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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( २७६ ) दाश, ब्रह्मदास और कितव सभी ब्रह्म हैं, स्त्री और पुरुष दोनों ही ब्रह्म जात हैं ब्रह्म ही स्त्री पुरुष हैं” इस अथर्वणीय संहिता के ब्रह्मसूत्र में कहे गए अभेद से भी उक्त बात निश्चित हो जाती है । “नित्यो नित्यानांचेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्”—“ज्ञाज्ञौद्वावजावीशनीशौ”—क्रियागुणैरात्मगुणैश्चतेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः—“प्रधानक्षेत्रज्ञ पतिर्गुणेशः संसार मोक्षस्थिति- बंधहेतुः”—सकारणंकरणाधिपाधिपः”—“तयोरन्यः पिप्पलं स्वादव- त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति”— स आत्मनि तिष्ठन्—“प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न वाह्यं किंचन वेद”—प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः उत्सर्ज- न्यति—“तमेवविदित्वाऽतिमृत्युमेति” इत्यादिभिभेदश्रवणाच्च जीव- परयोर्भेदाभेदाववश्याश्रयणीयौ तत्र—“ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति इत्यादि भिर्मोक्षदशायां जीवस्य ब्रह्मस्वरूपापत्तिव्यपदेशात् । “यत्रत्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्” इति तदानीं भेदेनेश्वरदर्शननिषे- धाच्चाभेदः स्वाभाविक इत्यवगम्यते । “नित्यों के नित्य चेतनों के चेतन वह अकेले ही अनेकों की कामनाओं को पूर्ण करते हैं—ज्ञाता और अज्ञ, ईश और अनीश दो अज हैं—क्रियागुण और आत्मगुण द्वारा उनका संयोग कराने वाला एक अन्य (जीव) भी ज्ञात होता है—प्रधान (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (जीव) का अधिपति संचालक तीनों गुणों का स्वामी (ईश्वर) अधिपति हैं—उन दोनों में एक पिप्पल का आस्वाद करता है दूसरा केवल देखता मात्र है। जो आत्मा में स्थिति है—प्राज्ञ (जीव) परमात्मा से आलिंगित होकर वाह्याभ्यंतर ज्ञान से रहित हो जाता है—प्राज्ञ, आत्मा द्वारा परिचालित देह का परित्याग कर चला जाता है—उसको जानकर मृत्यु का अतिक्रमण करता है । “इत्यादि भेद परक श्रुतियों से भी जीव और परमात्मा का भेदाभेद अवश्य मान्य है । “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है” इत्यादि श्रुतियों से मोक्षदशा में जीव की ब्रह्मस्वरूपावाप्ति बतलाई गई है तथा “जब सब कुछ आत्म्य है तो किससे किसको देखा जाय”? इत्यादि में कहे गए भेद परक ईश्वर दर्शन के निषेध से, स्वाभाविक अभेद प्रतीत होता है ।

( २८० ) ननुच-“सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” इति सह श्रुत्या तदानीमपि भेदः प्रतीयते वक्ष्यति च-“जगद्व्यापारवर्ज्यं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च “भोगमात्र साम्यलिंगाच्च” इति नैतदेवम्-“नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” इत्यादि श्रुतिशतैरात्मभेद प्रतिषेधात् । “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सहब्रह्मणा विपश्चिता”इति सर्वैःकामैःसह ब्रह्माश्नुते-सर्वगुणान्वितं ब्रह्माश्नुत इत्युक्तं भवति । अन्यथाब्रह्मणा सहेत्यप्राधान्यं ब्रह्मणः प्रसज्येत् । “जगद्व्यापारवर्जं” इत्यत्र मुक्तस्य भेदेनावस्थाने सत्यैश्वर्यस्य न्यूनता प्रसंगो वक्ष्यते, अन्यथा “संपद्याविर्भावः स्वेनशब्दात्” इत्यादिभिर्विरोधात् । तस्मादभेद एव स्वाभाविकः । भेदस्तु जीवानां परस्मात् ब्रह्मणः परस्परं च बुद्धीन्द्रियदेहोपाधिकृतः । (प्रश्न) ‘वह मुक्त पुरुष,सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ समस्त कामनाओं का भोग करता है “इस श्रुति से तो मोक्ष दशा में भी भेद प्रतीति हो रही है सूत्रकार भी- “जगद् व्यापार वर्ज०” तथा “भोगमात्र साम्य- लिंगाच्च” में ऐसा ही कहते हैं- (उत्तर) बात ऐसी नहीं है-“इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है” इत्यादि सैकड़ो श्रुतियो से ब्रह्म-जीव के भेद का निषेध किया है । “सोऽ- श्नुते” इत्यादि का तात्पर्य है कि-मुक्त पुरुष समस्त कामनाओं से युक्तब्रह्म का भोग करता है। ऐसा अर्थ न मानने से-ब्रह्म अप्रधान तथा भोग प्रधान हो जायगा। “जगद्व्यापारवर्जं ” सूत्र में भी, मुक्त पुरुष को ब्रह्म से पृथक् मानने से, मुक्त के ऐश्वर्य की न्यूनता सिद्ध होगी । अन्यथा “सपद्याविर्भावस्वेन शब्दात्” सूत्र से विरुद्धता होगी । इससे सिद्ध होता है कि-अभेद स्वाभाविक ही है, जीवों का, परब्रह्म से भेद, बुद्धि-इन्द्रिय-देहादि उपाधि कृत है । ब्रह्म, यद्यपि निराकार व्यापक है फिर भी घट आदि भेद से आकाश की तरह, बुद्धि आदि उपाधियों से संबंध ब्रह्म में भी, भेद संभव है । भिन्न ब्रह्म में, बुद्धि आदि उपाधियों का संयोग संभव नहीं है तथा ankurnagpal108@gmail.com

( ३८१ ) बुद्धि आदि उपाधियों के संयोग से, ब्रह्मगत भेद में, अन्योन्याश्रयता भी घटित नही होती है,क्यों कि-उपाधि और उसके संयोग का कर्मकृत होने से अनादि प्रवाह है । एतदुक्तं भवति—पूर्वकर्म संबंधाज्जीवात् स्वसंबद्ध एवोपाधि- रुत्पद्यते तद्युक्तात्कर्म,एवं बीजांकुरन्यायेन कर्मोपाधिसंबंधस्याना- दित्वान्न दोष :-इति । अतो जीवानांपरस्परंब्रह्मणाचाभेदवत् भेदोऽपि स्वाभाविकः, उपाधीनामुपाध्यंतराभावात् तदभ्युपगमनेऽन- वस्थानाच्च । अतो जीवकर्मानुरूपं ब्रह्मणो भिन्नाभिन्नस्वभावा एवोपाधय उत्पद्यन्तइति । कथन यह है कि-पूर्वजन्मार्जित शुभाशुभ कर्म संबद्ध जीव से ही उपाधि की उत्पत्ति होती है और उस उपाधि संबद्ध जीव से शुभा शुभ कर्म की उत्पत्ति होती है, फिर भी बीजांकुरन्याय से, दोनों में परस्पर अन्योन्याश्रिता नहीं होती । जीवों का पारस्परिक और जीव ब्रह्म का भेद स्वाभाविक न होकर औपाधिक है ; बुद्धि आदि उपाधियों से जीवों का पारस्परिक और ब्रह्म के साथ जो भेद अभेद है, उसमें अभेद स्वाभाविक और भेद औपाधिक है। यह बात- उपाधियों की अन्यता के अभाव तथा उनके संभावना से होने वाली अनवस्था से,निश्चित होती है । इससे ज्ञात होता है कि-अपने कर्मानुसार ही जीवों की अनुरूप उपाधियाँ होती है,जो कि ब्रह्म से भिन्नाभिन्न हैं । अत्रोच्यते — अद्वितीयसच्चिदानन्दब्रह्मध्यानविषयविधिपरं वेदांतवाक्यजातमिति वेदांतवाक्यैरभेदः प्रतीयते । भेदावलंबिभिः कर्मशास्त्रैः प्रत्यक्षादिभिश्च भेदः प्रतीयते । भेदाभेदयोः परस्पर विरोधात् अनाद्यविद्यामूलतयाऽपि भेद प्रतीत्युपपत्तेरभेद एव परमार्थ इत्युक्तम् । वे कहते हैं कि—अद्वितीय सच्चिदानंद ब्रह्म ध्यानविषयक विधि के विधायक वेदांत वाक्यों के होने से, उन वेदांत वाक्यों से अभेद की प्रतीति होती है। भेदावलम्बी कर्मविधायक शास्त्र वाक्यों तथा प्रत्यक्ष

