श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( २६७ ) इति; अतस्तेजोऽबन्नानामपि परमात्मैवात्मेति तेजःप्रभृतयोऽपि शब्दाः परमात्मन एव वाचकाः । तथा हि हन्ताऽहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इति परमात्मा- नुप्रवेशादेव तेजःप्रभृतीनां वस्तुत्वं तत्तन्नामभाक्त्वं चेति “तत्तेज ऐक्षत—ता आप ऐक्षन्त” इत्यपि मुख्य एवेक्षणव्यपदेशः, अतः साह- चर्द्यादपि “तदैक्षत” इत्यत्र गौणत्वाशङ्कादूरोत्सारितेति सूत्राभिप्रायः । जो यह कहते हैं कि—गौण ईक्षण के साहचर्य से सत् के ईक्षण का भी व्यपदेश हैं, जो कि, सृष्टि पूर्व की एक स्पन्दन क्रियामात्र के अभिप्राय से कहा गया है अतएव गौण ही है । यह कथन सुसंगत नहीं है क्योंकि— "यह सारा जगत आत्म स्वरूप हैं, यह आत्म स्वरूप है, यह आत्मा सत्य स्वरूप है" इत्यादि वाक्य में आत्मा शब्द से सत् तत्त्व का उल्लेख किया गया है । इसी अभिप्राय से यह भी कहा गया कि—"सारा जगत आत्म्य है वही आत्मा है" यहाँ चेतन अचेतनात्मक जगत प्रपंच के उद्देश्य से आत्मतत्त्व का उपदेश किया गया है अचेतन प्रधान का कोई प्रसंग नहीं है । परमात्मा ही तेज, जल आदि की आत्मा हैं, इसलिए तेज आदि भी परमात्म वाची हैं—जैसा कि—"मैं जीवरूप से प्रविष्ट होकर उन तीनों ( पृथ्वी-जल-तेज ) देवताओं को नाम रूप से व्यक्त करूँ" इस परमात्मा के संकल्प बोधक वाक्य से सिद्ध होता हैं कि—परमात्मा ही, आत्मारूप से प्रविष्ट होकर तेज आदि वस्तुओं के नाम रूप का विस्तार करते हैं । "तत्तेज ऐक्षत" आदि वाक्यों में मुख्य ईक्षण का ही वर्णन है । सत् के ईक्षण के साथ, तेज आदि के ईक्षण के उल्लेख में गौण ईक्षण की आशंका नहीं करनी चाहिए, यही इस सूत्र का अभिप्राय है । इतश्च न प्रधानं सच्छब्दप्रतिपाद्यम्— इसलिए भी सांख्य शास्त्रोक्त प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं हो सकता कि—
( २६८ ) तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् १।१।७॥ मुमुक्षोः श्वेतकेतोः ‘तत्त्वमसि’ इति सदात्मकत्वानुसन्धानमुप- दिश्य तन्निष्ठस्य “तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्प- त्स्ये” इति शरीरपातमात्रान्तरायो ब्रह्मसम्पत्तिलक्षणो मोक्ष इत्यु- पदिशति, यदि च प्रधानमचेतनं कारणमुपदिश्येत; तदा तदात्म- कत्वानुसन्धानस्य मोक्षसाधनत्वोपदेशो नोपपद्यते “यथा क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति” इति तन्निष्ठस्याचेतन- सम्पत्तिरेव स्यात् । न च मातापितृसहस्रेभ्योऽपि वत्सलतरं शास्त्र- मेवंविधतापत्रयाभिहतिहेतुभूतामचित्सम्पत्तिमुपदिशति । प्रधान- कारणवादिनोऽपि हि प्रधाननिष्ठस्य मोक्षं नाभ्युपगच्छन्ति । मुमुक्षु श्वेत केतु को “तत्त्वमसि” ऐसा तदात्मकता के अनुसंधान का उपदेश देकर “तभी तक मोक्ष का विलंब है जब तक शरीर से छूट नहीं जाता, उसके बाद वह सत् रूप हो जाता है” ऐसा शरीर पात मात्र के अन्तराय वाला ब्रह्म संपत्ति रूप मोक्ष का उपदेश दिया गया है । यदि अचेतन प्रधान को जगत के कारण रूप से बतलाया जाता तो, तदात्मक- त्वानुसंधान रूपी मोक्षसाधनत्वोपदेश का मेल नहीं बैठता ।' पुरुष इस लोक में जैसा संकल्प और अनुष्ठान करता है, वैसी ही मरणोत्तर उसकी गति होती है” इस वाक्य से कैसे मान लिया जाय कि— अचेतन की आराधना से भी गति प्राप्त हो सकती है। माता और पिता से हजारों गुना वात्सल्य भाव से जीवों की रक्षा करने वाले शास्त्र, कहीं तापत्रय की शांति के लिए, जड़ की आराधना का उपदेश दे सकते हैं ? प्रधान कारण वादी भी प्रधान की आराधना करके मोक्ष नहीं पा सकते । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान इसलिए भी जगत का कारण नहीं हो सकता कि-- हेयत्वावचनाच्च १।१।८॥ यदि प्रधानमेव कारणं सच्छब्दाभिहितं भवेत् तदा मुमुक्षोः श्वेतकेतोस्तदात्मकत्वं मोक्षविरोधित्वाद्धेयत्वेनैवोपदेश्यं स्यात् । न ankurnagpal108@gmail.com
( २६६ ) च तत्क्रियते, प्रत्युत उपादेयत्वेनैव "तत्त्वमसि" "तस्य तावदेव चिरम्" इत्युपदिश्यते । सांख्योक्त प्रधान ही यदि, जगत का कारण, सत् शब्द से वेदों को अभिप्रेत होता तो, मोक्षविरोधी, आत्मवादी सिद्धान्त को मानने वाले श्वेतकेतु को, उसे हेय बतलाकर उसे त्यागने का उपदेश दिया जाता, परंतु ऐसा न करके "तुम वही हो" तुम्हें उसे प्राप्त करने में तभी तक का विलम्ब है, जब तक कि शरीर का बंधन है" इत्यादि उपदेश दिया गया । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान को इसलिए भी कारण नहीं मान सकते कि— प्रतिज्ञाविरोधात् १।१।१६॥ प्रधानकारणत्वे प्रतिज्ञाविरोधश्च भवति । वाक्योपक्रमे ह्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञातम् । तच्च कार्यकारणयोरन- न्यत्वेन कारणभूतसद्विज्ञानात्तत्कार्यभूतचेतनाचेतनप्रपञ्चस्य ज्ञात- तयैवोपपादनीयम् । तत्तु प्रधानकारणत्वे चेतनवर्गस्य प्रधानकार्य- त्वाभावात् प्रधानविज्ञानेन चेतनवर्गविज्ञानासिद्धे विरुद्ध्यते । प्रधान को कारण मानने से प्रतिज्ञा से भी विरुद्धता होती है । वेदांत वाक्यों के उपक्रम (प्रारंभ) में ही, नियम बतलाया गया कि— "एक के ज्ञान से समस्त का ज्ञान होता है ।' उस नियम के अनुसार, कार्य और कारण दोनों में अनन्यता होनी चाहिए अतः कार्यरूप चेतन अचेतन समस्त प्रपंचरूप जगत कारण रूप उस ब्रह्म के स्वरूपानुसार ही प्रतीत होता है । यदि प्रधान को कारण मान ले तो, चेतन वर्ग में, जड प्रधान की कार्यता कहाँ से आवेगी । प्रधान के ज्ञान से, चेतन वर्ग के ज्ञान को सिद्ध करना, सर्वथा विरुद्ध है । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान इसलिए भी कारण नहीं है कि— ankurnagpal108@gmail.com
