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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २७८ ) थ्यात्म्यावबोधविलसितम् । तथा हि अबाधित एव प्रत्ययः सर्वत्रार्थं व्यवस्थापयति । देवाद्यात्माभिमानस्तु आत्मयाथात्म्यगोचरैः सर्वैः प्रमाणैर्बाध्यमानो रज्जुसर्पादि बुद्धिवन्नात्मशरीरयोरभेदं साधयति । “षण्डो गौः मुण्डो गौः” इति सामानाधिकरण्यस्य न केनचिद्- क्वचिद्बाधो दृश्यते । तस्मान्नातिप्रसंगः अतएव जीवोऽपि ब्रह्मणो नात्यन्तभिन्नः । अपि ब्रह्मांशत्वेन भिन्नाभिन्नः । तत्राभेद एव स्वाभाविकः, भेदस्त्वौपाधिकः कथमवगम्यत इति चेत्—“तत्त्वमसि’” “नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा” “अयमात्मा ब्रह्म” इत्यादिभिः श्रुतिभिः । “ब्रह्मेमेद्यावापृथिवी” इति प्रकृत्य–“ब्रह्मदाशा ब्रह्मदासा ब्रह्मेमे- कितवा उत, स्त्री पुंसौ ब्रह्मणो जातौ स्त्रियो ब्रह्मोऽत वा पुमान्” इत्याथर्वणिकानां संहितोपनिषदि ब्रह्मसूक्ते अभेद श्रवणाच्च । वे कहते है—“यह घट मिट्टी का है, यह षण्ड गाय है” इन प्रतीतियों की तरह “मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ,, ऐसी सामानाधिकरण्य ऐक्य प्रतीति से शरीर आत्मा की भी भिन्नाभिन्नता हो सकती है । ऐसा भेदाभेद का समर्थन, अपने घर में आग लगाने के समान है, ऐसा विचार शून्य भेदाभेद का साधन, वे ही करते हैं, जो सामानाधिकरण्य और उसके सही अर्थ को नहीं जानते । जो प्रतीति किसी प्रमाण द्वारा बाधित नहीं होती (अर्थात् भ्रांत नहीं कही जाती) वही सब जगह पदार्थ निर्धारण की हेतु हो सकती है । आत्मा के देवत्व आदि का अभिमान, आत्मा के यथार्थ बोधक सभी प्रमाणों से बाध्य है । रज्जुसर्प की तरह, उक्त प्रतीति भी, आत्मा शरीर की एकता का साधन नहीं कर सकती । “षण्ड गौ मुण्ड गौ” इस सामानाधिकरण्य में कोई बाधा नहीं दीखती, इसलिए उसमें कोई नियम भंग नहीं होता । इसी प्रकार जीव भी ब्रह्म से अत्यंत भिन्न नही है अपितु ब्रह्म का अंश होने से भिन्नाभिन्न है । उसका अभेद तो स्वाभाविक है, और भेद औपाधिक है । यदि पूछें कि-यह कैसे जाना ? “तू वही है” द्रष्टा कोई भिन्न नहीं है “यह आत्मा ही भिन्न है” इत्यादि श्रुतियों से ही ज्ञात होता है । “ये वृक्ष और यह पृथिवीआकाश” यहां से लेकर—“ब्रह्म

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