( २८२ ) आदि प्रमाणों से भेद की प्रतीति होती है। भेद और अभेद की परस्पर विरुद्धता तथा अनादि अविद्यामूलकता से भेद की प्रतीति निष्पन्न होती है, एकमात्र अभेद ही परमार्थ है। तत्र यदुक्तं—भेदाभेदयोरुभयोरपि प्रतीति सिद्धत्वान्न विरोधः- इति-तद्युक्तम्-कस्माच्चित्कस्यचित्विलक्षणत्वंहि तस्मात्तस्य भेदः तद्विपरीतंचाभेदः। तयोस्तथाभावांतथाभावरूपयोरेकत्र संभवमनुन्मत्तः को ब्रवीति ? कारणात्मना जात्यात्मना-वाभेदः कार्यात्मनाव्यक्त्यात्मना च भेदः-इत्याकारभेदादविरोध इति चेत्, न विकल्पासहत्वात्। आकारभेदादविरोधं वदतः, किमेकस्मिन्ना- कारे भेदः आकारान्तरेचाभेदः—इत्यभिप्रायः उतोआकारद्वययोगि वस्तुगतावुभावपीति ? पूर्वस्मिन्कल्पे—व्यक्तिगतो भेदः, जातिगतश्चा- भेद इति नैकस्यद्व्यात्मकता। जातिव्यक्तिरिति चैकमेव वस्त्विति चेत् तर्हि आकारभेदादविरोधः परित्यक्तःस्यात् एकस्मिंश्च विलक्षण- त्वतद्विपर्ययौ विरुद्धावित्युक्तम्। द्वितीये तु कल्पे अन्योन्यविलक्षण माकारद्वयमप्रतिपन्नं च तदाश्रयभूतं वस्त्विति। तृतीयाऽभ्युपगमेऽपि त्रयाणामन्योन्यवैलक्षण्यमेवोपादितं स्यात् न पुनरभेदः। आकारद्वय निरुह्यमाणा विरोधं तदाश्रयभूते वस्तुनि भिन्नाभिन्नत्वमिति चेत्—स्वस्माद्विलक्षणं स्वाश्रयमाकारद्वयं स्वस्मिन्विरुद्ध धर्मद्वय समावेश निर्वाहकं कथंभवेत् ? अविलक्षणंतु कथन्तराम् ? आकार द्वय तद्वतोश्च द्व्यात्मकत्वाभ्युपगमे निर्वाहकान्तरापेक्षयाऽनवस्था स्यात्। यह कहना भी असंगत है कि—भेदाभेद दोनों की ही प्रतीति होती है, इसलिए दोनों में परस्पर विरोध नहीं होता। किसी एक पदार्थ की, किसी अन्य पदार्थ से जो विलक्षणता होती है, वही उनका भेद है और उससे विपरीतता ही अभेद है। इस प्रकार परस्पर विरुद्ध भावापन्न भेद और अभेद की एक ही स्थान में संभावना की बात, कोई अप्रमत्त व्यक्ति तो कर नहीं सकता। यदि कहें कि-कारणरूप और जातिरूप से अभेद तथा ankurnagpal108@gmail.com

( २६३ ) कार्यरूप और व्यक्तिरूप से भेद मानने से विरोध नहीं होगा, यह बात भी विचारपूर्ण नहीं प्रतीत होती। मैं पूछता हूँ कि—आकार भेद से अविरोध बतलाने का, क्या एक आकार में अभेद तथा अन्य आकार में भेद ही तात्पर्य है ? अथवा दोनों प्रकार के आकारों में भेदाभेद तात्पर्य है ? पहिली बात—“व्यक्तिगत भेद और जातिगत अभेद में - एक ही वस्तु की द्वयात्मकता नहीं है ( जाति और व्यक्ति एक पदार्थ नहीं हैं) यदि जाति और व्यक्ति को एक ही वस्तु मानते हो तो” आकारभेद से अविरोध वाली बात का आग्रह छोड़ना होगा, क्योंकि एक ही पदार्थ में वैलक्षण्य और अवैलक्षण्य, दोनों नितांत विरुद्धतायें हो नहीं सकतीं ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। दूसरी बात में—परस्पर विजातीय दो आकार, उपलब्धि के विषय नहीं हो सकते । जाति और व्यक्ति की आश्रयभूत तीसरी वस्तु का अस्तित्व मानने से भी, अभेद का प्रतिपादन नहीं होता, क्योंकि—जब वे दोनों ही परस्पर विलक्षण है तो, तीमरी की विलक्षणता भी स्वाभाविक है। दोनों आकारों से विशिष्ट तीसरी वस्तु में आकार भेद से द्वैताद्वैत भाव मानने से संशय होता है कि—अपने से विलक्षण, अपने आश्रय को, वे दोनों आकार, अपने विरुद्ध दोनों धर्मों में, समा- विष्ट कैसे कर सकेंगे ? तीनों वस्तुओं को अविलक्षण मानकर भी, ऐसा कैसे संभव हो सकेगा ? दोनों आकार और उसके आकार की विलक्षणता मानने के लिए, किसी चौथी वस्तु के अस्तित्व की कल्पना करनी पड़ेगी जिससे अनवस्था होगी। न च संप्रतिपन्नैकव्यक्तिप्रतीतिवत् ससामान्येऽपि वस्तुन्येक- रूपा प्रतीतिरूपजायते । यतः “इदमित्थं” इति सर्वत्र प्रकारप्रकारित- यैव सर्वा प्रतीतिः । तत्र प्रकारांशो जातिप्रकारांशो व्यक्तिरिति नैकाकारा प्रतीतिः । अतएव जीवस्यापि ब्रह्मणो भिन्नाभिन्नत्वं न संभवति । तस्मादभेदस्यानन्यथासिद्धशास्त्रमूलत्वादनाद्यविद्या- मूल एव भेदप्रत्ययः । निर्विवाद ऐक्य व्यक्ति की प्रतीति की तरह, सामान्य वस्तु में भी एकरूपा प्रतीति, संभव नहीं हो सकती, क्योंकि—“यह वस्तु ऐसी है” ऐसी प्रकार प्रकारी ( सामान्य-विशेष या विशेषण-विशेष्य भाव ) प्रतीति ही, प्रायः सब जगह होती है। वहाँ प्रकार जाति, तथा प्रकारी व्यक्ति