( ३०० )
स्वाप्ययात् १।१।१०॥ तदेव सच्छब्दवाच्यं प्रकृत्याह- "स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति तत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वम- पीतो भवति तस्मादेन स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति" इति सुषुप्तं जीवं सता सम्पन्नं, स्वमपीतः-स्वस्मिन् प्रलीन इति व्यप- दिशति । प्रलयश्च-स्वकारणे लयः न चाचेतनं प्रधानं चेतनस्य जीवस्य कारणं भवितुमर्हति । स्वमपीतो भवति आत्मानमेव जीवोऽ- पीतो भवतीत्यर्थः । चिद्वस्तुशरीरकं तदात्मभूतं ब्रह्मैव जीवशब्देनाऽ- भिधीयत इति नामरूपव्याकरणश्रुत्योक्तम् । तज्जीवशब्दाभिधेयं ब्रह्म सुषुप्तिकालेऽपि प्रलयकाल इव नामरूपपरिष्वङ्गाभावात् केवलसच्छब्दाभिधेयमिति 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वम- पीतो भवति' इत्युच्यते । तथा समानप्रकरणे नामरूपपरिष्वङ्गा- भावात् प्राज्ञेनैव परिष्वङ्गात् "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्" इत्युच्यते । आमोक्षाज्जीवस्य नामरूपपरिष्व- ङ्गादेव हि स्वव्यतिरिक्तविषयज्ञानोदयः । सुषुप्तिकाले हि नामरूपे विहाय सता सम्परिष्वक्तः पुनरपि जागरदशायां नामरूपे परिष्वज्य तन्नामरूपो भवतीति श्रुत्यन्तरे स्पष्टमभिधीयते "यदा सुप्तः स्वप्नं न कथञ्चन पश्यति अथ हास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" "तस्माद्वा आत्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते" तथा "त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तथा भवन्ति" इति । तथा सुषुप्तं जीवं 'प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः' इति च वदति । तस्मात्सच्छब्दवाच्यः परंब्रह्म सर्वज्ञः परमेश्वरः पुरुषो- त्तम एव । तदाह वृत्तिकारः "सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवतीति, सम्पत्त्यसम्पत्तिभ्यामेतदध्यवसीयते 'प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्त' इति चाहेति ।
( ३०१ ) ब्रह्म ही सत् शब्द का स्वाभाविक वाच्यार्थ हैं, जैसा कि--‘‘हे सोम्य ! मेरे निकट स्वप्नांत ( सुषुप्ति कालीन जीव की अवस्था ) को जानो, जिस समय वह पुरुष ( जीव ) सोता है, तब सत् संपन्न (ब्रह्मलीन) हो जाता है, स्वस्वरूप को प्राप्त हो जाता है, इसीलिए उसे ‘‘स्वपिति’’ कहते हैं, उस समय वह स्वरूप में अपीत ( लीन ) हो जाता है’’ इस वाक्य में सुषुप्त जीव को सत् से संपन्न अर्थात् ‘‘स्वमपीत अपने में प्रलीन’’ कहा गया है। प्रलय का अर्थ होता है अपने कारण में लीन होना। इससे स्पष्ट होता है कि--अचेतन प्रधान, चेतन जीव का कारण नहीं है। ‘‘स्वंम पीतो भवति’’ कहने का तात्पर्य है कि--जीव स्वीय (परमात्मा) को प्राप्त होता है। चिन्मय वस्तु अर्थात् चेतन ही जिसका शरीर है और जो जीवात्मा में, अन्तर्गत व्याप्त है, उसे ही उक्त प्रसंग में जीव शब्द से बतलाया गया है ( अर्थात् जो जीव का भी जीव है ) ‘‘मैं इसमें प्रवेश कर जीवात्मा के रूप से, वस्तुओं के नाम रूप को अभिव्यक्ति करूँगा’’ ऐसे नाम रूप के व्यक्तीकरण के उपदेश से भी उक्त तथ्य की पुष्टि होती है। प्रलयकाल की तरह, सुषुप्ति काल में भी, नाम और रूप का संबंध नहीं रहता, इसलिए जीव शब्द से उल्लेख्य वह ब्रह्म ही, सुषुप्ति काल में ‘‘सत्’’ शब्द से कहा गया है। जैसा कि--‘‘हे सोम्य। उस समय जीव सत् संपन्न होता है, स्वरूप प्राप्त करता है।’’ इसी प्रकार के अन्य प्रकरण में भी नाम रूप का संबंध न दिखला- कर, प्राज्ञ ( परमात्मा ) से ही संबंध दिखलाया गया है। जैसे कि-- ‘‘जीव प्राज्ञ आत्मा के साथ सम्मिलित होकर वाह्य और आभ्यन्तर किसी भी विषय को नहीं जानता (आत्म विभोर हो जाता है)’’ मोक्ष न होने तक केवल नाम रूप के साथ संबंध होने से जीवात्मा को स्व ( परमात्मा ) से भिन्न विषयक ज्ञान ( इस जगत में ) हुआ करता है। जो जीव सुषुप्ति काल में नाम रूप को छोड़कर सत् ( ब्रह्म ) से संसक्त हो जाता है, वही जाग्रत अवस्था में नामरूप से संसक्त होकर पुनः पूर्व रूप में हो जाता है, ऐसा अन्य श्रुति में स्पष्ट उल्लेख है--‘जिस समय यह स्वप्न रहित सुषुप्तावस्था में रहता है उस समय प्राण ( परमात्मा ) से एकाकार हो जाता है। जागने पर ankurnagpal108@gmail.com
