श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०६ ) करत्वं सकलहेयप्रत्यनी`त्यादयः सर्वेऽभ्युपगन्तव्याः । शक्तिमत्व च कार्यविशेषानुगुणत्वं, तच्चकार्यविशेषनिरूपणीयम्, कार्यविशेषस्य निष्प्रमाणकत्वे तदेकनिरूपणीय शक्तिमत्वमपि निष्प्रमाणकं स्यात् । यदि यह कहो कि-श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर हम उनके क्षमता- गुण को स्वीकार करते हैं, तब तो प्रसन्नता का विषय है तब तो सर्व- ज्ञता, सर्वेश्वरता, शक्तिमत्ता, सर्वकल्याणगुणाकरता निर्दोषता आदि गुण विशेषणों, को भी श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर स्वीकारोगे ही; शक्तिमत्ता का अर्थ होता है, कार्य विशेष की अनुगुणता, जो कि-कार्य विशेष में ही निरूपित होती है। कार्य विशेष के अप्रामाणिक हो जाने पर वह भी अप्रामाणिक हो जाती है। किंच-निर्विशेषवस्तुवादिनो वस्तुत्वमपिनिष्प्रमाणम् प्रत्यक्षानु- मानागमस्वानुभवाः सविशेषगोचरा इति पूर्वमेवोक्तम् । तस्मात् विचित्रचेतनाचेतनात्मकजगद्रूपेण “बहुस्याम्” इतीक्षणक्षमः पुरुषोत्तम एव जिज्ञास्य इति सिद्धम् । अधिक क्या-निर्विशेषवस्तुवादियों की वस्तु भी अप्रामाणिक है। प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र और अनुभव सभी प्रमाणों से सगुण ब्रह्म ही दृष्टिगोचर होता है, ऐसा पहिले भी कह चुके है। विचित्र जडचेतन जगत रूप से “अनेकहोने” का संकल्प करने वाला पुरुषोत्तम ही जिज्ञास्य ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होता है। ६ अधिकरण— एवं जिज्ञासितस्य ब्रह्मणश्चेतनभोग्यभूतजडरूपसत्त्वरजस्त- मोमयप्रधानाद् व्यावृत्तिरुक्ता, इदानीं कर्मवश्यात् त्रिगुणात्मक प्रकृतिसंसर्गनिमित्तनानाविधानन्तदुःखसागरनिमज्जनेनाशुद्धाच्छुद्धाच्च प्रत्यगात्मनोऽप्यखिलहेयप्रत्यनीकनिरतिशयानन्दं ब्रह्मेति प्रतिपाद्यते । ankurnagpal108@gmail.com