( २८४ ) है, इसलिए एकाकार प्रतीति संभव नहीं है । अतएव जीव की भी भिन्नाभिन्नता, ब्रह्म के साथ नहीं हो सकती । शास्त्रमूलक अभेद ही यथार्थ है, भेद प्रत्यय को अनादि अविद्यामूलक ही मानना चाहिए । ननु एवं ब्रह्मण्येवाज्ञत्वं तन्मूलाश्च जन्मजरामरणादयो दोषाः प्रादुष्युः । ततश्च—“यः सर्वज्ञः सर्ववित्” एषह्यात्माऽपहतपाप्मा” इत्यादीनि शास्त्राणि वाध्येरन् । नैवम्—अज्ञानादिदोषाणामपारमार्थत्वात् । भवतस्तूपाधि ब्रह्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरमनभ्युपगच्छतो ब्रह्मण्येवोपाधि संसर्गस्त- त्कृताश्च जीवत्वाज्ञत्वादयोदोषाः परमार्थत एव भवेयुः, न हि ब्रह्मणि निरवयवेऽच्छेद्ये संबद्धयमाना उपाधयस्तच्छित्त्वाभित्त्वा वा संबध्यन्ते । अपितु ब्रह्मस्वरूपे संयुज्य तस्मिन्नेव स्वकार्याणि कुर्वन्ति । ( इस पर भेदाभेद वादी कहते हैं ) जीव ब्रह्म का नित्य अद्वैत संबंध होने से, जीव के जन्म, जरा, मरण आदि दोष ब्रह्म को भी दूषित कर देंगे जिससे—“जो सर्वज्ञ सर्वविद् है” वह निष्पाप है” इत्यादि ब्रह्मपरक श्रुतियां बाध्य हो जायेंगी । ( उक्त कथन का निराकरण)—आपने जिन दोषों की चर्चा की है वे अज्ञानादि दोष पारमार्थिक नहीं हैं । ( वाद ) आप उपाधि और ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का अस्तित्व तो स्वीकारते नहीं, इसलिए ब्रह्म का उपाधि संसर्ग स्वाभाविक ही होगा, तथा उपाधिकृत जीवता, अज्ञता आदि परमार्थ रूप से ब्रह्म में घटित होंगे । ( विवाद ) निरवयव और अच्छेद्य ब्रह्म में संश्लिष्ट उपाधियाँ . ब्रह्म का छेदन भेदन करके उसमें प्रविष्ट हो जाती हों, ऐसा तो संभव है नहीं, अपितु ब्रह्म के स्वरूप से संश्लिष्ट होकर, उनमें अपने अपने कार्यों का प्रयोग मात्र करती हैं । ankurnagpal108@gmail.com

यदि मन्वीत—उपाध्युपहितं ब्रह्मजीवः स चाणुपरिमाणः अणुत्वं चावच्छेदकस्य मनसोऽणुत्वात्, स चावच्छेदोऽनादिः, एवम् उपाध्युपहितेऽंशे संबंध्यमाना दोषाः अनुपहिते परेब्रह्मणि न संबध्यन्ते इति । अयं प्रष्टव्यः—किमुपाधिना च्छिन्नो ब्रह्मखण्डोऽणुरूपोजीवः ? उताच्छिन्नएवाणुरूपोपाधिसंयुक्तोब्रह्मप्रदेश विशेषः उतोपाधि संयुक्तं ब्रह्मस्वरूपम् ? अथोपाधि संयुक्तं चेतनांतरं अथोपाधिरेव ? इति । अच्छेद्यत्वात् ब्रह्मणः प्रथमः कल्पो न कल्पते । आदिमत्त्वं च जीवस्य स्यात् । एकस्य सतोद्वैधीकरणं हि छेदनं । द्वितीये तु कल्पे ब्रह्मण एव प्रदेशविशेषे उपाधिसंबंधारोपाधिकाः सर्वे दोषास्तस्यैव स्युः । उपाधौगच्छत्युपाधिना स्वसंयुक्तं ब्रह्मप्रदेशाकर्षणायोगादनु- क्षणमुपाधिसंयुक्त ब्रह्मप्रदेशभेदात् क्षणेक्षणे बंधमोक्षौ च स्याताम् । आकर्षणे चाच्छिन्नत्वात् कृत्स्नस्य ब्रह्मणः आकर्षणं स्यात् । निरंशस्य व्यापिनः आकर्षणं न संभवतीति चेत् तर्हि उपाधिरेव गच्छतीतिपूर्वोक्त एव दोषः स्यात् । अच्छिन्न ब्रह्मप्रदेशेषु सर्वोपाधि- संसर्गे सर्वेषां च जीवानां ब्रह्मण एव प्रदेशत्वेनैकत्वेन प्रतिसंधानं न स्यात् । प्रदेशभेदादप्रतिसंधाने चैकस्यापि सोपाधौ गच्छति प्रति- संधानं न स्यात् । तृतीये तु कल्पे ब्रह्मस्वरूपस्येवोपाधिसंबंघेन जीवत्वापातात् तदतिरिक्तानुपहितब्रह्मासिद्धिः स्यात् । तुरीये तु कल्पे ब्रह्मणोऽन्य एव जीव इति जीवभेदस्यौपाधिकत्वं परित्यक्तं स्यात् । तस्मादभेदशास्त्रबलेन कृत्स्नस्यभेदस्याविद्यामूलत्वमेवाभ्यु- पगंतव्यम् । अतः प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनपरतयैव शास्त्रस्य प्रामाण्येऽपि ध्यानविधिशेषतया वेदांतवाक्यानां ब्रह्मस्वरूपे प्रामाण्यमुपपन्नम् इति । यदि ऐसा मानते हैं कि—उपाधि परिच्छिन्न ब्रह्म ही, जीवनाम- धारी, अणु परिमाण वाला होता है । जीव का अवच्छेदक मन, अणु