( ३०२ ) इसकी इन्द्रियां अपने आश्रय स्थान में यथावत स्थित हो जाती हैं।" और जागने पर—“व्याघ्र-सिंह-वराह-मशक-दंश-जो कुछ भी हैं वे जैसे सुषुप्ति के प्रथम प्रतीत होते थे वैसे ही प्रतीत होते हैं।" सुषुप्त जीव को “प्राज्ञ परमात्मा से संसक्त रहता है" ऐसा बतलाया गया है। इन सबसे निश्चित होता है कि—“सत्" शब्द वाच्य परंब्रह्म सर्वज्ञ परमेश्वर पुरुषोत्तम ही हैं। उक्त श्रुति वाक्यों का समर्थन वृत्तिकार भी करते हैं—“उस अवस्था में जीव सत् से सम्पन्न हो जाता है।" ऊपर जो जीव की सत् के साथ सम्पत्ति और असम्पत्ति दिखलाई गई है उससे निश्चित होता है कि जीव 'प्राज्ञ परमात्मा से ही संलग्न होता है।" इतश्च न प्रधानम्— प्रधान को इसलिए भी जगत का कारण नहीं कह सकते कि— गति सामान्यात् ।१।१।११॥ ‘आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति स इमाँल्लोकानसृजत’” “तस्माद्वा एतस्मा- दात्मन आकाशस्सम्भूतः । आकाशाद्वायुः वायोरग्निः अग्नेरापः अद्भ्यः पृथिवी” तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेत- द्यदृग्वेदः' इत्यादिसृष्टिवाक्यानां या गतिः-प्रवृत्तिः, तत्सामान्यात् तत्समानार्थत्वादस्य तेषु च सर्वेषु सर्वेश्वरः कारणमवगम्यते । तस्मादत्रापि सर्वेश्वर एव कारणमिति निश्चीयते । “सृष्टि से पूर्व यह जगत, एक आत्म स्वरूप ही था,उसके अतिरिक्त कोई स्पन्दित पदार्थ नहीं था, उसने संकल्प किया कि लोगों की सृष्टि करूँ तब उसने सृष्टि की'-उस आत्मा से आकाश हुआ और फिर क्रमशः आकाश से वायु,वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी हुई "ऋग्वेद परमात्मा निश्वास मात्र है"-इत्यादि सृष्टि सूचक वक्यों की गति प्रवृत्ति (प्रकाशनशक्ति, तत्सामान्य हेतु अर्थात् उस सर्वज्ञ सर्वेश्वर परमात्मा के अनुरूप ही है। इसलिए यहाँ भी सर्वेश्वर ही जगत् के कारण निश्चित होते हैं। ankurnagpal108@gmail.com
( ३०३ ) इतश्च न प्रधान प्रधान को कारण मानना इसलिए भी कठिन है कि- श्रुतत्वाच्च १।१।१२॥ श्रुतमेव हि अस्यामुपनिषदि अस्य सच्छब्दवाच्यस्य आत्मत्वेन, नामरूपयोर्व्याकर्त्तृत्वं,सर्वज्ञत्वं,सर्वशक्तित्वं,सर्वाधारत्वं अपहतपाप्म- त्वादिकं, सत्यकामत्वं, सत्यसंकल्पत्वं च-“अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”-सन्मूलाःसौम्येमाःसर्वाःप्रजाःसदायतनाःसत्प्र- तिष्ठाः-“ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा”यच्चास्येहास्ति- यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितम् तस्मिन् कामान्त्समाहिताः- “एष आत्मा अपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः” इति । इस उपनिषद् में,इस सत् शब्द वाच्य की,आत्मारूप से नाम और रूप की व्याकृति, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिसंपन्नता, सर्वाधारकता, निर्दोषता, निष्पापता, सत्यकामता सत्यसंकल्पता आदि स्पष्टतः बतलाई गई है-जैसे- “इसमें जीवात्मारूप से प्रविष्ट होकर नामरूप का विस्तार करूँगा”- “सत् ही इस प्रजा का मूल आश्रय और प्रतिष्ठा है”-“सारी वस्तुएं सदात्मक ही है,वही सत्य और आत्मा है”-“इस जगत में जो कुछ भी विद्यमान है,या जो कुछ नहीं( अतीत)है,वह सब परमात्मा में ही समाहित (लीन)है,संपूर्ण कामनायें और अभिलाषायें भी उन्हीं में प्रविष्ट हैं”- “यह आत्मा निष्पाप,जरा मृत्यु शोक तथा भूख प्यास रहित,सत्य काम और सत्यसंकल्प है” तथा च श्रुत्यंतराणि-“ न तस्यकश्चित् पतिरस्य लोके न चेशिता नैव च तस्य लिंगम्, स कारणंकरणाधिपाधिपो न चास्य कश्चित् जनिता न चाधिपः”-“सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानिकृत्वाऽभिवदन्यदास्ते”-“अन्तःप्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वा
( ३०४ ) त्मा''-''विश्वात्मानं परायणम्''-''पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्''-यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा, अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः-“एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एकोनारायणः” इत्यादीनि । तस्माज्जगत्कारणवादिवाक्यं न प्रधानादिप्रतिपादनयोग्यम् । अतः सर्वज्ञः सर्वेश्वरो निरस्ता- निखिलदोषगन्धोऽनवधिकातिशय असंख्येयकल्याणगुणगणौघम- हार्णवः पुरुषोत्तमो नारायण एव निखिल जगदेककारण जिज्ञास्य ब्रह्मेति स्थितम् । तथा अन्य श्रुतियाँ भी-“इस जगत में उनका कोई स्वामी और शासक नहीं है न उनका ज्ञापक कोई चिन्ह ही है वही एकमात्र कारणा- धिपतियों के अधिपति हैं उनका कोई अधिपति जनक या प्रतिपालक नही है। वह धीर (अविकृतात्मा) ईश्वर ही समस्त रूप संपन्न वस्तुओं का विस्तार करके,उन वस्तुओं का नाम तथा नामों का व्यवहार करके, उनमें स्थित है। वही प्राणिमात्र के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर, शासन करते हैं, इसलिए सर्वात्मा हैं। विश्वात्मा, परमाश्रय, जगत्पति, आत्मा के स्वामी को जानो । इस जगत में जो कुछ भी पदार्थ दीखते या सुनाई पड़ते हैं, नारायण उन सब में बाहर और भीतर विद्यमान हैं। ये नारायण ही प्राणिमात्र के अन्तरात्मा, निष्पाप, अलौकिक, प्रकाशमय और एक है।” इस प्रकार सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, सर्वेश्वर, निर्दोष, असंख्य अपरिमित अपार कल्याणकर गुणों के महासागर पुरुषोत्तम नारायण को ही समस्त जगत का एकमात्र कारण बतलाती हैं, वही जिज्ञास्य ब्रह्म हैं। उक्त जगत् कारणादि के बोधक वाक्य, प्रधानादि के प्रतिपादन के योग्य कदापि नहीं हैं। अतएव निर्विशेषचिन्मात्रब्रह्मवादोऽपि सूत्रकारेण आभिः श्रुतिभिः निरस्तो वेदितव्यः, पारमार्थिकमुख्येक्षणादिगुणयोगि जिज्ञा- स्यं ब्रह्मेति स्थापनात् । निर्विशेषवादे हि साक्षित्वमप्यपारमार्थिकं वेदांतवेद्यंब्रह्म जिज्ञास्यतयाऽप्रतिज्ञातम् । तच्च चेतनमिति ईक्षते- ankurnagpal108@gmail.com
