श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१२ ) (समाधान) बात ऐसी नही है- उसी श्रुति में आगे चल कर “यह पुच्छ बसने का आधार है, पृथिवी मे भी वही आधार है, आगिरस गोत्रीय अथर्ववेद के मत्रद्रष्टा मे वही आधार है, तथा बुद्धिगत चिदाभास मे भी वह आधार है” ऐसा कहते हुए, उदाहरण प्रस्तुत किये गए है । ‘अन्नाद वै प्रजाः प्रजायते’’ इत्यादि श्लोक जैसे केवल पुच्छ मात्र के प्रतिपादक नही हैं अपितु अन्नमयादि पुरुष के प्रतिपादक है, वैसे ही आनंदमय के प्रकरण में भी “असन्न एव” इत्यादि श्लोक आनंदमय पुरुष का प्रति- पादक है, अन्य पुच्छ का प्रतिपादक नही है । आनंदमय मे ब्रह्मत्व होते हुए भी, प्रिय, मोद आदि रूपों से रूपित अपरिच्छिन्न आनंद की सद्भाव और असद्भाव सबंधी आशंका युक्ति युक्त ही है । पुच्छब्रह्मणोऽप्यपरिच्छिन्नानंदतयैव हि अप्रसिद्धता । शिरः प्रभृत्यवयववित्वाभावादब्रह्मणो नानंदमयो ब्रह्मेति चेत्-ब्रह्मणः पुच्छ्त्वप्रतिष्ठात्वाभावात् पुच्छमपि ब्रह्म न भवेत् । अथाविद्यापरि- कल्पितस्य वस्तुनस्तस्याश्रयभूतत्वात् ब्रह्मणः पुच्छं ऽप्रतिष्ठेति रूपण- मात्रमित्युच्येत, हन्त र्तहि तस्यासुखाद्व्यावृत्तस्यानंदमयस्य ब्रह्मणः प्रियशिरस्त्वादिरूपणं भविष्यति । एवं च “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” इति विकारास्पदजऽपरिच्छिन्नवस्वंतरव्यावृत्तस्यासुखाद्व्यावृत्ति- रानन्दमय इत्युपदिश्यते । ततश्चाखण्डैकरसानन्दरूपे ब्रह्मण्यानंदमय इति मयट् प्राणमय इव स्वार्थिको दृष्टव्यः। तस्मादविद्यापरिकल्पित- विविधविचित्रदेवादिभेदभिन्नस्य जीवात्मनः स्वाभाविकं रूपम् खंडैकरसं सुखैकतानमानंदमय इत्युच्यत इत्यानंदमयः प्रत्यगात्मा । पुच्छ ब्रह्म की अपरिच्छिन्न आनंद रूप से प्रसिद्धि नही है । यदि कहा जाय कि- शिर इत्यादि अवयवो के अभाव से ब्रह्म, 'आनंदमय ब्रह्म,' नही हो सकता । तब तो ब्रह्म में पुच्छत्व के अभाव होने से, पुच्छ ब्रह्म भी, ब्रह्म नहीं हो सकता । यदि कहें कि-अविद्या परिकल्पित वस्तु के आश्रयभूत होने से ब्रह्म की "पुच्छ प्रतिष्ठा" इस रूपक से वर्णन किया गया है-(ब्रह्म के अवयव वास्तविक नहीं हैं) तब तो-दुःख रहित ankurnagpal108@gmail.com