( २८६ ) परिमाण का है इसलिए जीव में भी अणुता है। वह जीव का अवच्छेदक भी अनादि है, इसलिए उपाधिविशिष्ट देश ( जीव ) में जो दोष होते हैं, वे अनुपहित ( उपाधि संबंध रहित ) ब्रह्म से संबंद्ध नहीं हो सकते । इस पर प्रष्टव्य यह है कि—अणु परिमाणवाला जीव उपाधि परिच्छिन्न ब्रह्म का अंश है, अथवा उपाधि अनवच्छिन्न ब्रह्म का ? अणुरूप उपाधि संयुक्त ब्रह्म का प्रदेश ( अंश ) विशेष है, अथवा उपाधि संयुक्त ब्रह्म का ही रूप है ? उपाधि संयुक्त कोई दूसरा चेतन है, अथवा उपाधि ही है ? इसमें—उपाधि परिच्छिन्न ब्रह्म का अंश तो कहा नहीं जा सकता, क्योंकि—ब्रह्म अविच्छिन्न है। उक्त कल्पना से जीव की आदिमता भी होती है, जबकि जीव अनादि है । एक वस्तु को दो करना ही परिच्छिन्नता है। दूसरे कल्पानुसार जब जीव ब्रह्म का ही प्रदेश माना गया है तो जीव के उपाधि से संबद्ध होने से, सारे औपाधिक दोष ब्रह्म के ही मानें जायेंगे। उपाधि कभी स्थिर तो रहती नहीं इसलिए जब वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जायगी तो अपने साथ, संयुक्त उस ब्रह्म प्रदेश को ले न जा सकेगी, उस समय निश्चित ही उसका उस प्रदेश से संबंध विच्छेद हो जायगा, इस प्रकार जीव का क्षण-क्षण में बंधन और मोक्ष होता रहेगा। यदि वह उपाधि उस प्रदेश को भी आकृष्ट करके ले जायगी तो उस प्रदेश का अभिन्न अंगी ब्रह्म भी खिंचता चला जायगा । यदि अखण्ड, सर्वव्यापी ब्रह्म का खिंचाव असंभव मानते हो तो, फिर भी क्षण-क्षण बंधन मोक्ष का दोष तो, घटित होगा ही। उपाधि से अविच्छिन्न ब्रह्म के प्रदेशों में, समस्त उपाधियों की संसर्गता से ज्ञान की अभिन्नता प्रतीत होने लगेगी। जीवों को यदि, ब्रह्म के भिन्न-भिन्न प्रदेशों का माने और उस नाते उनके ज्ञानों की भी विभिन्नता मान लें तो एक की अपनी उपाधि दूसरे के प्रदेश में चले जाने पर, एक ही व्यक्ति को पूर्वापर स्मृति ही न रह जायगी। तीसरी कल्पना में, उपाधि संबद्ध होने से, स्वरूपतः ब्रह्म ही जब जीवता को प्राप्त करता है तो, जीव से विलक्षण, अनुपहित (उपाधि-

( २८७ ) रहित ) ब्रह्म की चर्चा ही समाप्त हो जायगी । तथा सभी शरीरों में एक ही जीव का साम्राज्य होगा ( जीव की भिन्नता भी समाप्त हो जायगी ) चौथी कल्पना में जब जीव को ब्रह्म से भिन्न माना गया है तब, जीव के भेद की औपाधिकता समाप्त हो जाती है ( अर्थात् उपाधि संबंध से संभाव्य भेद की चर्चा समाप्त हो जाती है ) अंतिम पांचवी कल्पना तो चार्वाक मत में ही हो सकती है । इसलिए अभेद शास्त्र की बलवत्ता से, सारे भेदों की अविद्यामूलकता ही स्वीकारनी होगी । प्रवृत्ति या निवृत्ति रूप प्रयोजन के प्रकाशक वेदांत वाक्यों की प्रामाणिकता, ब्रह्म के स्वरूपावबोध में, ध्यानविधिपरक होने से ही चरितार्थ होती है । तदप्ययुक्तम्—ध्यानविधिशेषत्वेऽपि वेदांतवाक्यानामर्थसत्यत्वे प्रामाण्यायोगात् । एतदुक्तं भवति-ब्रह्मस्वरूपगोचराणिवाक्यानि किं-ध्यानविधिनैकवाक्यतामापन्नानि ब्रह्मस्वरूपे प्रामाण्यं प्रत्य- पद्यन्ते, उत् स्वतंत्राण्येव ? एकवाक्यत्वे ध्यानविधिपरत्वेन ब्रह्म- स्वरूपे तात्पर्यं न संभवति । भिन्नवाक्यत्वे प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजन- विरहादनबोधकत्वमेव । न च वाच्यम्- ध्यान नाम स्मृतिसंतति- रूपम् । तच्च स्मर्त्तव्यैकनिरूपणमिति ध्यानविधेः स्मर्त्तव्यविशेषा- कांक्षायाम् “इदं सर्वं यदयमात्मा” ब्रह्म सर्वानुभूः” सत्यंज्ञानमनंतं- ब्रह्म” इत्यादीनि स्वरूप तद्विशेषादीनि समर्पयंन्ति । तेनैकवाक्या- तामापन्नान्यर्थ सद्भावेप्रमाणमिति । ध्यानविधेः स्मर्त्तव्यविशेषापेक्ष- त्वेऽपि “नामब्रह्म” इत्यादि दृष्टिविधिवदसत्येनाप्यर्थविशेषेण ध्यान- निर्वृत्युपपत्तेः ध्येय सत्यत्वानपेक्षणात् । अतोवेदांतवाक्यानां प्रवृत्ति- निवृत्ति प्रयोजन विधुरत्वात् ध्यानविधिशेषत्वेऽपि ध्येयविशेषस्वरूप समर्पणमात्रपर्यवसानात् स्वातंत्र्येऽपि बालातुराद्युपच्छन्दनवाक्यवत् ज्ञानमात्रेणैव पुरुषार्थपर्यन्तता सिद्धेश्च परिनिष्पन्नवस्तुसत्यता गोचरत्वाभावात् ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वं न संभवतीति प्राप्तम् । ankurnagpal108@gmail.com

( २८८ ) उक्त कथन भी युक्ति संगत नहीं है--वेदांत वाक्यों की ध्यानविधि शेषता होते हुए भी, पदार्थ सत्यता का कोई प्रमाण नहीं मिलता । कथन यह है कि--ब्रह्म स्वरूप बोधक वाक्य, ध्यानविधि के साथ, एकवाक्यता प्राप्त कर, ब्रह्म स्वरूप के प्रकाशन में प्रमाणित होते हैं, अथवा स्वतंत्र रूप से होते हैं ? ( यह विचारणीय विषय है ) एक वाक्यता में होने से, जब वह ध्यानविधि परक हैं, तो, ब्रह्म स्वरूप के ज्ञापन में उनका तात्पर्य नहीं हो सकता यदि वह स्वतंत्र रूप से होते हैं तो, प्रवृत्ति निवृत्ति रूप प्रयोजन रहित होने से, उनमें सत्यार्थ बोधकता का अभाव है ही । यह नही कह सकते कि-स्मृति प्रवाह ही ध्यान है और वह केवल स्मर्त्तव्य रूप से ही निरूप्य है । स्मर्त्तव्य विशेष उस ध्यानविधि के निरूपण की आकांक्षा होने पर “यह सारा दृश्य आत्मा ही है” यह आत्मा ही सर्वानु- भावक ब्रह्म है “ब्रह्म सत्य-ज्ञान-अनंतस्वरूप है” इत्यादि वेदांत वाक्य ब्रह्म स्वरूप और ब्रह्मगत विशेष भावों का प्रकाश करते हैं; क्या ये ध्यानविधि के साथ एकवाक्यता को प्राप्त कर प्रतिपाद्य अर्थ की सत्यता को प्रमाणित करने में प्रमाण हो सकते हैं ? ध्यानविधि की स्मर्त्तव्य सापेक्षता होते हुए भी—“मन की ब्रह्म रूप से उपासना करनी चाहिए” इत्यादि दृष्टि विधि की तरह, असत्यवाक्यार्थ द्वारा भी जब ध्यान क्रिया निष्पन्न हो सकती है तो, ध्यानकार्य में, ध्येय पदार्थ की, थोड़ी भी सत्यता अपेक्षित नहीं है । इसलिए वेदांत वाक्यों के, प्रवृत्ति निवृत्ति प्रयोजन रहित होने से, ध्यानविधिशेषता होते हुए भी, ध्येयविशेष के स्वरूप प्रकाशन में ही पर्यवसित होने से, स्वतंत्र होते हुए भी, अर्भक और रोगियों को फुसलाने वाले वाक्यों की तरह, वाक्यार्थमात्र से ही, पुरुष के वास्तविक प्रयोजन की सिद्धि हो पाती है, स्वतः सिद्ध वस्तु की सत्यता के बोधन में, शास्त्र की सामर्थ्य नहीं है । इसलिए ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणता संभव नहीं है । [L2