( ३०५ ) न॑ाशब्दम्-इत्यादिभिः सूत्रैः प्रतिपाद्यते । चेतनत्वं नाम चैतन्यगुणयोगः। अत ईक्षणगुणविरहिणः प्रधानतुल्यत्वमेव ऐसे ही, निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म का पोषक शांकरमत भी सूत्रकार द्वारा प्रस्तुत इन श्रुतियों से निरस्त जानना चाहिए, क्यों कि-सूत्रकार ने वास्तविक ईक्षण आदि गुण संपन्न ब्रह्म को ही जिज्ञास्य ब्रह्म रूप से सिद्ध किया है। निर्विशेषवाद में, अवास्तविक साक्षीवाले ब्रह्म को वेदांतवेद्य जिज्ञास्य, सिद्ध किया गया है। और उसे ही चेतन रूप से “ईक्षतेर्नाशब्दम्" इत्यादि सूत्रों से समर्थन किया गया है। जब कि- चैतन्यगुणयोग ही चैतन्यता है, तब यदि ये लोग ईक्षण को गुण नहीं मानते तो इनका मत भी प्रधानकारणवादी सांख्य के समान ही अप्रामाणिक है। किंच-निर्विशेषप्रकाशमात्रब्रह्मवादे तस्य प्रकाशत्वं अपि दुरुपपादम् । प्रकाशो हि नाम स्वस्य परस्य च व्यवहारयोग्यता- मापायन् वस्तुविशेषः । निर्विशेषस्य वस्तुनस्तदुभयरूपत्वाभावात् घटादिवाचित्वमेव । तदुभयरूपत्वाभावेऽपि तत्क्षमत्वमस्तीति चेत्, तन्न, तत्क्षमत्वं हि तत् सामर्थ्यमेव । सामर्थ्यगुणयोगे हि निर्विशेष- वाद : परित्यक्तःस्यात् । एक बात और है कि-ब्रह्म को निर्विशेष प्रकाशमात्र कहने से उसके प्रकाशत्व का उपपादन नहीं होता क्यो कि- स्वतःऔर दूसरे की व्यवहारयोग्यता संपादक वस्तु विशेष को प्रकाश कहते हैं। इस प्रकार प्रकाशत्व एक गुण हो जाता है जो कि-निर्विशेष वस्तु की भी जडता ही सिद्ध होती है। यदि कहा जाय कि- स्व-परव्यवहार्यता रूप अवस्थाओं के विना भी निर्विशेष में प्रकाशन क्षमता है,तो ऐसा कथन भी उक्त मत के विरुद्ध होगा, क्यों कि- क्षमता भी एक गुण ही तो है। इसलिए निर्विशेषमत भी त्याज्य है । अथ श्रुतिप्रामाण्यादयमेको विशेषोऽभ्युपगम्यत, इति चेत्,हन्त तर्हि तत एव सर्वज्ञता, सर्वशक्तित्वं' सर्वेश्वरत्वं, सर्वकल्याणगुणा-
( ३०६ ) करत्वं सकलहेयप्रत्यनी`त्यादयः सर्वेऽभ्युपगन्तव्याः । शक्तिमत्व च कार्यविशेषानुगुणत्वं, तच्चकार्यविशेषनिरूपणीयम्, कार्यविशेषस्य निष्प्रमाणकत्वे तदेकनिरूपणीय शक्तिमत्वमपि निष्प्रमाणकं स्यात् । यदि यह कहो कि-श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर हम उनके क्षमता- गुण को स्वीकार करते हैं, तब तो प्रसन्नता का विषय है तब तो सर्व- ज्ञता, सर्वेश्वरता, शक्तिमत्ता, सर्वकल्याणगुणाकरता निर्दोषता आदि गुण विशेषणों, को भी श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर स्वीकारोगे ही; शक्तिमत्ता का अर्थ होता है, कार्य विशेष की अनुगुणता, जो कि-कार्य विशेष में ही निरूपित होती है। कार्य विशेष के अप्रामाणिक हो जाने पर वह भी अप्रामाणिक हो जाती है। किंच-निर्विशेषवस्तुवादिनो वस्तुत्वमपिनिष्प्रमाणम् प्रत्यक्षानु- मानागमस्वानुभवाः सविशेषगोचरा इति पूर्वमेवोक्तम् । तस्मात् विचित्रचेतनाचेतनात्मकजगद्रूपेण “बहुस्याम्” इतीक्षणक्षमः पुरुषोत्तम एव जिज्ञास्य इति सिद्धम् । अधिक क्या-निर्विशेषवस्तुवादियों की वस्तु भी अप्रामाणिक है। प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र और अनुभव सभी प्रमाणों से सगुण ब्रह्म ही दृष्टिगोचर होता है, ऐसा पहिले भी कह चुके है। विचित्र जडचेतन जगत रूप से “अनेकहोने” का संकल्प करने वाला पुरुषोत्तम ही जिज्ञास्य ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होता है। ६ अधिकरण— एवं जिज्ञासितस्य ब्रह्मणश्चेतनभोग्यभूतजडरूपसत्त्वरजस्त- मोमयप्रधानाद् व्यावृत्तिरुक्ता, इदानीं कर्मवश्यात् त्रिगुणात्मक प्रकृतिसंसर्गनिमित्तनानाविधानन्तदुःखसागरनिमज्जनेनाशुद्धाच्छुद्धाच्च प्रत्यगात्मनोऽप्यखिलहेयप्रत्यनीकनिरतिशयानन्दं ब्रह्मेति प्रतिपाद्यते । ankurnagpal108@gmail.com
( ३०७ ) अब तक-चेतन भोग्य ,जडस्वभाव, सत्त्वरज तमोमय प्रधान से, पूर्वजिज्ञासित ब्रह्म की व्यावृत्ति (पृथकता) बतलाई गई । अब शुभाशुभ कर्मों से वशीभूत,त्रिगुणात्मक प्रकृति संबंध से अनेक प्रकार के दुःखों के सागर में निमग्न, बद्ध और मुक्त जीवों से, ब्रह्म की पृथकता, हेयगुण रहित और निरतिशय आनंद रूप से बतलाई जावेगी । आनन्दमयोऽभ्यासात् १।१।१३॥ तैत्तरीया अधीयते “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः” इति प्रकृत्य “तस्माद्वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तरआत्मा आनंदमयः” इति । तत्र सन्देहः-किमयानंदमयोः बंधमोक्षभागिनः प्रत्यगा- त्मनो जीवशब्दाभिलपनीयादन्यः परमात्मा, उत स एव ? इति । तैत्तरीयोपनिषद् में “वह पुरुष अन्नरसमय है” ऐसा कहकर इस विज्ञानमय से भी सूक्ष्म एक दूसरा अन्तरात्मा आनंदमय है” ऐसा कहागया । इस पर संदेह होता है कि-यह आनंदमय कौन है ? बंधन मुक्ति वाला प्रत्यगात्मा जो कि जीव नाम से जाना जाता है, वह है अथवा उससे श्रेष्ठ परमात्मा है ? किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः ? “तस्यैष एव शारीर आत्मा” इत्यानन्दमयस्य शारीरत्वश्रवणात् । शारीरो हि शरीर संबंधी जीवात्मा एव । दोनों में कौन हो सकता है ? विचारने पर तो जीवात्मा ही प्रतीत होता है, क्योंकि-“वह शरीर धारक ही यह आत्मा है” इस वाक्य में आनंदमय के लिए शरीर कहा गया है । शरीर संबंधी जीवात्मा ही, निश्चित होता है । ननु च जगत कारणतया प्रतिपादितस्य ब्रह्मणः सुखप्रति- पत्त्यर्थमन्नमयादीननुक्रम्य तदेव जगत्कारणमानंदमय इत्युपदिशति, जगत्कारणं च “तदैक्षत” इतीक्षणश्रवणात् सर्वज्ञः सर्वेश्वरः इत्युक्तम् । ankurnagpal108@gmail.com
( ३८८ ) (प्रतिवाद) नही; जगत कारण के रूप से प्रतिपादित ब्रह्म को सरलता पूर्वक जाना जा सके इसलिए अन्नमयादि रूपों से कहते हुए अंत में आनंदमय को ही जगत का कारण बतलाया गया और उसकी जगत् कारणता को, “उसने संकल्प किया” इस वाक्यगत ईक्षण क्रिया के आधार पर उसे सर्वज्ञ सर्वेश्वर बतलाते हुए सिद्ध किया गया है । सत्यमुक्तम्—स तु जीवान्नातिरिच्यते—“अनेन जीवेनात्मनाऽनु- प्रविश्य”—“तत्त्वमसि श्वेतकेतो” इति कारणतया निर्दिष्टस्य जीव सामानाधिकरण्यनिर्देशात् । सामानाधिकरण्यं हि एकत्वप्रति- पादनपरम् । यथा “सोऽयं देवदत्तः” इत्यादौ । ईक्षापूर्विका च सृष्टिश्चेतनस्य जीवस्योपपद्यत एव । अतः 'ब्रह्मविदाप्नोतिपरं” इति जीवस्याचित्संसर्गवियुक्तं स्वरूपं प्राप्यतयोपदिश्यते । अचिद्वियुक्तस्वरूपस्य लक्षणमिदमुच्यते—“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इति । तद्रूपप्राप्तिरेव हि मोक्षः । “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रिया- प्रियोरपहतिरस्ति, अशरीरंवाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” इति । श्रतो जीवस्याविद्यावियुक्तं स्वरूपं प्राप्यतया प्रक्रान्तमानंदमय इत्युपदिश्यते । (वाद) आप तो ठीक कह रहे हैं—वह ब्रह्म जीव से भिन्न है कहाँ ? जैसा कि—“जीव ब्रह्म से स्वयं प्रविष्ट होकर” तथा “श्वेतकेतु तू वही है” इन वाक्यों में कारण रूप से निर्दिष्ट जीव रूप का सामाना- धिकरण्य दिखलाया गया है । अभिन्नता का प्रतिपादन ही सामानाधिरण्य है । जैसेकि “यह वही देवदत्त है” इत्यादि में सामानाधिकरण्य दिखलाया जाता है ईक्षा पूर्विका सृष्टि चैतन्य जीव की ही बतलाई गई है । “ब्रह्मवेत्ता परता प्राप्त करता है” ऐसे जीव के, जडसंसर्ग रहित स्वरूप को प्राप्य बतलाया गया है । जड संसर्ग रहित स्वरूप का लक्षण इस प्रकार बतलाया गया कि—“ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” । वस्तुतः उस ब्रह्म के रूप की प्राप्ति ही तो मोक्ष है । जैसा कि इस वाक्य से स्पष्ट हो जाता है—‘शुभ और अशुभ जन्य पाप पुण्य, शरीर रहते हुए समाप्त ankurnagpal108@gmail.com
( ३०६ ) नही होते, शरीर रहित होने पर पाप पुण्य (जीव का) स्पर्श नहीं कर सकते।” इससे ज्ञात होता है कि-जीव के अविद्या रहित स्वरूप को प्राप्य बतलाते हुए उसे ही आनंदमय बतलाया गया है। तथा हि-शाखाचन्द्रन्यायेनात्मस्वरूपं दर्शयितुं “अन्नमयः पुरुषः” इति शरीरं प्रथमं निर्दिश्य तदन्तर्भूतं तस्य धारकं पञ्चवृत्तिप्राणं, तस्याप्यन्तर्भूतं मनः, तदन्तरभूतां च बुद्धिं, “प्राणमयो-मनोमयो-विज्ञानमयो” इति तत्र तत्र बुद्ध्यवतरणक्रमेण निर्दिश्य, सर्वान्तिर्भूतं जीवात्मानं “अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः” इत्युपदिश्य अन्तरात्मपरम्परां समापयति । अतो जीवात्मस्वरूपमेव “ब्रह्मविदाप्नोति” इति प्रक्रान्तं ब्रह्म, तदेवानन्दमय इत्युपदिष्टमिति निश्चीयते । तथा शाखा चन्द्र न्याय से आत्मा के स्वरूप को बतलाने के लिए “अन्नमयः पुरुषः” कहकर सर्व प्रथम स्थूल शरीर को बतलाकर, उसके अन्तर्भूत, उसके धारक पंच प्रवृत्ति वाले प्राण प्राणके अन्तर्भूत मन और उसके अन्तर्भूत बुद्धि को “प्राणमय मनोमय विज्ञानमय” रूप से बुद्धि ग्राह्य कराते हुए, सबके अन्तर्भूत जीवात्मा को “अन्योऽन्तर आत्मा आनंदमयः” बतला कर अन्तरात्म परम्परा के उपदेश को समाप्त किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि-जीवात्मा ही “ब्रह्मवेत्ता परता प्राप्त करता है” इस नियम के अनुसार, प्राप्य ब्रह्म है, उसे ही आनन्दमय रूप से बतलाया गया है। ननु च-“ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा” इत्यानन्दमयादन्यद्ब्रह्मेति प्रतीयते । नैवं-ब्रह्मैव स्वस्वभावविशेषेण, पुरुषविधत्वरूपितं शिरः पक्षपुच्छरूपेणाप्यपदिश्यते । यथा अन्नमयो देहोऽवयवी स्वस्माद- नतिरिक्तैः स्ववाक्यैरेव “तस्येदमेव शिरः” इत्यादिना शिरः-पक्ष-पुच्छ वत्तया निदर्शितः । तथा आनंदमयं ब्रह्मापि स्वस्मादनतिरिक्तैः प्रियादिभिर्निदर्शितम् । तत्रावयवत्वेन निरूपितानां प्रिय-मोद प्रमो- ankurnagpal108@gmail.com
-like curve, loop/turn, horizontal connector, and right vertical line!
