भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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इह तु तद्वतो जीवस्य संभवान्नानर्थक्य न्याय्यम् । बद्धो मुक्तश्च प्रत्यगात्मा ज्ञातैवेत्यभ्यधिष्महि । प्राणमयादौ च मयडर्थसंभवो ऽनन्तरमेव वक्ष्यते । कथं तर्हि विज्ञानमयविषयश्लोके “विज्ञानं यज्ञं तनुते” इति केवल विज्ञानशब्दोपादानं उपपद्यते । ज्ञातुरेवाऽत्मनः स्वरूपमपि स्व प्रकाशतया विज्ञानमित्युच्यत इति न दोषः, ज्ञानैक- निरूपणीयत्वाच्च ज्ञातुःस्वरूपस्य स्वरूपनिरूपणधर्मशब्दा हि धर्म- मुखेन धर्मिस्वरूपमपि प्रतिपादयन्ति गवादिशब्दवत् ।

जैसा कि-उसी आनंद तत्त्व के व्याख्यान के प्रसग मे कहा गया कि-“विज्ञानमय से भिन्न उसका अंतरात्मा अ'नदमय है” इसमे विज्ञान मय का तात्पर्य जीवात्मा है, केवल बुद्धि ही नही है, मयट् प्रत्यय से ही जीवात्मा और बुद्धि की पृथकता होती है (अर्थात् केवल विज्ञान शब्द बुद्धिवाचक है, मयट् प्रत्यय युक्त विज्ञानमय शब्द जीव वाचक है) प्राणमय शब्द में शब्द के अर्थ की कोई दूसरी गति नही है, इसलिए वहाँ उसका विकारार्थ ही ग्राह्य होगा (प्राण बहुलता ऐसा अर्थ हो नहीं सकता) विज्ञानमय शब्द मे तो, जीव मे विज्ञानवत्ता संभव है, इसलिए मयट् का विकारार्थ करना अनर्थ होगा। बद्ध एवं मुक्त जीवात्मा मे जो ज्ञातापन है, विज्ञानमय शब्द, उसी का द्योतक है। प्राणमय आदि शब्दों में मयट् का प्राचुर्यार्थ घटाना असंभव है, ऐसा अन्यत्र कहते हैं ।

(शंका) यदि ऐसा है तो-विज्ञानमय संबंधी श्लोक में “विज्ञान ही यज्ञ का विस्तार करता है” ऐसा, केवल विज्ञान शब्द का ही उपादान क्यों किया गया है ? (समाधान) इससे कोई अन्तर नहीं आता, क्यों कि- विज्ञाता आत्मा का स्वरूप स्वप्रकाश है, इसलिए उसे केवल “विज्ञान शब्द से भी बतला दिया गया। ज्ञाता का स्वरूप ज्ञान द्वारा ही निरूपित हो सकता है। धर्मों के स्वरूप के निरूपक शब्द, जो कि-उसके धर्म का बोध कराते है वह गौ शब्द की तरह हैं, अर्थात् सास्नालांगूलककुदखुर- विषाण आदि चिन्हों को धारण करने वाला जो जीव है उसे गौ कहते हैं, इसी तरह विज्ञान शब्द ‘ज्ञान को धारण करने वाला जीवात्मा है’ इस तथ्य का निरूपण करता है ।

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