भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 357

( २६७ ) इति; अतस्तेजोऽबन्नानामपि परमात्मैवात्मेति तेजःप्रभृतयोऽपि शब्दाः परमात्मन एव वाचकाः । तथा हि हन्ताऽहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इति परमात्मा- नुप्रवेशादेव तेजःप्रभृतीनां वस्तुत्वं तत्तन्नामभाक्त्वं चेति “तत्तेज ऐक्षत—ता आप ऐक्षन्त” इत्यपि मुख्य एवेक्षणव्यपदेशः, अतः साह- चर्द्यादपि “तदैक्षत” इत्यत्र गौणत्वाशङ्कादूरोत्सारितेति सूत्राभिप्रायः । जो यह कहते हैं कि—गौण ईक्षण के साहचर्य से सत् के ईक्षण का भी व्यपदेश हैं, जो कि, सृष्टि पूर्व की एक स्पन्दन क्रियामात्र के अभिप्राय से कहा गया है अतएव गौण ही है । यह कथन सुसंगत नहीं है क्योंकि— "यह सारा जगत आत्म स्वरूप हैं, यह आत्म स्वरूप है, यह आत्मा सत्य स्वरूप है" इत्यादि वाक्य में आत्मा शब्द से सत् तत्त्व का उल्लेख किया गया है । इसी अभिप्राय से यह भी कहा गया कि—"सारा जगत आत्म्य है वही आत्मा है" यहाँ चेतन अचेतनात्मक जगत प्रपंच के उद्देश्य से आत्मतत्त्व का उपदेश किया गया है अचेतन प्रधान का कोई प्रसंग नहीं है । परमात्मा ही तेज, जल आदि की आत्मा हैं, इसलिए तेज आदि भी परमात्म वाची हैं—जैसा कि—"मैं जीवरूप से प्रविष्ट होकर उन तीनों ( पृथ्‍वी-जल-तेज ) देवताओं को नाम रूप से व्यक्त करूँ" इस परमात्मा के संकल्प बोधक वाक्य से सिद्ध होता हैं कि—परमात्मा ही, आत्मारूप से प्रविष्ट होकर तेज आदि वस्तुओं के नाम रूप का विस्तार करते हैं । "तत्तेज ऐक्षत" आदि वाक्यों में मुख्य ईक्षण का ही वर्णन है । सत् के ईक्षण के साथ, तेज आदि के ईक्षण के उल्लेख में गौण ईक्षण की आशंका नहीं करनी चाहिए, यही इस सूत्र का अभिप्राय है । इतश्च न प्रधानं सच्छब्दप्रतिपाद्यम्— इसलिए भी सांख्य शास्त्रोक्त प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं हो सकता कि—