Wait! Look at that character in line 25:
Does it have a left curve like स?
YES! Look at it:
It curves down-left, has a little diagonal down, a horizontal bar going to a vertical line!
WAIT! Is it स?
प र स?? No, with an ा matra: सा?? परसा? No!
Wait, what about त?
Wait, look at स in सत्य: स त् य.
What about स in सकल (line 19): स क ल.
Look at स in स्व (line 8): स व.
Look at स in से (line 8): स े.
Now look at the letter in line 25:
Left part: round, curves down, horizontal connector, vertical bar... wait, does it have ा? सा?
Wait, what Hindi word could परसा be? "परसा"? No, in Rajasthani/Braj "परस" = touch/sparsha, but this is modern standard Hindi!
Wait! Could it be परम?
Why would someone write `
( ३११ ) वाले अन्नमयादि वाक्य में, एक एक के अन्तरात्मा रूप से प्राणमय आदि को, आत्मा स्वरूप दिखला कर "इनसे भिन्न आत्मा अन्तर्यामी आनन्दमय है" उस आत्मा के निर्देश को आनंदमय में लाकर समाप्त किया गया है। इस से ज्ञान होता है कि-आत्म शब्द से निर्दिष्ट ब्रह्म नामवाला ही आनंदमय है। ननु च—"ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा" इत्युक्त्वा "असन्नेव स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेत् , अस्तिब्रह्मेति चेद्वेद, संतमेनं ततो विदुः" इति ब्रह्म ज्ञानाज्ञानाभ्यामात्मनः सद्भावासद्भावौ दर्शयति, नानंदमयज्ञानाज्ञानाभ्याम् । न चानंदमयस्य प्रियमोदादिरूपेण सर्व- लोकविदितस्य सद्भावासद्भावज्ञानाशंका युक्ता । अतो नानन्द- मयमधिकृत्यायं श्लोक उदाहृतः । तस्मादानंदमयादन्यद् ब्रह्म । (शंका की जाती है कि—) उक्त प्रसंग में "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" ऐसा कहने के बाद कहा गया कि—"ब्रह्म को यदि असत् कहते हो तो वह निश्चित ही असद् हो जावेगा, यदि उसे सद् कहते हो तो, इसे भी सत् ही मानों" इस श्रुति में— ब्रह्म ज्ञान और अज्ञान से, आत्मा का सद्भाव और असद्भाव दिखलाया गया है, आनंदमय के ज्ञान और अज्ञान की तो चर्चा भी नहीं है। आनंदमय की, प्रिय मोद आदि रूपों से, लोक प्रसिद्ध सद्भाव और असद्भाव ज्ञानवाली प्रतीकता, दिखलाई गई हो ऐसा भी नहीं कह सकते। इससे निश्चित होता है कि-यह श्लोक, आनंदमय के लिए नहीं कहा गया है। आनंदमय से भिन्न ब्रह्म के लिए ही कहा गया प्रतीत होता है, इसलिए आनंदमय से भिन्न ही ब्रह्म है। नैवम्—"इदं पुच्छं प्रतिष्ठा"—पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा—"अथर्वां- गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा"—"महः पुच्छं प्रतिष्ठा" इत्युक्त्वा तत्रतत्रो- दाहृताः। "अन्नाद् वै प्रजाः प्रजायंते" इत्यादिश्लोकाः यथा न पुच्छमात्रप्रतिपादनपराः, अपि तु अन्नमयादिपुरुष प्रतिपादनपराः; एवमत्रापि आनन्दमयस्यायं "असन्नेव" इतिश्लोकः। नानन्दमय- व्यतिरिक्तस्य पुच्छस्य। आनंदमयस्यैव ब्रह्मत्वेऽपि प्रियमोदादिरूपेण रूपितस्यापरिच्छिन्नानंदस्य सद्भावासद्भावज्ञानाशंका युक्तैव।
( ३१२ ) (समाधान) बात ऐसी नही है- उसी श्रुति में आगे चल कर “यह पुच्छ बसने का आधार है, पृथिवी मे भी वही आधार है, आगिरस गोत्रीय अथर्ववेद के मत्रद्रष्टा मे वही आधार है, तथा बुद्धिगत चिदाभास मे भी वह आधार है” ऐसा कहते हुए, उदाहरण प्रस्तुत किये गए है । ‘अन्नाद वै प्रजाः प्रजायते’’ इत्यादि श्लोक जैसे केवल पुच्छ मात्र के प्रतिपादक नही हैं अपितु अन्नमयादि पुरुष के प्रतिपादक है, वैसे ही आनंदमय के प्रकरण में भी “असन्न एव” इत्यादि श्लोक आनंदमय पुरुष का प्रति- पादक है, अन्य पुच्छ का प्रतिपादक नही है । आनंदमय मे ब्रह्मत्व होते हुए भी, प्रिय, मोद आदि रूपों से रूपित अपरिच्छिन्न आनंद की सद्भाव और असद्भाव सबंधी आशंका युक्ति युक्त ही है । पुच्छब्रह्मणोऽप्यपरिच्छिन्नानंदतयैव हि अप्रसिद्धता । शिरः प्रभृत्यवयववित्वाभावादब्रह्मणो नानंदमयो ब्रह्मेति चेत्-ब्रह्मणः पुच्छ्त्वप्रतिष्ठात्वाभावात् पुच्छमपि ब्रह्म न भवेत् । अथाविद्यापरि- कल्पितस्य वस्तुनस्तस्याश्रयभूतत्वात् ब्रह्मणः पुच्छं ऽप्रतिष्ठेति रूपण- मात्रमित्युच्येत, हन्त र्तहि तस्यासुखाद्व्यावृत्तस्यानंदमयस्य ब्रह्मणः प्रियशिरस्त्वादिरूपणं भविष्यति । एवं च “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” इति विकारास्पदजऽपरिच्छिन्नवस्वंतरव्यावृत्तस्यासुखाद्व्यावृत्ति- रानन्दमय इत्युपदिश्यते । ततश्चाखण्डैकरसानन्दरूपे ब्रह्मण्यानंदमय इति मयट् प्राणमय इव स्वार्थिको दृष्टव्यः। तस्मादविद्यापरिकल्पित- विविधविचित्रदेवादिभेदभिन्नस्य जीवात्मनः स्वाभाविकं रूपम् खंडैकरसं सुखैकतानमानंदमय इत्युच्यत इत्यानंदमयः प्रत्यगात्मा । पुच्छ ब्रह्म की अपरिच्छिन्न आनंद रूप से प्रसिद्धि नही है । यदि कहा जाय कि- शिर इत्यादि अवयवो के अभाव से ब्रह्म, 'आनंदमय ब्रह्म,' नही हो सकता । तब तो ब्रह्म में पुच्छत्व के अभाव होने से, पुच्छ ब्रह्म भी, ब्रह्म नहीं हो सकता । यदि कहें कि-अविद्या परिकल्पित वस्तु के आश्रयभूत होने से ब्रह्म की "पुच्छ प्रतिष्ठा" इस रूपक से वर्णन किया गया है-(ब्रह्म के अवयव वास्तविक नहीं हैं) तब तो-दुःख रहित ankurnagpal108@gmail.com
