भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३११ ) वाले अन्नमयादि वाक्य में, एक एक के अन्तरात्मा रूप से प्राणमय आदि को, आत्मा स्वरूप दिखला कर "इनसे भिन्न आत्मा अन्तर्यामी आनन्दमय है" उस आत्मा के निर्देश को आनंदमय में लाकर समाप्त किया गया है। इस से ज्ञान होता है कि-आत्म शब्द से निर्दिष्ट ब्रह्म नामवाला ही आनंदमय है। ननु च—"ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा" इत्युक्त्वा "असन्नेव स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेत् , अस्तिब्रह्मेति चेद्वेद, संतमेनं ततो विदुः" इति ब्रह्म ज्ञानाज्ञानाभ्यामात्मनः सद्भावासद्भावौ दर्शयति, नानंदमयज्ञानाज्ञानाभ्याम् । न चानंदमयस्य प्रियमोदादिरूपेण सर्व- लोकविदितस्य सद्भावासद्भावज्ञानाशंका युक्ता । अतो नानन्द- मयमधिकृत्यायं श्लोक उदाहृतः । तस्मादानंदमयादन्यद् ब्रह्म । (शंका की जाती है कि—) उक्त प्रसंग में "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" ऐसा कहने के बाद कहा गया कि—"ब्रह्म को यदि असत् कहते हो तो वह निश्चित ही असद् हो जावेगा, यदि उसे सद् कहते हो तो, इसे भी सत् ही मानों" इस श्रुति में— ब्रह्म ज्ञान और अज्ञान से, आत्मा का सद्भाव और असद्भाव दिखलाया गया है, आनंदमय के ज्ञान और अज्ञान की तो चर्चा भी नहीं है। आनंदमय की, प्रिय मोद आदि रूपों से, लोक प्रसिद्ध सद्भाव और असद्भाव ज्ञानवाली प्रतीकता, दिखलाई गई हो ऐसा भी नहीं कह सकते। इससे निश्चित होता है कि-यह श्लोक, आनंदमय के लिए नहीं कहा गया है। आनंदमय से भिन्न ब्रह्म के लिए ही कहा गया प्रतीत होता है, इसलिए आनंदमय से भिन्न ही ब्रह्म है। नैवम्—"इदं पुच्छं प्रतिष्ठा"—पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा—"अथर्वां- गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा"—"महः पुच्छं प्रतिष्ठा" इत्युक्त्वा तत्रतत्रो- दाहृताः। "अन्नाद् वै प्रजाः प्रजायंते" इत्यादिश्लोकाः यथा न पुच्छमात्रप्रतिपादनपराः, अपि तु अन्नमयादिपुरुष प्रतिपादनपराः; एवमत्रापि आनन्दमयस्यायं "असन्नेव" इतिश्लोकः। नानन्दमय- व्यतिरिक्तस्य पुच्छस्य। आनंदमयस्यैव ब्रह्मत्वेऽपि प्रियमोदादिरूपेण रूपितस्यापरिच्छिन्नानंदस्य सद्भावासद्भावज्ञानाशंका युक्तैव।