सही अर्थ है, यदि ऐसा अर्थ नहीं मानेंगे तो “उसे ही तुम ब्रह्म जानों” इस वाक्य से विरुद्धता होगी । साथ ही आत्मविषयक ध्यान विधि भी व्यर्थ हो जायगी इससे निश्चित होता है, कि—ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली ध्यान विधि से ही, असत्य रूप दृष्ट-दृश्य आदि प्रपंचात्मक जगत के सारे बंधन छूटते हैं । यदपि कैश्चिदुक्तम्-भेदाभेदयोर्विरोधो न विद्यते इति-तद- युक्तम्, नहि शीतोष्णतमःप्रकाशादिवद्भेदाभेदावेकस्मिन्वस्तुनि संगच्छेते । अथोच्येत्-सर्वं हिवस्तुजातं प्रतीति व्यवस्थाप्यम् । सर्वं च भिन्नाभिन्नं प्रतीयते । कारणात्मना जात्यात्मना चाभिन्नम् । कार्यात्मनाव्यक्त्यात्मना च भिन्नम् । छायाऽऽतपादिषु विरोधः सहानवस्थानलक्षणो भिन्नाधारत्वरूपश्च । कार्यकारणयोर्जा- तिव्यक्त्योश्च तदुभयमपि नोपलभ्यते । प्रत्युत एकमेव वस्तु द्विरूपं प्रतीयते—यथा-“मृदयं घटः” षण्डो गौ “मुण्डो गौ” इति । न चैकरूपं किंचिदपिवस्तु लोके दृष्टचरम् । न च तृणादेर्ज्वलनादिवद भेदो भेदोपमर्दी दृश्यत इति । न वस्तु विरोधः मृत्सुवर्णगवाश्वा- द्वात्मनाऽवस्थितस्यैव घटमुकुटषण्डवडवाद्यात्मना चावस्थानात् । न