( ३१३ ) आनंदमय ब्रह्म के, प्रिय-शिर आदि अवयव भी रूपक ही हो जायेंगे। इसी प्रकार "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म" इस वाक्य में, विकारास्पद जड परिच्छिन्न पदार्थ से पृथक्, परिष्कृत सुख से पूर्ण आनंदमय का उपदेश दिया गया है। तथा अखण्डैकरस आनंदरूप ब्रह्म में प्रयुक्त आनंदमय शब्द में जो मयट् प्रत्यय है वह, प्राणमय की तरह, स्वार्थिक जानना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि-अविद्या परिकल्पित, विविध विचित्र देवादि भेदों वाले जीवात्मा की स्वाभाविक अखण्डैकरस रूप की सुखैकतानता को ही "आनन्दमय" नाम से बतलाया गया है, इसलिए जीवात्मा ही आनंदमय है। एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे-आनंदमयोऽभ्यासात्-आनंदमयः परमात्मा कुतः ? अभ्यासात् । "सैषाऽनंदस्य मीमांसा भवति" इत्यारभ्य 'यतोवाचोनिवर्त्तन्ते" इत्येवमंतेन वाक्येन शतगुणितोत्तरक्रमेण निरतिशयदशाशिरस्कोऽभ्यस्यमान आनंदः अनंतदुःखमिश्रपरिमित- सुखलवभागिनि जीवात्मनि असंभवन् निखिलहेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानसकलेतरविलक्षणं परमात्मानमेव स्वाश्रयमावेदयति । सिद्धान्तः-इस प्रकार के विचार के समक्ष आने पर अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं- "आनंदमयोऽभ्यासात्" अर्थात् आनंदमय परमात्मा ही है, क्यों कि-शास्त्र में उसके लिए ही पुनः पुनः आनंदमय शब्द का प्रयोग किया गया है। "सैषा आनंदस्य मीमांसा भवति" से प्रारंभ कर "यतो वाचो निवर्त्तन्ते" इस अंतिम वाक्य तक शतगुणितोत्तर क्रम से जिस निरतिशय श्रेष्ठतम मूर्धन्यदशा को बार बार आनंद नाम से कहा गया है वह, अनंत दुःख संवलित, परिमित लवमात्र सुख को प्राप्त करने वाले जीवात्मा में नितान्त असंभव है। वह तो समस्त हीन दोषों से रहित कल्याणैकतान समस्त अन्यान्य पदार्थों से विलक्षण परमात्मा में ही संभव है, आनंद का एकमात्र आश्रय परमात्मा ही है। यथाह-"तस्माद्वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तरात्मा आनंदमयः" इति विज्ञानमयो हि जीवः, न बुद्धिमात्रम्, मयट् प्रत्ययेन व्यतिरेकप्रतीतेः । प्राणमयेत्यवगत्वा स्वार्थीयकताऽश्रीयते । ankurnagpal108@gmail.com
( ३१४ )
इह तु तद्वतो जीवस्य संभवान्नानर्थक्य न्याय्यम् । बद्धो मुक्तश्च प्रत्यगात्मा ज्ञातैवेत्यभ्यधिष्महि । प्राणमयादौ च मयडर्थसंभवो ऽनन्तरमेव वक्ष्यते । कथं तर्हि विज्ञानमयविषयश्लोके “विज्ञानं यज्ञं तनुते” इति केवल विज्ञानशब्दोपादानं उपपद्यते । ज्ञातुरेवाऽत्मनः स्वरूपमपि स्व प्रकाशतया विज्ञानमित्युच्यत इति न दोषः, ज्ञानैक- निरूपणीयत्वाच्च ज्ञातुःस्वरूपस्य स्वरूपनिरूपणधर्मशब्दा हि धर्म- मुखेन धर्मिस्वरूपमपि प्रतिपादयन्ति गवादिशब्दवत् ।
जैसा कि-उसी आनंद तत्त्व के व्याख्यान के प्रसग मे कहा गया कि-“विज्ञानमय से भिन्न उसका अंतरात्मा अ'नदमय है” इसमे विज्ञान मय का तात्पर्य जीवात्मा है, केवल बुद्धि ही नही है, मयट् प्रत्यय से ही जीवात्मा और बुद्धि की पृथकता होती है (अर्थात् केवल विज्ञान शब्द बुद्धिवाचक है, मयट् प्रत्यय युक्त विज्ञानमय शब्द जीव वाचक है) प्राणमय शब्द में शब्द के अर्थ की कोई दूसरी गति नही है, इसलिए वहाँ उसका विकारार्थ ही ग्राह्य होगा (प्राण बहुलता ऐसा अर्थ हो नहीं सकता) विज्ञानमय शब्द मे तो, जीव मे विज्ञानवत्ता संभव है, इसलिए मयट् का विकारार्थ करना अनर्थ होगा। बद्ध एवं मुक्त जीवात्मा मे जो ज्ञातापन है, विज्ञानमय शब्द, उसी का द्योतक है। प्राणमय आदि शब्दों में मयट् का प्राचुर्यार्थ घटाना असंभव है, ऐसा अन्यत्र कहते हैं ।
(शंका) यदि ऐसा है तो-विज्ञानमय संबंधी श्लोक में “विज्ञान ही यज्ञ का विस्तार करता है” ऐसा, केवल विज्ञान शब्द का ही उपादान क्यों किया गया है ? (समाधान) इससे कोई अन्तर नहीं आता, क्यों कि- विज्ञाता आत्मा का स्वरूप स्वप्रकाश है, इसलिए उसे केवल “विज्ञान शब्द से भी बतला दिया गया। ज्ञाता का स्वरूप ज्ञान द्वारा ही निरूपित हो सकता है। धर्मों के स्वरूप के निरूपक शब्द, जो कि-उसके धर्म का बोध कराते है वह गौ शब्द की तरह हैं, अर्थात् सास्नालांगूलककुदखुर- विषाण आदि चिन्हों को धारण करने वाला जो जीव है उसे गौ कहते हैं, इसी तरह विज्ञान शब्द ‘ज्ञान को धारण करने वाला जीवात्मा है’ इस तथ्य का निरूपण करता है ।