( २८६ ) परताविरहान्न प्रयोजनपर्यवसायीति ब्रुवाणो “राजकुलवासिनः पुरुषस्य कौलेयककुलाननुप्रवेशेन प्रयोजनशून्यता” ब्रूते । उक्त प्रस्तुत मत के उत्तर में “तत्तुसमन्वयात्” सूत्र कहा गया है। समन्वय का तात्पर्य है, सम्यक् रूप से अन्वय, अर्थात् यथोपयुक्त रूप से पुरुषार्थ के साथ संबद्ध निस्सीम, निरतिशय, ब्रह्म ही, परमपुरुषार्थ हैं, ऐसा समस्त वेदांत वाक्यों का वाच्यार्थ है, ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता, इसी से निश्चित होती है। निर्दोष, अत्यंत आनंदस्वरूप प्राप्य ब्रह्म के बोधक, वेदांत वाक्य, प्रवृत्ति-निवृत्ति परक न होने से, निष्प्रयोजन हैं, ऐसा कहना “राजकुलवासी व्यक्ति, म्लेच्छ के घर निष्प्रयोजन नहीं जाता” इस कथन के समान ही है। एतदुक्तं भवति-अनादिकर्मरूपाविद्यावेष्टनतिरोहितपरावर तत्त्वयाथात्म्यस्वस्वरूपावबोधानां देवासुरगंधर्वसिद्धविद्याधरकिन्नर किंपुरुषयक्ष राक्षसपिशाचमनुजपशुशकुनसरीसृपवृक्षगुल्मलतादूर्वादीनां स्त्रीपुंन्नपुंसकभेदभिन्नानां क्षेत्रज्ञानांव्यवस्थितधारकपोषकभोग्य विशेषाणां मुक्तानां स्वस्य चाविशेषाणामनुभवसंभवे स्वरूपगुणविभव चेष्टितैरनवधिकातिशयानन्दजननं परंब्रह्मास्तीति बोधयदेव वाक्यं प्रयोजनपर्यवसायि । प्रवृत्तिनिवृत्तिनिष्ठं तु यावत्पुरुषार्थान्वयबोधं न प्रयोजनपर्यवसायि । कथन यह है कि—अनादिकाल से प्रवृत्त कर्मरूप अविद्यामय आवरण से, परब्रह्म और अपरब्रह्म का यथार्थभाव, तथा अपना प्रत्यक्स्वरूपता का ज्ञान तिरोहित है, एवं जिनके देहधारण पोषणोप- योगी भोग्य विषय सुव्यवस्थित हैं, उन स्त्री, पुरुष, नपुंसकभेदों से विभिन्न, देवता-असुर-सिद्ध-विद्याधर-किन्नर - किंपुरुष-यक्ष - राक्षस-पिशाच-मनुष्य- पशु-पक्षी-सर्प-वृक्ष-गुल्म-लता-दूर्वा आदि रूपों वाले जीवों का, अनुभव भी जब, मुक्त जीवों और अपने में समानरूप से हो सकता है, तो स्वरूप- गुण-वैभव-चेष्टा आदि में बेजोड़, अतिशय आनंदजनक परब्रह्म के अस्तित्व के प्रतिपादक वेदांत वाक्य निश्चित ही प्रयोजनावसायी (सार्थक) ankurnagpal108@gmail.com

हैं। प्रवृत्ति निवृत्ति बोधक वाक्य, पुरुष के परिमित अभीष्ट प्रतिपादक होते हुए भी, वास्तविक प्रयोजन (आत्यंतिक दुःख निवृत्ति रूपी मुक्ति) के साधन में समर्थ नहीं हैं। एवंभूतं ब्रह्म कथं प्राप्यत इत्यपेक्षायां “ब्रह्मविदाप्नोतिपरम्” आत्मानमेवलोकमुपासीत “इति वेदनादिशब्दैरुपासनं ब्रह्मप्राप्त्युपाय- तया विधीयते। यथा “स्ववेश्मनि निधिरस्ति” इति वाक्येन निधि- सद्भावं ज्ञात्वा तृप्तःसन् पश्चादुपादाने च प्रवर्त्तते। यथा च— कश्चिद्राजकुमारो बालक्रीडासक्तो नरेन्द्रभवनान्निष्क्रान्तो मार्गाद्- भ्रष्टो नष्ट इति राज्ञा विज्ञातः स्वयं चाज्ञातपितृकः केनचिद्द्विज- वर्येण वर्धितोऽधिगतवेदशास्त्रः षोडशवर्षः सर्वकल्याणगुणाकरः तिष्ठन् “पिता ते सर्वलोकाधिपतिः गाम्भीर्यौदार्यवात्सल्यशौशौल्य वीर्यपराक्रमादिगुणसंपन्नः त्वामेवनष्टं पुत्रं दिदृक्षुः पुरवरेतिष्ठति” इति केनचिदभियुक्ततमेन प्रयुक्तं वाक्यं शृणोति चेत्, तदानीमेव— “अहं तावत् जीवतः पुत्रः मत्पिता च सर्वं संपत्समृद्धः” इति निरति- शयहर्षसमन्वितो भवति। राजा च स्वपुत्रं जीवन्तमरोगमति मनोहरदर्शनं विदितसकलवेद्यश्रुत्वाऽवाप्तसमस्तपुरुषार्थो भवति। पश्चात्तदुपादाने च प्रवर्त्तते। पश्चात्तावुभौ संगच्छेते च इति। ऐसा अद्भूत ब्रह्म कैसे प्राप्त हो सकता है? ऐसी आकांक्षा होने पर— “ब्रह्मवेत्ता परंतत्त्व को प्राप्त करता है “आत्मा की ही दृष्टव्य रूप से उपासना करनी चाहिए” इत्यादि वाक्य में “वेदन” आदि शब्द बोध्य उपासना ही, प्राप्तव्य ब्रह्म के उपाय रूप से विहित है। जैसे कि—कोई व्यक्ति—‘अपने घर में धनगड़ा है” इस बात को जानकर प्रसन्नता से उसे निकालने के लिए प्रयत्नशील होता है। तथा जैसे—कोई राजकुमार बालकों के साथ खेलता हुआ राजमहल से निकल कर खो जाता है, राजा उसे जानता है, पर वह अबोध होने के कारण पिता को नहीं जानता, वह कदाचित् किसी श्रेष्ठ विद्वान ब्राह्मण द्वारा पोषित और वेदशास्त्र का पारंगत होकर जब वयस्क होता है, तब किसी

