श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८६ ) परताविरहान्न प्रयोजनपर्यवसायीति ब्रुवाणो “राजकुलवासिनः पुरुषस्य कौलेयककुलाननुप्रवेशेन प्रयोजनशून्यता” ब्रूते । उक्त प्रस्तुत मत के उत्तर में “तत्तुसमन्वयात्” सूत्र कहा गया है। समन्वय का तात्पर्य है, सम्यक् रूप से अन्वय, अर्थात् यथोपयुक्त रूप से पुरुषार्थ के साथ संबद्ध निस्सीम, निरतिशय, ब्रह्म ही, परमपुरुषार्थ हैं, ऐसा समस्त वेदांत वाक्यों का वाच्यार्थ है, ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता, इसी से निश्चित होती है। निर्दोष, अत्यंत आनंदस्वरूप प्राप्य ब्रह्म के बोधक, वेदांत वाक्य, प्रवृत्ति-निवृत्ति परक न होने से, निष्प्रयोजन हैं, ऐसा कहना “राजकुलवासी व्यक्ति, म्लेच्छ के घर निष्प्रयोजन नहीं जाता” इस कथन के समान ही है। एतदुक्तं भवति-अनादिकर्मरूपाविद्यावेष्टनतिरोहितपरावर तत्त्वयाथात्म्यस्वस्वरूपावबोधानां देवासुरगंधर्वसिद्धविद्याधरकिन्नर किंपुरुषयक्ष राक्षसपिशाचमनुजपशुशकुनसरीसृपवृक्षगुल्मलतादूर्वादीनां स्त्रीपुंन्नपुंसकभेदभिन्नानां क्षेत्रज्ञानांव्यवस्थितधारकपोषकभोग्य विशेषाणां मुक्तानां स्वस्य चाविशेषाणामनुभवसंभवे स्वरूपगुणविभव चेष्टितैरनवधिकातिशयानन्दजननं परंब्रह्मास्तीति बोधयदेव वाक्यं प्रयोजनपर्यवसायि । प्रवृत्तिनिवृत्तिनिष्ठं तु यावत्पुरुषार्थान्वयबोधं न प्रयोजनपर्यवसायि । कथन यह है कि—अनादिकाल से प्रवृत्त कर्मरूप अविद्यामय आवरण से, परब्रह्म और अपरब्रह्म का यथार्थभाव, तथा अपना प्रत्यक्स्वरूपता का ज्ञान तिरोहित है, एवं जिनके देहधारण पोषणोप- योगी भोग्य विषय सुव्यवस्थित हैं, उन स्त्री, पुरुष, नपुंसकभेदों से विभिन्न, देवता-असुर-सिद्ध-विद्याधर-किन्नर - किंपुरुष-यक्ष - राक्षस-पिशाच-मनुष्य- पशु-पक्षी-सर्प-वृक्ष-गुल्म-लता-दूर्वा आदि रूपों वाले जीवों का, अनुभव भी जब, मुक्त जीवों और अपने में समानरूप से हो सकता है, तो स्वरूप- गुण-वैभव-चेष्टा आदि में बेजोड़, अतिशय आनंदजनक परब्रह्म के अस्तित्व के प्रतिपादक वेदांत वाक्य निश्चित ही प्रयोजनावसायी (सार्थक) ankurnagpal108@gmail.com