भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 373

( ३१३ ) आनंदमय ब्रह्म के, प्रिय-शिर आदि अवयव भी रूपक ही हो जायेंगे। इसी प्रकार "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म" इस वाक्य में, विकारास्पद जड परिच्छिन्न पदार्थ से पृथक्, परिष्कृत सुख से पूर्ण आनंदमय का उपदेश दिया गया है। तथा अखण्डैकरस आनंदरूप ब्रह्म में प्रयुक्त आनंदमय शब्द में जो मयट् प्रत्यय है वह, प्राणमय की तरह, स्वार्थिक जानना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि-अविद्या परिकल्पित, विविध विचित्र देवादि भेदों वाले जीवात्मा की स्वाभाविक अखण्डैकरस रूप की सुखैकतानता को ही "आनन्दमय" नाम से बतलाया गया है, इसलिए जीवात्मा ही आनंदमय है। एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे-आनंदमयोऽभ्यासात्-आनंदमयः परमात्मा कुतः ? अभ्यासात् । "सैषाऽनंदस्य मीमांसा भवति" इत्यारभ्य 'यतोवाचोनिवर्त्तन्ते" इत्येवमंतेन वाक्येन शतगुणितोत्तरक्रमेण निरतिशयदशाशिरस्कोऽभ्यस्यमान आनंदः अनंतदुःखमिश्रपरिमित- सुखलवभागिनि जीवात्मनि असंभवन् निखिलहेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानसकलेतरविलक्षणं परमात्मानमेव स्वाश्रयमावेदयति । सिद्धान्तः-इस प्रकार के विचार के समक्ष आने पर अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं- "आनंदमयोऽभ्यासात्" अर्थात् आनंदमय परमात्मा ही है, क्यों कि-शास्त्र में उसके लिए ही पुनः पुनः आनंदमय शब्द का प्रयोग किया गया है। "सैषा आनंदस्य मीमांसा भवति" से प्रारंभ कर "यतो वाचो निवर्त्तन्ते" इस अंतिम वाक्य तक शतगुणितोत्तर क्रम से जिस निरतिशय श्रेष्ठतम मूर्धन्यदशा को बार बार आनंद नाम से कहा गया है वह, अनंत दुःख संवलित, परिमित लवमात्र सुख को प्राप्त करने वाले जीवात्मा में नितान्त असंभव है। वह तो समस्त हीन दोषों से रहित कल्याणैकतान समस्त अन्यान्य पदार्थों से विलक्षण परमात्मा में ही संभव है, आनंद का एकमात्र आश्रय परमात्मा ही है। यथाह-"तस्माद्वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तरात्मा आनंदमयः" इति विज्ञानमयो हि जीवः, न बुद्धिमात्रम्, मयट् प्रत्ययेन व्यतिरेकप्रतीतेः । प्राणमयेत्यवगत्वा स्वार्थीयकताऽश्रीयते । ankurnagpal108@gmail.com