( २६१ ) व्यक्ति द्वारा "सर्वलोकाधिपति, गाभीर्य औदार्य-वात्सल्य-सौशील्य-शौर्य- वीर्य-पराक्रम आदि गुणों संपन्न तुम्हारे पिता खोये हुए तुम्हें देखने के लिए महल में आकुल हैं" ऐसा सुनते ही "तो मैं जीवित पिता का पुत्र हूं, मेरे पिता वैभव संपन्न हैं' हर्ष विभोर हो जाता है तथा वह राजा अपने पुत्र को निरोग, अतिसुन्दर-सर्वगुण संपन्न सुनकर कृतार्थ हो जाता है, उसे बुलवाने की चेष्टा करता है; प्रयास के बाद वे दोनों एक दूसरे से मिल जाते हैं [ब्रह्म प्राप्ति संबंधी उपदेश भी इसी प्रकार है] यत्पुनः—परिनिष्पन्नवस्तुगोचरस्य वाक्यस्य तत्ज्ञानमात्रे- णापि पुरुषार्थपर्यवसानात् बालातुराद्युपच्छन्दनवाक्यवन्नार्थं सद्भावे प्रामाण्यम्—इति । तदसत्—अर्थसद्भावाभावे निश्चिते ज्ञातोऽप्यर्थः पुरुषार्थाय न भवति । बालातुरादीनामप्यर्थसद्भाव भ्रान्त्या हर्षाद्युत्पत्तिः । तेषामेव तस्मिन्नेव ज्ञाने विद्यमाने यद्यर्थाभावनिश्चयो जायेत्, ततः तदानीमेव हर्षादयो निवर्तेरन् । श्रौपनिषदेष्वपि वाक्येषु ब्रह्मास्तित्वतात्पर्याभाव निश्चये ब्रह्मज्ञाने सत्यपि पुरुषार्थपर्यवसानं न स्यात् । अतः "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इत्यादिवाक्यं निखिलजगदेककारणं निरस्तनिखिलदोष गन्धं सार्वज्ञसत्यसंकल्पत्वाद्यनन्तकल्या णगुणाकरमनवधिकातिशया- नन्दं ब्रह्मास्तीति बोधयतीति सिद्धम् । जो यह कहा कि—स्वतः सिद्ध बोधक वाक्य की वाक्यार्थ प्रतीति केवल पुरुषार्थपर्यवसित होने से, बालक और व्यथित पुरुष के फुसलाने वाले वाक्य की तरह, पदार्थ के अस्तित्व में प्रामाणिक नहीं हो सकती । यह असंगत बात है—अर्थ की असत्यता प्रमाणित हो जाने पर, ज्ञात अर्थ भी पुरुषार्थ नहीं हो सकता । बालक और व्यथित पुरुष को जो हर्ष होता है वह उन्हें, अपने अनुकूल प्रतीत होने से भ्रांत होता है, उस वाक्यार्थ की जब उन्हें यथार्थता ज्ञात होती है, तो तत्काल ही उनका हर्ष समाप्त भी हो जाता है । उपनिषदों के वाक्यों में भी यदि, ब्रह्म के अस्तित्व विषयक तात्पर्य का अभाव होता, तो ब्रह्मविषयक ज्ञान होते हुए भी वह ज्ञान कभी पुरुषार्थ साधन में पर्यवसित न हो सकता । ankurnagpal108@gmail.com

( २६२ ) इसलिए—"यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य—समस्त जगत के एकमात्र कारण, निर्दोषता, सत्यसंकल्पता, सर्वज्ञता आदि अनेक कल्याणमयगुणों के आकर, अतिशय आनंद स्वरूप ब्रह्म के अस्तित्व का ही बोधक है। यह निश्चित मत है । ५. अधिकरण:— "यतो वा इमानि" इत्यादि जगत्कारणवादिवाक्यप्रतिपाद्यं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमस्तहेयप्रत्यनीककल्याणगुणैकतानंब्रह्म जिज्ञास्य- मित्युकम् । इदानीं जगत्कारणवादिवाक्यानां आनुमानिकप्रधानादि प्रतिपादनानर्हतोच्यते– ईक्षतेर्नाशब्दमित्यादिना । जगत् कारणता बोधक "यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य प्रतिपाद्य सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, समस्त तुच्छगुणरहित, कल्याणमय गुणों के धाम, ब्रह्म ही जिज्ञास्य हैं, यह बतलाया गया। अब जगत्कारणवादी वाक्यों से अनु- मानिक प्रधान आदि का प्रतिपादन नहीं हो सकता यही ईक्षतेर्नाशब्दम् इत्यादि आठ सूत्रों से सिद्ध करेंगे । ईक्षतेर्नाशब्दम् ।१।१।५॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये—"सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवा- द्वितीयम्, तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत" इत्यादि— तत्र संदेहः किं सच्छब्दवाच्यं जगत्कारणं परोक्तमानुमानिकं प्रधानम् ? उतोक्त लक्षणं ब्रह्म इति । छांदोग्योपनिषद् में जो यह कहा गया कि—"हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एकमात्र यह सत् ही था, उसने इच्छा की अनेक होकर प्रकट हो जाऊँ, तब उसने तेज की सृष्टि की" इत्यादि इसमे संदेह होता है कि— उक्त वाक्य में जगत् कारण के लिए प्रयुक्त सत् शब्द वाच्य सांख्य दर्शन का आनुमानिक प्रधान (प्रकृति) है अथवा पूर्वोक्त लक्षण वाला ब्रह्म ही है ? ankurnagpal108@gmail.com

( २६३ ) किं प्राप्तम् ? प्रधानमिति । कुतः ? “सदेव सौम्येदमग्र- आसीदेकमेव” इत्यादि शब्दवाच्यस्य चेतनभोग्यभूतस्य सत्त्वरज- स्तमोमयस्य वियदादिनानारूपविकारावस्थस्य वस्तुनः कारणावस्थां वदति । अतो यद्द्रव्यं यत्स्वभावं च कार्यावस्थम्, तत्स्वभावं तदेव द्रव्यं, कारणावस्थम् सत्त्वादिमयं च कार्यमिति गुणसाम्यावस्थं प्रधानमेव हि कारणम् । तदेवोपसंहृतसकलाविशेषं सन्मात्रमिति “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” इत्यभिधीयते । तत एव च कार्यकारणयोरनन्यत्वम् । तथा सत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञान प्रतिज्ञोपपत्तिः, अन्यथा “यथा सोम्येकेन मृत्पिण्डेन इत्यादि मृत्पिण्ड तत्कार्यं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्वैरूप्यं चेति जगत्कारणवादिवाक्येन महर्षिणा कपिलेनोक्तं प्रधानमेव प्रतिपाद्यते । प्रतिज्ञादृष्टान्तरूपेणा- नुमानवेषमेव चेदं वाक्यमिति सच्छब्दवाच्यमानुमानिकमेव । उक्त संदेह होने पर आनुमानिक प्रधान को ही सत् शब्द वाच्य मानने का पक्ष प्रस्तुत करते हैं-“सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्” इत्यादि-इस वाक्य का “इदं” शब्द, चेतन भोग्य भूत सत्वरजतमोमय, अनेक रूपों में विकृत आकाश आदि वस्तु की ही कारणावस्था बतलाता है [अर्थात् इदं शब्द प्रत्यक्ष ग्राह्य सन्निहित वस्तु का ही बोधक है] कारण वस्तु की अवस्था- न्तर प्राप्ति ही कार्यावस्था होती है [आकाश आदि महाभूत ही गुणमय होकर स्थूलाकार में जगत् रूप से प्रकट होते हैं यही प्रधान कारणवाद का सिद्धान्त है] जिस द्रव्य का जो स्वभाव कार्यावस्था में होता है वही कारणावस्था में भी होगा । सत्व रजतमोमय जगत ही कार्य है तथा साम्यावस्था वाला त्रिगुणात्मक प्रधान ही उसका करण है। अपनी संपूर्ण विशेषताओं को छिपाये हुए यह प्रधान ही “सत्’था, ऐसा “सोम्येदमग्र” आदि में कहा गया है । इस प्रकार कार्य कारण की अभिन्नता भी प्रमाणित हो जाती है । तथा ऐसा मानने से “एक के विज्ञान से सबका ज्ञान हो जाता है” यह सिद्धान्त भी सुसंगत हो जाता है [अर्थात् जैसे पकते हुए चावलों में से एक चावल के देखने से सारे चावलों की अवस्था का ज्ञान हो जाता है, वैसे ही त्रिगुणात्मक प्रधान को ankurnagpal108@gmail.com