( ३१५ ) “कृत्यल्युटो बहुलम्” इति वा कर्त्तरिल्युडाश्रीयते । नंद्यादित्वं वाऽश्रित्य “नंदिग्रहि” इत्यादिना कर्त्तरि ल्युः । अतएव च “विज्ञानं यज्ञं तनुते” कर्माणि तनुतेऽपि च ‘ इति यज्ञादि कर्त्तृत्वं विज्ञानस्य श्रूयते । बुद्धिमात्रस्य हि न कर्त्तृत्वं संभवति । अचेतनेषु हि चेतनोप- करणभूतेषु विज्ञानमयात् प्राचीनेष्वन्नमयादिषु न चेतनधर्मभूतं कर्त्तृत्वं श्रूयते । अतएव च चेतनमचेतनंच स्वासाधारणैः निलयनत्वा- निलयत्वादिभिर्धर्मविशेषैर्विभज्य निर्दिशद्वाक्यं “विज्ञानं चाविज्ञानं च” इति विज्ञान शब्देन तद्गुणं चेतनं वदति । व्याकरणीय “कृत्यल्युटोबहुलम्” इस नियम से कर्त्तृवाच्य में ल्युट प्रत्यय के आश्रय से, तथा नंद्यादि धातुओं के पाठ में ज्ञा धातु के पाठ होने से “नंदिग्रहि” इत्यादि व्याकरणीय नियम से कर्त्तृवाच्य में “ल्यु” प्रत्यय करके तथा व्याकरणीय नियम से ल्यु को अन् प्रत्यय करने से ज्ञान शब्द निष्पन्न होता है । इसीलिए “विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च” इस वाक्य में यज्ञादिकर्म का कर्त्तृत्व विज्ञान का बतलाया गया । केवल बुद्धि में तो कर्त्तृत्व संभव है नहीं । उक्त प्रसंग में विज्ञानमय के पूर्ववर्त्ती अन्नमय आदि में तो चेतन धर्म की कोई चर्चा ही नहीं है। जो कि, चेतन के उपकरण स्वरूप हैं। विज्ञान शब्द का चेतन अर्थ करने के लिए ही, निलयता (विश्वाधारत) अनिलयता आदि असाधारण स्वीय धर्म विशेष द्वारा विभक्त, चेतन और अचेतन, के निर्देशक “विज्ञानं चाविज्ञानं” वाक्य में, विज्ञान शब्द से, विज्ञान गुणसंपन्न चेतन को बतलाया गया है । तथाऽन्तर्यामि ब्राह्मणे ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्” इत्यस्य काण्व- पाठगतस्य पर्यायस्य स्थाने ‘य आत्मनि तिष्ठन्” इति पर्यायम धीयाना माध्यन्दिनः काण्वपाठगतं विज्ञानशब्द निर्दिष्टं जीवात्मेति स्फुटीकुर्वन्ति । विज्ञानं इति च नपुंसकलिंगं वस्तुत्वा- भिप्रायं, तदेवं विज्ञानमयात् जीवात् अन्यस्तदन्तरः परमात्मा आनंदमयः ।
३. द्वितीयाध्याय: अविरोधाध्याय (प्रधान, परमाणु, शून्यवाद खण्डन व जीव-ब्रह्म सम्बन्ध)
( ३१६ ) तथा इसी प्रकार काण्वशाखोक्त अन्तर्यामी ब्राह्मण के “जो विज्ञान में अवस्थान करता है” इस वाक्य में जिसे “विज्ञान” शब्द से निर्देश किया गया है, उसे ही माध्यन्दिन शाखीय “जो आत्मा में अवस्थान करता है” इस वाक्य में “आत्मा” शब्द से बतलाया गया, इस प्रकार विज्ञान का पर्यायवाची शब्द आत्मा सिद्ध होता है जिससे विज्ञान का अर्थ जीवात्मा सुस्पष्ट है । विज्ञान शब्द का जो नपुंसक लिंग में प्रयोग किया गया है, वह वस्तुत्व का बोधक है । इससे निर्णय होता है कि— विज्ञानमय जीव से अतिरिक्त कोई विज्ञानमय का अन्तरात्मा परमात्मा आनंदमय है । यद्यपि “विज्ञानं यज्ञं तनुते” इति श्लोके ज्ञानमात्रमेवोपादी- यते, न ज्ञाता, तथाऽपि “अन्योन्तरात्मा विज्ञानमयः” इतितद्वान् ज्ञातैवोपदिश्यते, यथा— “अन्नाद् वैः प्रजाः प्रजायंते” इत्यत्र श्लोके केवलान्तोपादानेऽपि “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः” इत्यत्र नान्नमात्रं निर्दिष्टम्, अपि तु तन्मयः तद्विकारः । एतत् सर्वं हृदि निधाय सूत्र- कारः स्वयमेव “भेदव्यपदेशात्” इत्यनन्तरमेव वदति । यद्यपि-- विज्ञान यज्ञ का विस्तार करता है” इस वाक्य में ज्ञान मात्र का ही उपादान किया गया है, ज्ञाता का नहीं, फिर भी “भिन्न ही कोई अन्तरात्मा है, जो कि विज्ञानमय है” इस वाक्य में विज्ञानमय ज्ञाता (जीव) का ही निर्देश किया गया है । जैसे कि--“अन्न से ही प्रजा का जन्म होता है’ इस श्लोक में केवल अन्न को उपादान बतलाया गया है तथा “वही यह पुरुष अन्नरसमय है” इस वाक्य में अन्नमय के विकृतदेह का उल्लेख किया गया है । इन सभी बातों को हृदयंगम करके सूत्रकार ने स्वयं ही “भेदव्यपदेशात्” सूत्र में जीवात्मा-परमात्मा की भिन्नता स्पष्ट बतला दी है । यदुक्तं जगत्कारणतया निर्दिष्टस्य “अनेनेजीवेनात्मनाऽनु-
- प्रविश्य “तत्वमसि” इति च जीवसामानाधिकरण्यनिर्देशाज्जगत् कारणमपि जीवस्वरूपान्नातिरिच्यत इति कृत्वा जीवस्यैव स्वरूपं “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” इति प्रक्रान्तमसुखाद्व्यावृत्तत्वेनानंदमय ankurnagpal108@gmail.com