श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८८ ) उक्त कथन भी युक्ति संगत नहीं है--वेदांत वाक्यों की ध्यानविधि शेषता होते हुए भी, पदार्थ सत्यता का कोई प्रमाण नहीं मिलता । कथन यह है कि--ब्रह्म स्वरूप बोधक वाक्य, ध्यानविधि के साथ, एकवाक्यता प्राप्त कर, ब्रह्म स्वरूप के प्रकाशन में प्रमाणित होते हैं, अथवा स्वतंत्र रूप से होते हैं ? ( यह विचारणीय विषय है ) एक वाक्यता में होने से, जब वह ध्यानविधि परक हैं, तो, ब्रह्म स्वरूप के ज्ञापन में उनका तात्पर्य नहीं हो सकता यदि वह स्वतंत्र रूप से होते हैं तो, प्रवृत्ति निवृत्ति रूप प्रयोजन रहित होने से, उनमें सत्यार्थ बोधकता का अभाव है ही । यह नही कह सकते कि-स्मृति प्रवाह ही ध्यान है और वह केवल स्मर्त्तव्य रूप से ही निरूप्य है । स्मर्त्तव्य विशेष उस ध्यानविधि के निरूपण की आकांक्षा होने पर “यह सारा दृश्य आत्मा ही है” यह आत्मा ही सर्वानु- भावक ब्रह्म है “ब्रह्म सत्य-ज्ञान-अनंतस्वरूप है” इत्यादि वेदांत वाक्य ब्रह्म स्वरूप और ब्रह्मगत विशेष भावों का प्रकाश करते हैं; क्या ये ध्यानविधि के साथ एकवाक्यता को प्राप्त कर प्रतिपाद्य अर्थ की सत्यता को प्रमाणित करने में प्रमाण हो सकते हैं ? ध्यानविधि की स्मर्त्तव्य सापेक्षता होते हुए भी—“मन की ब्रह्म रूप से उपासना करनी चाहिए” इत्यादि दृष्टि विधि की तरह, असत्यवाक्यार्थ द्वारा भी जब ध्यान क्रिया निष्पन्न हो सकती है तो, ध्यानकार्य में, ध्येय पदार्थ की, थोड़ी भी सत्यता अपेक्षित नहीं है । इसलिए वेदांत वाक्यों के, प्रवृत्ति निवृत्ति प्रयोजन रहित होने से, ध्यानविधिशेषता होते हुए भी, ध्येयविशेष के स्वरूप प्रकाशन में ही पर्यवसित होने से, स्वतंत्र होते हुए भी, अर्भक और रोगियों को फुसलाने वाले वाक्यों की तरह, वाक्यार्थमात्र से ही, पुरुष के वास्तविक प्रयोजन की सिद्धि हो पाती है, स्वतः सिद्ध वस्तु की सत्यता के बोधन में, शास्त्र की सामर्थ्य नहीं है । इसलिए ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणता संभव नहीं है । [L2