( २६४- ) जान लेने से संपूर्ण जगत उसी के समान है, ऐसा सिद्ध हो जाता है] यदि प्रधान को कारण न मानेंगे तो "हे सौम्य ! एक ही मिट्टी के ढेले से" इत्यादिवाक्य में कथित मिट्टी के ढेले और उसके निर्माण पृथिवी के दृष्टांत और दार्ष्टान्तिक में विषमता हो जावेगी। ऐसा जगत् कारण वादी वाक्यों के विश्लेषण के प्रसंग में "प्रधान ही जगत का कारण है" प्रतिपादन करते हुए, महर्षि कपिल ने कहा है। प्रतिज्ञा, दृष्टान्त आदि सभी से सिद्ध होता है कि "सदेव" इत्यादि वाक्य आनुमानिक प्रधान का ही बोधक है तथा वह प्रधान ही "सत्" शब्द वाच्य है। इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते "ईक्षतेर्नाशब्दम्" इति । यस्मिन् शब्द एव प्रमाणं न भवति, तदशब्दमानुमानिकं प्रधानं इत्यर्थः । न तज्जगतकारणवादिवाक्य प्रतिपाद्यम् कुतः: ? ईक्षतेः, सच्छब्दवाच्य संबंधव्यापार विशेषाभिधायिन ईक्षतेः धातोः श्रवणात् । "तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति" ईक्षतक्रियायोगाश्चाचेतने प्रधाने न संभवति । अतः ईदृशेक्षणक्षमश्चेतनः विशेषः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः पुरुषोत्तमः सच्छब्दाभिधेयः । तथा च सर्वेष्वेव सृष्टिप्रकरणेष्वीक्षापूर्वकैव सृष्टिः प्रतीयते "स ईक्षत् लोकान्नुसृजा इति स इमांल्लोकानसृजत" "स ईक्षाञ्चक्रे-स प्राणानसृजत्" इत्यादिषु । उक्त मत के निराकरण के लिए "ईक्षतेर्नाशब्दम्" सूत्र प्रस्तुत करते हैं। प्रधान के लिए शब्द (आगम) प्रमाण का नितांत अभाव है, इसलिए आनुमानिक प्रधान जगत् कारण वाक्योक्त "सत्" शब्द का वाच्यार्थ नहीं हो सकता, यही इस सूत्र का तात्पर्य है। यह प्रधान जगतकारण- वादी वाक्य का प्रतिपाद्य तत्व नहीं है, क्योंकि-शास्त्र में जगतकर्त्ता के लिए ईक्षण क्रिया का प्रयोग किया गया है। "उसने संकल्प किया कि- अनेक होकर प्रकटूं" इस श्रुति में सत् शब्द बोध्य कारण का, संबंधी व्यापार विशेष "ईक्षण" क्रिया का प्रयोग किया गया है। ईक्षण क्रिया का योग अचेतन प्रधान में संभव नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि-ईक्षण की क्षमता वाले चेतन विशेष, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति संपन्न पुरुषोत्तम ही "सत्" शब्द वाच्य हैं। सारे सृष्टि प्रकरण में "ईक्षा" ही मुख्य कारण बतलाया

( २६५ ) गया है, अर्थात् सृष्टि संकल्पात्मिका है ऐसा बतलाया गया है। जैसा कि-“उन्होंने इच्छा की कि-लोकों की सृष्टि करूँ, तब इन लोकों की सृष्टि की “उन्होंने इच्छा की और प्राण की सृष्टि की” इत्यादि वाक्यों से सिद्ध होता है। ननु च कार्यगुणेनैव कारणेन भवितव्यम्, सत्यम् सर्वकार्यानु- गुण एव सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सत्यसंकल्पः पुरुषोत्तमः सूक्ष्मचिदचिद्- वस्तुशरीरकः। यथाऽह—“पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च” यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः “यस्या व्यक्तं शरीरम् यस्याक्षरंशरीरं यस्य मृत्युःशरीरम्, एष सर्वभूता- न्तरात्मा” इति। तदेतत् “न विलक्षणत्वात्” इत्यादिषु प्रतिपाद- यिष्यते। अत्र सृष्टि वाक्यानि न प्रधानप्रतिपादनयोग्यानीत्युच्यते। वस्तुविरोधस्तु तत्रैव परिहरिष्यते यतूक्तं–प्रतिज्ञादृष्टान्तयोगात् अनुमानरूपमेवेदंवाक्यं इति तदसत्–हेत्वनुपपादनात्। “येनाश्रुतं श्रुतं” इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञाने प्रतिपादयिषिते सर्वात्मना तदसंभवं मन्वमानस्य तत्संभवमात्रप्रदर्शनाय हि दृष्टान्तोपादानम्। ईक्षत्यादिश्रवणादेव हि अनुमानगंधाभावोऽवगतः। (शंका) कार्य के अनुकूल पदार्थ ही, कारण हो सकता है (जड़ जगत के अनुकूल जड़ प्रकृति ही कारण हो सकती है) ऐसी जो शंका की जाती है, वह ठीक है, सर्वकार्यानुगुण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिसंपन्न, सत्य- संकल्प पुरुषोत्तम् सूक्ष्मचिद् अचिद् सभी वस्तुओं के रूप में स्थित हैं— जैसा कि— “उस परमात्मा की ज्ञान बल-क्रिया आदि अनेक स्वाभाविक शक्तियाँ सुनी जाती हैं-वह सर्वज्ञ, सर्वविद् और ज्ञान रूपी तपवाला है" अव्यक्त और मृत्यु (प्रकृति और जगत) जिसके शरीर हैं, वही प्राणि- मात्र के अंतरात्मा पापरहित हैं” इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है। इसका विशेष प्रतिपादन “न विलक्षणत्वात्” इत्यादि सूत्र में करेंगे। यहाँ बतलावेंगे कि सृष्टि प्रतिपादक वाक्य प्रधान परक नहीं है। ankurnagpal108@gmail.com

