भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २७६ ) दाश, ब्रह्मदास और कितव सभी ब्रह्म हैं, स्त्री और पुरुष दोनों ही ब्रह्म जात हैं ब्रह्म ही स्त्री पुरुष हैं” इस अथर्वणीय संहिता के ब्रह्मसूत्र में कहे गए अभेद से भी उक्त बात निश्चित हो जाती है । “नित्यो नित्यानांचेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्”—“ज्ञाज्ञौद्वावजावीशनीशौ”—क्रियागुणैरात्मगुणैश्चतेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः—“प्रधानक्षेत्रज्ञ पतिर्गुणेशः संसार मोक्षस्थिति- बंधहेतुः”—सकारणंकरणाधिपाधिपः”—“तयोरन्यः पिप्पलं स्वादव- त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति”— स आत्मनि तिष्ठन्—“प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न वाह्यं किंचन वेद”—प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः उत्सर्ज- न्यति—“तमेवविदित्वाऽतिमृत्युमेति” इत्यादिभिभेदश्रवणाच्च जीव- परयोर्भेदाभेदाववश्याश्रयणीयौ तत्र—“ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति इत्यादि भिर्मोक्षदशायां जीवस्य ब्रह्मस्वरूपापत्तिव्यपदेशात् । “यत्रत्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्” इति तदानीं भेदेनेश्वरदर्शननिषे- धाच्चाभेदः स्वाभाविक इत्यवगम्यते । “नित्यों के नित्य चेतनों के चेतन वह अकेले ही अनेकों की कामनाओं को पूर्ण करते हैं—ज्ञाता और अज्ञ, ईश और अनीश दो अज हैं—क्रियागुण और आत्मगुण द्वारा उनका संयोग कराने वाला एक अन्य (जीव) भी ज्ञात होता है—प्रधान (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (जीव) का अधिपति संचालक तीनों गुणों का स्वामी (ईश्वर) अधिपति हैं—उन दोनों में एक पिप्पल का आस्वाद करता है दूसरा केवल देखता मात्र है। जो आत्मा में स्थिति है—प्राज्ञ (जीव) परमात्मा से आलिंगित होकर वाह्याभ्यंतर ज्ञान से रहित हो जाता है—प्राज्ञ, आत्मा द्वारा परिचालित देह का परित्याग कर चला जाता है—उसको जानकर मृत्यु का अतिक्रमण करता है । “इत्यादि भेद परक श्रुतियों से भी जीव और परमात्मा का भेदाभेद अवश्य मान्य है । “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है” इत्यादि श्रुतियों से मोक्षदशा में जीव की ब्रह्मस्वरूपावाप्ति बतलाई गई है तथा “जब सब कुछ आत्म्य है तो किससे किसको देखा जाय”? इत्यादि में कहे गए भेद परक ईश्वर दर्शन के निषेध से, स्वाभाविक अभेद प्रतीत होता है ।