( २६६ ) जो यह कहते हैं कि-प्रतिज्ञा और दृष्टांत के अनुसार, वेदांत वाक्य, प्रधान के अनुरूप ही घटित होते हैं, यह भी असंगत बात है, इसका कोई कारण उपलब्ध नहीं होता । "जिसके द्वारा अश्रुत विषय भी श्रुत होता है" एक के जानने से सबका ज्ञान होता है "ये वाक्य निम्नांकित शंका "सर्वात्मा ब्रह्म में ऐसा होना असंभव है" के निवारणार्थ ही प्रस्तुत किए गए हैं "ईक्षण" क्रिया श्रवण-से ही संबंधित है, आनुमानिक प्रधान में संकल्प-श्रवण आदि का नितांत अभाव है । अथ स्यात्—न चेतनगतं मुख्यमीक्षणमिहोच्यते, अपि प्रधानगत- गौणमीक्षणं "तत्तेज ऐक्षत वा आप ऐक्षन्त" इति गौणेक्षण साहचर्यात् । भवति चाचेतनेष्वपि चेतनधर्मोपचारः यथा—"वृष्टि प्रतीक्षाः शालयः" "वर्षेण बीजं प्रतिसंजहर्ष" इति अतो गौणमीक्षण- मितीमामाशंकामनुभाष्य परिहरति । जो यह कहते हैं कि—सृष्टि प्रकरण में जिस ईक्षण क्रिया का प्रयोग किया गया है, वह चेतन संबंधी मुख्य ईक्षण नहीं है, अपितु प्रधान संबंधी गौण ईक्षण है, जैसा कि—"तत्तेज ऐक्षत" इत्यादि में तेज और जल आदि जड पदार्थों की ईक्षण क्रिया के प्रयोग से निश्चित होता है । जड पदार्थों में भी चेतन पदार्थों का सा औपचारिक प्रयोग किया जाता है, जैसे कि— 'शालि (धान) के पौधे वृष्टि की प्रतीक्षा करते हैं वर्षा से बीजों को हर्ष होता है" इत्यादि से गौण ईक्षण ही सिद्ध होता है इस शंका का परिहार कर रहे हैं— गौणश्चेन्नात्म शब्दात् १।१।६॥ यदुक्तम्—गौणेक्षणसाहचर्यात् सतोऽपीक्षणव्यपदेशः सर्गनीयत- पूर्वावस्थाभिप्रायो गौण इति । तन्न "ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा" इति सच्छब्दप्रतिपादितस्य आत्मशब्देन व्यपदेशात् । एतदुक्तं भवति "ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् स आत्मा" इति चेतना- चेतनप्रपञ्चोद्देशेन सत् आत्मत्वोपदेशोऽयं नाचेतने प्रधाने संगच्छत ankurnagpal108@gmail.com

( २६७ ) इति; अतस्तेजोऽबन्नानामपि परमात्मैवात्मेति तेजःप्रभृतयोऽपि शब्दाः परमात्मन एव वाचकाः । तथा हि हन्ताऽहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इति परमात्मा- नुप्रवेशादेव तेजःप्रभृतीनां वस्तुत्वं तत्तन्नामभाक्त्वं चेति “तत्तेज ऐक्षत—ता आप ऐक्षन्त” इत्यपि मुख्य एवेक्षणव्यपदेशः, अतः साह- चर्द्यादपि “तदैक्षत” इत्यत्र गौणत्वाशङ्कादूरोत्सारितेति सूत्राभिप्रायः । जो यह कहते हैं कि—गौण ईक्षण के साहचर्य से सत् के ईक्षण का भी व्यपदेश हैं, जो कि, सृष्टि पूर्व की एक स्पन्दन क्रियामात्र के अभिप्राय से कहा गया है अतएव गौण ही है । यह कथन सुसंगत नहीं है क्योंकि— "यह सारा जगत आत्म स्वरूप हैं, यह आत्म स्वरूप है, यह आत्मा सत्य स्वरूप है" इत्यादि वाक्य में आत्मा शब्द से सत् तत्त्व का उल्लेख किया गया है । इसी अभिप्राय से यह भी कहा गया कि—"सारा जगत आत्म्य है वही आत्मा है" यहाँ चेतन अचेतनात्मक जगत प्रपंच के उद्देश्य से आत्मतत्त्व का उपदेश किया गया है अचेतन प्रधान का कोई प्रसंग नहीं है । परमात्मा ही तेज, जल आदि की आत्मा हैं, इसलिए तेज आदि भी परमात्म वाची हैं—जैसा कि—"मैं जीवरूप से प्रविष्ट होकर उन तीनों ( पृथ्‍वी-जल-तेज ) देवताओं को नाम रूप से व्यक्त करूँ" इस परमात्मा के संकल्प बोधक वाक्य से सिद्ध होता हैं कि—परमात्मा ही, आत्मारूप से प्रविष्ट होकर तेज आदि वस्तुओं के नाम रूप का विस्तार करते हैं । "तत्तेज ऐक्षत" आदि वाक्यों में मुख्य ईक्षण का ही वर्णन है । सत् के ईक्षण के साथ, तेज आदि के ईक्षण के उल्लेख में गौण ईक्षण की आशंका नहीं करनी चाहिए, यही इस सूत्र का अभिप्राय है । इतश्च न प्रधानं सच्छब्दप्रतिपाद्यम्— इसलिए भी सांख्य शास्त्रोक्त प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं हो सकता कि—

( २६८ ) तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् १।१।७॥ मुमुक्षोः श्वेतकेतोः ‘तत्त्वमसि’ इति सदात्मकत्वानुसन्धानमुप- दिश्य तन्निष्ठस्य “तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्प- त्स्ये” इति शरीरपातमात्रान्तरायो ब्रह्मसम्पत्तिलक्षणो मोक्ष इत्यु- पदिशति, यदि च प्रधानमचेतनं कारणमुपदिश्येत; तदा तदात्म- कत्वानुसन्धानस्य मोक्षसाधनत्वोपदेशो नोपपद्यते “यथा क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति” इति तन्निष्ठस्याचेतन- सम्पत्तिरेव स्यात् । न च मातापितृसहस्रेभ्योऽपि वत्सलतरं शास्त्र- मेवंविधतापत्रयाभिहतिहेतुभूतामचित्सम्पत्तिमुपदिशति । प्रधान- कारणवादिनोऽपि हि प्रधाननिष्ठस्य मोक्षं नाभ्युपगच्छन्ति । मुमुक्षु श्वेत केतु को “तत्त्वमसि” ऐसा तदात्मकता के अनुसंधान का उपदेश देकर “तभी तक मोक्ष का विलंब है जब तक शरीर से छूट नहीं जाता, उसके बाद वह सत् रूप हो जाता है” ऐसा शरीर पात मात्र के अन्तराय वाला ब्रह्म संपत्ति रूप मोक्ष का उपदेश दिया गया है । यदि अचेतन प्रधान को जगत के कारण रूप से बतलाया जाता तो, तदात्मक- त्वानुसंधान रूपी मोक्षसाधनत्वोपदेश का मेल नहीं बैठता ।' पुरुष इस लोक में जैसा संकल्प और अनुष्ठान करता है, वैसी ही मरणोत्तर उसकी गति होती है” इस वाक्य से कैसे मान लिया जाय कि— अचेतन की आराधना से भी गति प्राप्त हो सकती है। माता और पिता से हजारों गुना वात्सल्य भाव से जीवों की रक्षा करने वाले शास्त्र, कहीं तापत्रय की शांति के लिए, जड़ की आराधना का उपदेश दे सकते हैं ? प्रधान कारण वादी भी प्रधान की आराधना करके मोक्ष नहीं पा सकते । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान इसलिए भी जगत का कारण नहीं हो सकता कि-- हेयत्वावचनाच्च १।१।८॥ यदि प्रधानमेव कारणं सच्छब्दाभिहितं भवेत् तदा मुमुक्षोः श्वेतकेतोस्तदात्मकत्वं मोक्षविरोधित्वाद्धेयत्वेनैवोपदेश्यं स्यात् । न ankurnagpal108@gmail.com